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आओ ‘भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार’ खेलें

जयशंकर भ्रष्टाचार एक बार फिर सुर्खियों में है.  इस बार घोटालेबाजों और उनके कारनामों के कारण नहीं बल्कि इस पर लगाम लगाने की मांग के साथ हो रहे धरना-अनशन आंदोलनों की वजह से. कुछ दिनों पहले समाजसेवी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से निबटने की ‘रामबाण दवा’ के बतौर लोकपाल के गठन की मांग के साथ संसद के पास जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया था. उन्हें दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों से मिले समर्थन के कारण आईपीएल से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन, आदर्श फ्लैट आबंटन और फिर २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटालों के एक- एक कर उजागर होते जाने से घबराई सरकार एक तरह से हिल सी गई थी.

जयशंकर

जयशंकर भ्रष्टाचार एक बार फिर सुर्खियों में है.  इस बार घोटालेबाजों और उनके कारनामों के कारण नहीं बल्कि इस पर लगाम लगाने की मांग के साथ हो रहे धरना-अनशन आंदोलनों की वजह से. कुछ दिनों पहले समाजसेवी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से निबटने की ‘रामबाण दवा’ के बतौर लोकपाल के गठन की मांग के साथ संसद के पास जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया था. उन्हें दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों से मिले समर्थन के कारण आईपीएल से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन, आदर्श फ्लैट आबंटन और फिर २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटालों के एक- एक कर उजागर होते जाने से घबराई सरकार एक तरह से हिल सी गई थी.

आनन-फानन में लोकपाल विधेयक लाने और उसका मसौदा तैयार करने के लिए सरकार और अन्ना हजारे के साथ लगे सामाजिक कार्यकर्ताओं, विधि वेत्ताओं को लेकर एक संयुक्त समिति बना दी. अपने गठन के समय से ही विवादों में घिर गई यह समिति फिलहाल लोकपाल विधेयक के प्रावधानों पर आम राय बनाने में जुटी है.

स्वाभिमान से भ्रष्टाचार विरोध तक : बाबा रामदेव भी एक अरसे से योग और प्राणायाम के जरिए लोगों को स्वस्थ और निरोग बनाते-बनाते देश को भी भ्रष्टाचार के रोग से मुक्त करने के अभियान में लगे रहे हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की सुर्खियों से अघाए बाबा का देश और विदेश में भी समर्थन आधार काफी बड़ा है. लेकिन भ्रष्टाचार के विरोध के मामले में उन्हें लगा कि वह और उनका भारतीय स्वाभिमान आंदोलन पिछड़ से गए. ना नुकुर के स्वर में अन्ना का समर्थन करते हुए भी उन्हें लगा कि अलग से कुछ किया जाना चाहिए. लिहाजा रामलीला मैदान में पूरी तैयारी के साथ आकर जम गए. मंच पर जमने से पहले और बाद में भी बुलावे पर वह सरकारी प्रतिनिधियों से मिलने बात करने को तुरंत तैयार हो गए. उन्हें मनाने-समझाने, ठगने और उनसे निबटने में सरकार को उतनी देर भी नहीं लगी जितनी अन्ना को मनाने में लगी थी.

आखिर कौन वह व्यक्ति, सरकार और संगठन होगा जो भ्रष्टाचार मिटाने के सवाल पर राजी नहीं होगा और कौन ऐसा देशवासी होगा जो नहीं चाहेगा कि देश में अथवा विदेश में जमा कालाधन बाहर आए. लेकिन क्या सिर्फ इस तरह के आंदोलनों और उनसे निबटने के आश्वासनों, फौरी उपायों से ही भ्रष्टाचार मिट जाएगा और कालाधन बाहर आ जाएगा. इसका मतलब यह कतई नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं होने चाहिए. इन आंदोलनों ने यकीनन भ्रष्टाचार के खिलाफ देश व्यापी माहौल तो बनाया ही है. भ्रष्टाचार के फेर में फंसे-उलझे जन दबाव कहें या फिर राजनीतिक मजबूरी, सरकार भी इस पर अंकुश लगाने के प्रयासों में साझा करने की बात तो करने ही लगी है. लेकिन हमने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण का आंदोलन और फिर उस आंदोलन से निकलकर सत्तारूढ हुए अधिकतर लोगों के चाल-चरित्र और चेहरों को बदलते भी देखा है.

शपथपत्र भरें आंदोलनकारी : तो फिर किया क्या जा सकता है? अगर सिर्फ एक काम प्रतीक के बतौर ही शुरू किया जाए कि अन्ना का हो, बाबा रामदेव का अथवा और किसी का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान. इसमें शामिल होने वाले लोग सबसे पहले यह शपथपत्र भरें कि उन्होंने पहले कभी भ्रष्टाचार नहीं किया है और ना ही इसे प्रश्रय दिया है. और अगर किया-दिया भी है तो आज से कभी नहीं करेंगे. जितना भी कालाधन उनके पास है, चाहे देश में हो अथवा विदेश में, उसे घोषित करें और शपथ लें कि भविष्य में कर चोरी नहीं करेंगे. कालाधन नहीं रखेंगे. सट्टेबाजी नहीं करेंगे और इससे कमाई रकम का खुलासा करेंगे. राम जेठमलानी सहित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने वाले विधि वेत्ता यह शपथ लें कि भविष्य में वे किसी भ्रष्ट नेता, अभिनेता, अपराधी, नौकरशाह को बचाने के लिए उसका केस नहीं लडेंगे. चाहे बदले में कितनी भी बडी रकम और यहां तक कि राज्यसभा की सदस्यता ही क्यों न मिल रही हो.

भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस तरह के ‘महायुद्ध’ को सक्रिय समर्थन देने की घोषणा करने वाली भारतीय जनता पार्टी इतनी घोषणा तो कर ही सकती है कि बंगारू लक्ष्‍मण जैसा भविष्य में उसका कोई अध्यक्ष कैमरे के सामने रिश्वत लेते पकड़ा नहीं जाएगा और ना ही पार्टी का कोई बड़ा नेता कर्नाटक के खनन माफिया कहे जाने वाले रेड्डी बंधुओं को मंत्री बनवाने और बनाए रखने के लिए दबाव बनाएगा. अगर इतना सब करने के लिए वे तैयार नहीं होते तो उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए. कम से कम इन आंदोलनों का नेतृत्व करने वालों से तो उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वे ऐसे लोगों को अपने पास फटकने ना दें. क्या अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ऐसा करेंगे? देश और समाज को भ्रष्टाचार मुक्त करने का अभियान चलाने से पहले अपना दामन और आसपास का परिवेश तो साफ-सुथरा होना ही चाहिए.

अथ ‘बाबा रामदेव कथा’

योग गुरु बाबा रामदेव को अब समझ में आ गया होगा कि जितनी दिखती है, राजनीति उतनी सीधी और सरल नहीं होती. अतीत के अनुभव भी यही बताते हैं कि प्रभुदत्त ब्रह्मचारी से लेकर बाबा जय गुरुदेव जैसे बाबाओं के राजनीति में प्रवेश के प्रयोग सफल नहीं रहे. अपने योग-प्राणायाम और वक्तृता के जरिए बहुत जल्दी देश और विदेश में भी शिष्यों-समर्थकों का बड़ा आधार खड़ा कर लेने वाले बाबा रामदेव को लगा था कि इनके जरिए वह अपना राजनीतिक एजेंडा भी लागू कर सकेंगे.

उन्होंने भ्रष्टाचार और कालेधन के रूप में एक अच्छा मुद्दा भी पकड़ लिया था, जिसके विरुद्ध जनमानस हमेशा से उद्वेलित रहा है. लेकिन वह समझ नहीं पाए कि किसी भी मुद्दे को मुकाम तक पहुंचाने के लिए सुविचारित नीति और कार्यक्रम होने चाहिए. आंदोलन की दिशा निर्धारित करने के लिए रणनीति और संगठन चाहिए. इन सबके अभाव के चलते ही वह कभी बोलते कि भ्रष्टाचार के दोषियों को फांसी पर लटका देना चाहिए और कभी कहते कि विदेशों में जमा कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर वापस लाना चाहिए. क्या यह व्यावहारिक है? इसे समझने की बाबा ने कभी कोशिश नहीं की. अपनी मांगों के समर्थन में रामलीला मैदान में अनशन शुरू करने से पहले उन्हें इस बात के आकलन कर लेने चाहिए थे कि इसका फलाफल क्या होगा और सरकार इससे निबटने के लिए क्या क्या कर सकती है. अगर इसकी उन्हें समझ होती तो वह अनशन-आंदोलन शुरू होने के पहले ही सरकार के प्रतिनिधि मंत्रियों से बात करने को आतुर नहीं हो जाते. अनशन-आंदोलन के मंच से उठकर मंत्रियों से बातचीत के लिए पांच सितारा होटल नहीं पहुंच जाते और अपने भरोसेमंद सलाहकार के हाथों अनशन के बजाए रामलीला मैदान में तप करने का लिखित आश्वासन नहीं थमा देते. तप करने के उनके लिखित आश्वासन से मुकरने के बाद सरकार के पास भी उनकी पोल खालने का विकल्प तो था ही.

उन्होंने एक गलती और की. अपने मंच पर संघ परिवार की साध्वी ऋतंभरा को आने दिया जो बाबरी मस्जिद के विध्वंस के प्रमुख गुनहगारों में से एक हैं. इससे सरकार को यह कहने का मौका मिल गया कि बाबा के अभियान के पीछे संघ परिवार का राजनीतिक एजेंडा है. भाजपा और संघ परिवार तो जैसे इस तरह के अवसरों की खोज में ही रहते हैं कि कब दूसरों के द्वारा उठाए मद्दों को हाईजैक कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें. रामलीला मैदान पर सरकार की कार्रवाई के बाद जिस तरह संघ परिवार और भाजपा के लोग सड़कों पर उतर आए, उससे भी यही प्रतिध्वनित होता है.

हालांकि रामलीला मैदान में आधी रात को पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई का समर्थन नहीं किया जा सकता. हालांकि पुलिस कार्रवाई के समय रामदेव ने जिस तरह से जनाना पोशाक धारण कर भागने की कोशिश की उससे भी उनका खोखलापन ही उजागर होता है. रामलीला मैदान पर उनके समर्थक स्त्री-पुरुषों, वृद्धों और युवाओं के साथ जो हुआ उसका विभिन्न स्तरों पर विरोध भी हो रहा है. प्रायः सभी गैर कांग्रेसी दलों ने इसका विरोध किया है और बाबा के साथ हमदर्दी भी जताई है. लेकिन ज्यों ही लगा कि बाबा अपने अनशन की अगली कड़ी उत्तर प्रदेश के नोएडा से करने वाले हैं, उनके समर्थन में बयान जारी करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें बीच रास्ते, मुजफ्फरनगर से ही बैरंग वापस लौटा दिया. मायावती को मालूम है कि पर्दे के पीछे सक्रिय संघ परिवार बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की आंच पर उत्तर प्रदेश में अपनी बुझ चुकी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लग सकता है. और खासतौर से तब जबकि कुछ ही महीनों के बाद प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं.

लेकिन इस पूरे प्रसंग में एक सवाल रह जाता है कि इससे सरकार को क्या हासिल हुआ? बाबा रामदेव को ठग करार देने से पहले अच्छा होता कि उनकी अगवानी में केंद्र सरकार के चार बडे़ मंत्री हवाई अड्डे पर नहीं जाते. और रामदेव को वहीं से वापस लौटा दिया जाता. रामलीला मैदान पर हुई कार्रवाई से पहले ऐसा लग रहा था कि भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर अलग-अलग ढपली बजा रहे समाजसेवी अन्ना हजारे और रामदेव के बीच मतभेदों की खाई और चौड़ी हो जाएगी. बाबा रामदेव के मंच पर ऋतंभरा के आने के बाद ही अन्ना हजारे और उनकी टीम ने साफ कर दिया था कि वे लोग अब उनके अनशन में शामिल नहीं होंगे. लेकिन सरकारी कार्रवाई के बाद इसके उलट ही हुआ है. अन्ना हजारे की टीम ने लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगी संयुक्त समिति की बैठक का बहिष्कार कर दिया है. सरकारी कार्रवाई के विरुद्ध दिल्ली में एक दिन का सांकेतिक धरना करने की घोषणा कर दी. यह संकेत भी देने की कोशिश की जा रही है कि सरकार भ्रष्टाचार और कालेधन के विरुद्ध गंभीर नहीं है.

लेखक जयशंकर गुप्‍त वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. वे इनदिनों लोकमत समाचार में कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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