Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मेरी भी सुनो

योग से आईसीयू तक

आख़िरकार एलोपैथिक आईसीयू ने योग को छुट्टी दे ही दी और ये सलाह भी की योग गुरु योग ही न करें, मतलब एक तरीके से बाबा को भी भी छुट्टी दे दी उनके काम से, अब बाबा क्या करेंगे वो अलग बात हैं पर योग अब क्या करेगा वो देखना दिलचस्प होगा. वैसे अब तक योग के फायदे ही सुने थे नहीं पता था योग नुकसान भी कर देता हैं। 1924 में गांधी ने 21 दिनों तक नमक-पानी पर उपवास किया। जतिन दास ने 63 दिनों तक उपवास किया और जान दे दी। पोट्टी श्रीरामुलु ने 82  दिनों तक उपवास किया। ममता बनर्जी ने सिंगुर के लिए 23 दिनों का उपवास रखा। बाबा का नौंवां दसवां दिन चल रहा है। हर जगह यूरिन रिपोर्ट का फ्लैश चल रहा है। सवाल एक और है बाबा एलोपैथिक आईसीयू में क्यों गए। उन्हें योगशक्ति से मुकाबला करना चाहिए था।

आख़िरकार एलोपैथिक आईसीयू ने योग को छुट्टी दे ही दी और ये सलाह भी की योग गुरु योग ही न करें, मतलब एक तरीके से बाबा को भी भी छुट्टी दे दी उनके काम से, अब बाबा क्या करेंगे वो अलग बात हैं पर योग अब क्या करेगा वो देखना दिलचस्प होगा. वैसे अब तक योग के फायदे ही सुने थे नहीं पता था योग नुकसान भी कर देता हैं। 1924 में गांधी ने 21 दिनों तक नमक-पानी पर उपवास किया। जतिन दास ने 63 दिनों तक उपवास किया और जान दे दी। पोट्टी श्रीरामुलु ने 82  दिनों तक उपवास किया। ममता बनर्जी ने सिंगुर के लिए 23 दिनों का उपवास रखा। बाबा का नौंवां दसवां दिन चल रहा है। हर जगह यूरिन रिपोर्ट का फ्लैश चल रहा है। सवाल एक और है बाबा एलोपैथिक आईसीयू में क्यों गए। उन्हें योगशक्ति से मुकाबला करना चाहिए था।

15 साल लगे रामदेव को स्वामी रामदेव बनने में और 9  दिन भी नहीं लगे सरकार को बाबा की फजीहत करने में और 3  दिन लगे मुझे ये समझने में कि मुझे इस विषय पर लिखना चाहिए या नहीं, सही मायने में लोकतंत्र वैसा हैं नहीं जैसा दिखता हैं या सुनाई देता हैं, लोकतंत्र आखिर हैं क्या ये अलग बहस का विषय हैं, लेकिन ये समझना ज़रूरी हैं कि आखिर रामदेव हैं कौन? रामदेव बाबा एक योगी हैं, संत हैं या एक पाखंडी? पाखंडी कह कर हो सकता हैं कि मैं कुछ बुज़ुर्ग   या वो लोग जिन का बाबा ने भला किया उन की भावनाओं को ठेस पहुंचा दूं,  इसीलिए वो मैं नहीं कहूँगा, लेकिन सच तो ये ही हैं कि बाबा रामदेव की सीमा एक दम आडवाणी की तरह हैं। वो इसीलिए क्यूंकि न तो वो कभी राम मुद्दे की सीमा से बाहर आ पाए न ही रामदेव कभी बुज़ुर्गो और अपने चुनिन्दा समर्थकों  की भीड़ से, अन्ना के साथ पूरा देश था पर रामदेव के अनशन में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिला। ये सोचने का विषय इसीलिए हैं क्यूंकि बाबा 6  दिन भूखे  रहे, बाद के 3  दिन ग्लूकोज पर रहे और आखिरकार देश के कथा वाचक श्री श्री रवि शंकर और मुरारी बापू ने मिलकर उन्हें मौसमी के रस का ग्लास पिला ही डाला।

इस पर कांग्रेस के नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा चलो अच्छा हुआ रामदेव ने अनशन तोड़ दिया और दिग्विजय ने कहा कि चाहे तो और भूखा रह लें हमें फर्क  नहीं पड़ता, याद रहे दोनों एक ही पार्टी के हैं जिसका हाथ आम जनता के साथ हैं। मैं नाम नहीं लेना चाहता। ये एक ड्रामा प्रतीत होता हैं, एक फिल्म की तरह पर मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस फिल्म में विलन कौन हैं, सरकार या रामदेव, क्यूंकि रामदेव 9  दिन भूखे रहने पर भी देश के हीरो नहीं बन सके और सरकार उन्हें भूखा छोड़कर भी विलन नहीं लग रही। हाँ,  ऐसा ज़रूर हैं कि सरकार की गलत छवि देश में गयी पर शाहरुख़ खान ने भी कई बार नकारात्मक   रोले किये हैं, पर हैं तो वो हीरो ही। वैसे शाहरुख़ बाबा के साथ नहीं थे, मनोज तिवारी थे पर वो बिग बॉस में विलेन थे। आप सोच रहे होंगे ये मैं हीरो का नाम लेके मुद्दे को भटका रहा हूँ, जी सही सोचा आपने, वो मैं इसीलिए कर रहा हूँ क्यूंकि ये पूरा मुद्दा ही भटका हुआ हैं। हमारे देश और मेरे इस विचार की तरह रामदेव के जो लोग साथ थे, उन में से आधे भी ऐसे नहीं हैं जिन्हें ये पता हैं कि आखिर बाबा ने अनशन किया क्यूँ?

मुद्दा भटका हुआ हैं, रामदेव भी! इस बात का समर्थन देश के हीरो अन्ना ने भी किया। अन्ना के हिसाब से रामदेव को न तो अनशन की आदत हैं न ही उन्हें पता है कि कैसे अभियान को चलाया जाता हैं “वो एक योग गुरु हैं”। खैर, ऐसा नहीं हैं कि रामदेव ने भीड़ नहीं जुटाई या वो कहीं पीछे रह गए बस बात सिर्फ इतनी हैं कि बाबा रामदेव की तरह हमारे देश में कई धर्म गुरु हैं,  अगर धीरे-धीरे वो सब खड़े होकर मांग करने लगे तो राहुल गाँधी का 2014  का सपना सपना रह जाएगा, वैसे याद रहे राहुल चुप हैं, बिलकुल चुप।

मेरे दादाजी कांग्रेसी थे
पापा की रगो में बीजेपी हैं
छाती पे कमल का बिल्ला है

मैं …… हा हा हा हा हा हा ,खैर छोडिये ये बहुत बड़ा मुद्दा हैं!

एक बार वैसे रामदेव के शिविर का V V  I  P  पास माता पिताजी को दिलवा चूका हूँ, उस समय बहुत गर्व हुआ था अपने ऊपर,  अच्छा हुआ दिल्ली के रामलीला मैदान का पास नहीं दिलाया वरना शर्म भी आने से शर्म करती।  कॉलेज के ज़माने का शेर याद आ गया

तुम जो चाहते तो हालात बदल सकते थे,
मेरे आसूं तुम्हारी आंखों से निकल सकते हैं,
तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरह,
दरिया बनते तो कब के आगे निकल सकते थे,
शब्दों की तासीर को तुमने पहचाना ही नहीं,
नर्म लहजे से पत्थर भी पिघल सकते थे,
और हादसे इतने हुए  हैं वतन में मेरे,
की खून से छप कर अखबार निकल सकते थे।

लेखक शिवांग माथुर पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...