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कब सुधरेंगे प्रधानमंत्री जी!

संजय शर्मा लोकपाल विधेयक को लेकर एक बार फिर अन्ना हजारे और उनकी टीम सरकार के निशाने पर है। ऐसा होना ही था। जिस तरह से पूरे देश में अन्ना हजारे ने माहौल बना दिया था, उस समय केन्द्र सरकार के पास इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं था कि वह इस बात को स्वीकार करे कि अब पूरा देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है और वह किसी भी कीमत पर लोकपाल विधेयक को लाना ही चाहता है। मगर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सरकार अब भी इस विधेयक में कांटछांट का कोई मौका नहीं छोड़ रही। जाहिर है कि मानसून सत्र में यह विधेयक संसद में आ पायेगा और लागू हो जायेगा इसकी संभावना कम ही है।

संजय शर्मा

संजय शर्मा लोकपाल विधेयक को लेकर एक बार फिर अन्ना हजारे और उनकी टीम सरकार के निशाने पर है। ऐसा होना ही था। जिस तरह से पूरे देश में अन्ना हजारे ने माहौल बना दिया था, उस समय केन्द्र सरकार के पास इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं था कि वह इस बात को स्वीकार करे कि अब पूरा देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है और वह किसी भी कीमत पर लोकपाल विधेयक को लाना ही चाहता है। मगर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सरकार अब भी इस विधेयक में कांटछांट का कोई मौका नहीं छोड़ रही। जाहिर है कि मानसून सत्र में यह विधेयक संसद में आ पायेगा और लागू हो जायेगा इसकी संभावना कम ही है।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश को चलाने वाले लोग अभी भी इसकी नब्ज नहीं पहचान पा रहे हैं। उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि इस देश का जनमानस अब लगातार हो रहे भ्रष्टाचार और बढ़ती हुई महंगाई से त्रस्त हो चुका है। वह किसी भी स्थिति में अब देश में ऐसे लोगों को बर्दाश्त नहीं करना चाहता जिनका दामन दागदार हो। पिछले लम्बे समय से वह इससे मुक्ति पाने की कोशिश कर रहा था। मगर उसके सामने कोई विकल्प नहीं मिल पा रहा था। लम्बे समय के बाद अन्ना हजारे ने देश के लोगों जब इस बात का एहसास कराया कि अगर सामूहिक रूप से सब लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हो जायें तो किसी भी सरकार में या किसी भी व्यवस्था में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह खुद को न सुधारे।

जब पूरी दुनिया में बदलाव की बयार चल रही थी और सारा देश इस बात को देख रहा था, जिन-जिन देशों के शासक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये हैं वहां की जनता सड़कों पर आकर खुद व्यवस्थाओं में बदलाव कर रही है। मगर भारत के शासक अपने मद में इतना डूबे हुए थे कि दुनिया में हो रही इस क्रांति की आवाजें उनके कानों तक नहीं पहुंच पा रही थीं। अचानक जब पूरे देश के लोग सड़कों पर आने लगे तो केंद्र सरकार में खलबली मची और तब सरकार को समझ आया कि इस देश की जनता भले ही कितनी भोली क्यों न हो वह इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं करती कि चंद लोग इस देश के साथ लगातार मनमानी करते रहें और वह खामोश बैठी रहे।

दरअसल इस देश के लोग भोले हैं। शांत हैं। उनमें सहने की अपार क्षमता है। मगर जब देश का नेतृत्व लगातार नपुसंक होता दिखायी दे और कर्णधार ही बेचने में जुट जायें तो इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता कि आमजन खुद सड़कों पर निकलें और ऐसे लोगों को सबक सिखायें। शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री और उनके चम्पुओं को भरोसा नहीं था कि इस देश का मध्यमवर्गीय वर्ग जो भौतिकता का आदी हो चुका है वह तेज धूप में ईमानदारी की बात करने के लिये सड़कों पर भी बैठ सकता है।

मगर बेतहाशा बढ़ती महंगाई के बीच जब आम लोगों ने देखा कि जब देश का एक मंत्री ही एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का घोटाला किये बैठा है। जब खुद को ईमानदार कहने वाले प्रधानमंत्री एक भ्रष्ट अधिकारी को मुख्य सतर्कता आयुक्त बना रहे हैं तो उसके सब्र का पैमाना छलक गया और वह अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये सड़कों पर आ गया। मजबूरीवश सरकार को कहना पड़ा कि वह लोकपाल विधेयक के लिये राजी है और साथ ही सरकार के लोगों ने साजिश शुरू कर दी कि जनमानस में उन लोगों की छवि को खराब किया जा सके जो इस विधेयक को बनाने के लिये एकजुट हुये हैं।

सबसे पहले दांव पर शांति भूषण और प्रशांत भूषण लगाये गये और सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी कि जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस आंदोलन के लिये दिन रात एक कर रहा है, वह अमर सिंह जैसे आदमी को दिखाये जो भूषण परिवार के खिलाफ अनर्गल विलाप कर रहे हैं। उनको लगता था कि ऐसा करने से देश के जनमानस में इन लोगों की छवि खराब होगी और वह दोबारा देश में सरकार के खिलाफ कोई भी माहौल नहीं बना पायेंगे। दरअसल भ्रष्टाचार में डूबी सरकार के करिंदे इससे आगे की कोई बात सोच भी नहीं सकते थे।

वह लोग भूषण परिवार के अलावा अन्ना हजारे को भी घेरने की रणनीति बनाने में जुट गये। अन्ना हजारे के ट्रस्ट को भी गलत तरीके से नोटिस देकर उनको बदनाम करने की नापाक कोशिशें की गईं। मगर यह लोग अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। तब यह लोग अपनी असली शक्ल में आ गये और साफ-साफ कह दिया कि वह प्रधानमंत्री तथा संसद के सदस्यों को लोकपाल के अधीन नहीं ला सकते। यह बात इस देश के लोग पहले ही जानते थे कि आखिर में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली सरकार के लोग ऐसा ही कोई दांव चलेंगे। आखिर जिस संसद में आधे से ज्यादा सदस्यों के ऊपर भ्रष्टाचार और आपराधिक घटनाओं के मुकदमें चल रहे हों,  उनसे यह आशा करना ही बेमानी है कि वह ऐसे लोकपाल को बनने देंगे जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई करने की बात कहता है।

मगर अफसोस कि लम्बे समय तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस भी इस देश के लोगों की भावनाओं को समझ नहीं पा रही। खुद प्रधानमंत्री भी किसी मुगालते का साथ शिकार होकर रह गये हैं। उन्हें यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिये थी कि इस देश के लोग यह जानते हैं कि भले ही प्रधानमंत्री खुद कितनी ही नैतिकता और ईमानदारी की बातें करें मगर वह खुद भ्रष्टाचारियों के सरदार बने बैठे हैं। उनकी नाक के नीचे भ्रष्टाचार का तांडव चलता रहा हो और उन्हें इसकी खबर भी नहीं हो तो ऐसे प्रधानमंत्री की इस देश को कोई खास जरूरत भी नहीं है।

इस देश के लोग यह भी भली भांति जानते हैं कि केंद्र सरकार का खुफिया तंत्र इतना मजबूत होता है कि कौन मंत्री कहां क्या गुल खिला रहा है यह सब प्रधानमंत्री कार्यालय को पता रहता है। अच्छा हो कि लोकपाल विधेयक को रोकने की कोशिश करने की जगह कांग्रेस खुद इस विधेयक को पास कराने की जिम्मेदारी ले, वरना दुनिया में आ रहे भ्रष्टाचार के बदलाव के साथ-साथ भारत में भी बदलाव की जो शुरुआत होगी वह कांग्रेस के लिये भारी पड़ जायेगी।

लेखक संजय शर्मा वीकेंड टाइम्‍स के संपादक हैं. आप इस लेख पर अपनी राय 9452095094 पर एसएमएस कर सकते हैं.

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