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मुंबई में पहले भी माफियाओं के शिकार बने हैं पत्रकार

मुंबई के पत्रकार जेडे की निर्मम हत्या के कारणों को लेकर कयासों और अटकलों का दौर जारी है.  मुंबई पुलिस कई एंगल से हत्याकांड की जांच कर रही है. हत्याकांड में अंडरवर्ल्‍ड का नाम भी सामने आ रहा है,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब किसी खबर को लेकर मुंबई के किसी क्राईम रिपोर्टर को निशाना बनाया गया हो.  इससे पहले भी पत्रकार अपनी ख़बरों के कारण माफिया का निशाना बनते रहे हैं.  मुंबई के जाबांज पत्रकार जेडे अब हमारे बीच नहीं रहे,  लेकिन इस जाबांज पत्रकार की निर्मम हत्या से एक बार फिर से मुंबई में क्राईम रिपोर्टर्स यानी की अपराध जगत की ख़बरें देने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब मुंबई में किसी पत्रकार को माफिया ने अपना निशाना बनाया हो.

मुंबई के पत्रकार जेडे की निर्मम हत्या के कारणों को लेकर कयासों और अटकलों का दौर जारी है.  मुंबई पुलिस कई एंगल से हत्याकांड की जांच कर रही है. हत्याकांड में अंडरवर्ल्‍ड का नाम भी सामने आ रहा है,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब किसी खबर को लेकर मुंबई के किसी क्राईम रिपोर्टर को निशाना बनाया गया हो.  इससे पहले भी पत्रकार अपनी ख़बरों के कारण माफिया का निशाना बनते रहे हैं.  मुंबई के जाबांज पत्रकार जेडे अब हमारे बीच नहीं रहे,  लेकिन इस जाबांज पत्रकार की निर्मम हत्या से एक बार फिर से मुंबई में क्राईम रिपोर्टर्स यानी की अपराध जगत की ख़बरें देने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं,  लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब मुंबई में किसी पत्रकार को माफिया ने अपना निशाना बनाया हो.

जब कभी भी अंडरवर्ल्‍ड को पत्रकारों की लेखनी से आर्थिक या किसी दूसरे तरह का नुकसान होता है, अंडरवर्ल्‍ड के लोग पत्रकार को अपनी गोलियों का निशाना बना देते हैं. एक ऐसे ही खुश किस्मत पत्रकार हैं बलजीत परमार,  जिन्हें अपनी एक खबर के कारण छोटा राजन के लोगों ने गोलियों का निशाना बनाया था. बलजीत उन घटनाओं को याद कर आज भी सहम उठते हैं. बलजीत के अनुसार उन्होंने तब छोटा राजन गिरोह और कस्टम के बीच जारी एक गोरखधंधे को उजागर किया था,  जिसके कारण उस समय छोटा राजन को 52 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. जिससे नाराज छोटा राजन के लोगों ने इन पर फायरिंग कराई थी,  लेकिन ये बाल-बाल बच गए थे. मतलब साफ़ है जेडे की हत्या के पहले भी अंडरवर्ल्‍ड के लोग पत्रकारों को अपना निशाना बनाते रहें हैं.

अस्‍सी और नब्‍बे के दशक में मुंबई में जब अंडरवर्ल्‍ड की गतिविधियाँ तेज थी,  तब उस समय अंडरवर्ल्‍ड ने कई पत्रकारों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया. चाहे वो स्वतंत्र पत्रकार इकबाल नाटीक हों, जिन्हें 1982  में सरेआम क़त्ल कर दिया गया था. हालांकि नाटीक को पुलिस और माफिया की खुफिया गिरि करने के कारण मारा गया था. इसके बाद 1984  में उल्हासनगर में पत्रकार केए नारायण को पप्पू कालानी और गोपाल राजवाणी के लोगों ने गोली मार दी थी. इसमें कोई दो राय नहीं की अपराध जगत की खबरें देने वाले पत्रकार अपनी जान हथेली पर रखकर अपना दायित्व निभाते हैं. ऐसे में जहाँ सरकार को ऐसे पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिय वहीं पत्रकारों को भी चाहिए की वो एक सीमा में रहकर और चौकन्ने रहकर अपराध जगत की खबरें लोगो और प्रशासन तक पहुचाएं.

पत्रकार बलजीत परमार से बातचीत के आधार पर लिखा गया बीएन गिरी का रिपोर्ट.

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