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बाबा सलवार में क्यों भागा… राजा ने बाबा को जान से क्यों नहीं मारा?

एक मदारी और जंबूरा मैदान में आ गए थे. मदारी डुगडुगी बजा कर मजमा लगा रहा था. लोगों की भीड़ उन्हें चारों और से घेर कर खड़ी थी.  मदारी भीड़ पर एक नजर से देख कर पुन: डुगडुगी बजाने लगा. थोड़ी देर में ही भीड़ काफी बढ़ चुकी थी. मदारी जम्बुरे को संबोधित करके बोला-

जंबूरे,

“हाँ, उस्ताद”

एक मदारी और जंबूरा मैदान में आ गए थे. मदारी डुगडुगी बजा कर मजमा लगा रहा था. लोगों की भीड़ उन्हें चारों और से घेर कर खड़ी थी.  मदारी भीड़ पर एक नजर से देख कर पुन: डुगडुगी बजाने लगा. थोड़ी देर में ही भीड़ काफी बढ़ चुकी थी. मदारी जम्बुरे को संबोधित करके बोला-

जंबूरे,

“हाँ, उस्ताद”

बताएगा?

“बताऊँगा”

तो बता, इस गाँव का नाम क्या?

“अंधेर-नगरी”

गाँव का राजा कैसा?

“जबान वाला गूंगा”

राजा का काम?

“चोरों की देखरेख”

गलत, तू झूठ बोल रहा है जंबूरे?

“तुम अंधे हो गए उस्ताद”

मुझे दिख रहा है जंबूरे.

“तो फिर झूठा कौन?”

अच्छा, ये बता की पांच जून को क्या सही था?

“निर्दोष लोगों की भावना और पुलिस की लाठी”

तू सच नहीं बोल रहा जंबूरे? ये लोग सालों पहले की गयी चोरी का हिसाब मांग रहे थे?

“इसमें गलत क्या उस्ताद”

ये बहुत बड़ी रकम है बावले, बड़ी मुश्किल से जनता के खून से चूसा गया था.

”…..तो फिर जनता को वापिस मिलना चाहिए ना उस्ताद”

तू लालच से बोल रहा है?

”…..नहीं, मैं हक़ से बोल रहा हूँ”

इस नगरी में हक़ से नहीं बोला जा सकता?

” क्यों उस्ताद?”

क्योंकि तुम उल्लू हो और राजा चालबाज, अच्छा अब आगे बता.

“बताऊँगा”

उस रात बाबा ने सलवार क्यों पहनी?

”मौत के सौदागरों से डर के”

गलत! वह चकमा देना चाहता था?

“……………”

तू चुप क्यों हो गया जंबूरे?

”तुम शायद राजा से मिल गए हो उस्ताद”

जंबूरे, बताएगा?

“हाँ, उस्ताद”

राजा ने बाबा को जान से क्यों नहीं मारा?

“उसके भूत बनकर वापिस आने की ताकत से डरकर”

उसको हवाई जहाज से क्यों भेजा?

“पूरे गाँव की ताकत से डरकर”

“जंबूरे, राजा चुप क्यों था?”

“राजा की मशीन में चाबी नहीं भरी गयी थी”

चाबी कौन भरता है?

“विदेशी रानी”

वह कहां से टपक पड़ी?

“परदे के पीछे से”

पर्दा कहाँ पर है?

“दस-जन…..प..”

जंबूरे वहाँ क्या दिखता है?

“लुच्चे लोगों की भीड़”

तू डरता क्यों नहीं जंबूरे?

“मेरे उस्ताद के पास और मेरे पास कुछ नहीं है”

तुझे जेल भेजा जा सकता है जंबूरे?

“मजा आ जाएगा उस्ताद”

क्या बकता है?

“सही कहता हूँ बाबा, वहाँ रोटी मिलती है उस्ताद”

आगे क्या होगा जंबूरे?

”शायद कुछ नहीं”

क्यों देखता है ऐसा?

“सीधी सी बात उस्ताद, ये जनता कायर, बुद्धिहीन है”

चल उठ जंबूरे?

“क्यों उस्ताद?”

तुमने जनता का भी सच पकड़ लिया. अब आज कोई पैसा नहीं मिलेगा, भूखे रहना पडे़गा.

“मंजूर है उस्ताद, लेकिन झूठ नहीं बोलूंगा.यह जनता भी दर्शक बनेगी तो एक दिन आधे जंबूरे बन जायेंगे और आधे उस्ताद “

जंबूरा उठ गया और मदारी सामान समेटने लगा लेकिन भीड़ फिर भी खड़ी थी.शायद कोई और मदारी आ जाये.

लेखक गंगा प्रसाद भूत्रा सूरत के निवासी हैं.

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