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एक विश्‍लेषण : कालजयी पत्रकार प्रेमचंद (एक)

अनामी शरणपत्रकार प्रेमचंद। क्या प्रेमचंद को पत्रकार कहना, कोई गुनाह है? यदि नहीं तो फिर हिन्दी साहित्य के कथा सम्राट और महान उपन्यासकार प्रेमचंद को पत्रकार कहने पर बहुतों को आपत्ति क्यों होने लगती है? प्रेमचंद के नाम पर वे लोग हैं जिन्होंने आजतक प्रेमचंद की महानता का बखान करते-करते प्रेमचंद के साहित्य के अलावा उनके अन्य लेखन को कभी प्रकाश में लाने की पहल ही नहीं की। शोध और मूल्यांकन के नाम पर संपूर्ण रचनात्मकता को ही गलत सांचे में ढालने का काम किया है। शायद इसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में भी रखा जाए तो किसी को आज आपत्ति नहीं होगी।

अनामी शरणपत्रकार प्रेमचंद। क्या प्रेमचंद को पत्रकार कहना, कोई गुनाह है? यदि नहीं तो फिर हिन्दी साहित्य के कथा सम्राट और महान उपन्यासकार प्रेमचंद को पत्रकार कहने पर बहुतों को आपत्ति क्यों होने लगती है? प्रेमचंद के नाम पर वे लोग हैं जिन्होंने आजतक प्रेमचंद की महानता का बखान करते-करते प्रेमचंद के साहित्य के अलावा उनके अन्य लेखन को कभी प्रकाश में लाने की पहल ही नहीं की। शोध और मूल्यांकन के नाम पर संपूर्ण रचनात्मकता को ही गलत सांचे में ढालने का काम किया है। शायद इसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में भी रखा जाए तो किसी को आज आपत्ति नहीं होगी।

शोध और आलोचना की गलत अवधारणा की वजह से ही प्रेमचंद जैसे समर्थ और कालजयी पत्रकार को आज तक एक पत्रकार और उनकी पत्रकारिता में किए योगदान का समग्र विश्लेषण को लेकर तथाकथित आलोचकों, विद्वानों, शोधाथिर्यों समेत समीक्षकों में पता नहीं वह कौन सी गलत धारणा इस तरह पैठ गई कि प्रेमचंद को एक पत्रकार की तरह देखने की कभी किसी ने कोई पहल ही नहीं की। यहां पर यह सवाल भी जरूर उठना चाहिए कि हिन्दी के तथाकथित विद्वानों ने प्रेमचंद को एक पत्रकार की तरह भी देखने का साहस या प्रयास क्यों नहीं किया?

मैं प्रेमचंद का मात्र एक पाठक होने से ज्यादा और कोई दावा नहीं कर सकता। एकदम सामान्य सा पाठक और राजधानी के भागमभाग वाले माहौल में सब कुछ जल्दी-जल्दी देखने और फौरन धारणा बना लेने की मानसिकता के बीच पत्रकार प्रेमचंद को विहंगम नजरिए से देखने के बाद यही महसूस किया कि पत्रकार प्रेमचंद न केवल सजग, समर्थ, सक्रिय और बेहद सक्षम पत्रकार थे, अपितु साहित्य सत्ता, स्वाधीनता संग्राम के हाल को बेहद गंभीरता के साथ देखते हुए उसे प्रभावशाली तरीके से पाठकों के सामने रखने का महत्वपूर्ण काम किया। एक तरह से प्रेमचंद ने तमाम हालात पर अपनी कलम चलाकर स्वाधीनता संग्राम के उस पहलू को मानवीय और रचनात्मक तरह से देखा है, जिस पर आज तक किसी साहित्यकार, इतिहासकार या शोधार्थियों ने नजर भी नहीं डाली है। इस लिहाज से प्रेमचंद की पत्रकारिता को देखना ही उचित होगा, क्योंकि प्रेमचंद की नजर से देखते हुए सम सामयिक हालात की फिर से मूल्यांकन की आवश्यकता हो सकती है। इसी बहाने सवाधीनता संग्राम पर शोध की जरूरत को भी नकारा नहीं जा सकता है।

एक पत्रकार के रूप में प्रेमचंद में वरिष्ठता का कोई गरूर नहीं था। यही कारण था कि प्रेमचंद की कलम खासकर देश दुनिया, समाज, साहित्य, सत्ता, स्वाधीनता संग्राम, आर्थिक संवैधानिक हलचलों से लेकर स्थानीय निकायों की हालत और जन समस्याओं को भी पूरी शिद्दत के साथ सामने रखा। स्थानीय निकाय चुनाव से लेकर राष्ट्रीय राजनीति समेत लोकल स्तर की जनसभाओं के सार को भी वे काफी सार्थक तरीके से प्रस्तुत करते थे। वे गुलाम भारत में सत्ता-संघर्ष-स्वाधीनता संग्राम से लेकर हर तरह की सामाजिक विषमता और भेदभाव को एक साक्षी की तरह सामने रखते थे। विराट सामाजिक परख के साथ गहरी और पैनी नजर रखने वाले एक समर्थ पत्रकार प्रेमचंद की यही सबसे बड़ी विशेषता थी, जो उन्हें समकालीन तमाम पत्रकारों से अलग करके उन्हें खास जगह प्रदान करती है।

पत्रकार प्रेमचंद को पढ़ते हुए बार-बार और हर बार मुझे यही लगता है कि प्रेमचंद के नाम पर साहित्य की अपनी दुकान चलाने वाले विद्वानों, लेखकों, समीक्षकों ने अब तक प्रेमचंद के पत्रकार वाली छवि को सामने लाने की पहल आखिरकार क्यों नहीं की? प्रेमचंद साहित्य के विद्वानों की दृष्टि और साहित्यिक समाज पर मुझे तरस के साथ-साथ दया आती है। करीब 50 साल पहले मुंशी प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय जी ने जब पत्रकार प्रेमचंद की पत्रकारिता को सामने लाते हुए प्रेमचंद की सैकडों आलेख, टिप्पणी, नोट्स और रिपोर्ताज को सामने लाने का दुर्लभ और महान काम कर दिया था।, इसके बावजूद पत्रकार प्रेमचंद द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में किए गए अनमोल और दुर्लभ योगदान की अब तक क्यों उपेक्षा की गयी। हालांकि पत्रकार प्रेमचंद की पत्रकारिता की हो रही उपेक्षा के पीछे के मकसद को जान पाना अब संभव है। मगर सूरज की तरह तेजस्वी रचनाकार और पत्रकार प्रेमचंद को गुमनाम बनाकर अंधेरे में रखना क्या कभी संभव हो पाता? प्रेमचंद की पत्रकारिता को आंशिक तौर पर ही सही देखकर मेरी इस धारणा को लगातार बल मिलता रहा है कि पत्रकार प्रेमचंद के मूल्याकंन में बरती गयी लापरवाही को भले ही कोई साजिश न माना जाए, मगर जाने-अनजाने में ही प्रेमचंद से ज्यादा हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के साथ गंभीर खिलवाड़ किया गया, और इसकी भरपाई करना शायद मुमकिन नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पत्रकार प्रेमचंद पर कोई काम नहीं हुआ। प्रेमचंद को एक पत्रकार प्रेमचंद के रूप में देखने और प्रेमचंद की पत्रकारिता के महत्व पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने सार्थक काम किया है। मगर पत्रकार प्रेमचंद की पत्रकारिता पर स्वनाम धन्य रत्नाकर पांडेय का सारा काम हंस और साहित्यिक पत्रकारिता के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही। करीब-50 साल पहले प्रकाशित रत्नाकरजी की इस पुस्तक में पत्रकार प्रेमचंद की झलक तो मिलती है, मगर पत्रकार प्रेमचंद के महत्व को पूरी तरह प्रस्तुत नहीं किया गया है। पत्रकार के रूप में उनके योगदान की भी झलक नही मिलती है।

आम पाठकों की तरह मैं भी प्रेमचंद को एक साहित्यकार की तरह ही देखता और मानता आ रहा था। मेरे निजी पुस्तकालय में भी प्रेमचंद के कई उपन्यास और कथा समग्र सुरक्षित हैं। जिसे यदा-कदा फिर से पढ़ने-देखने का लोभ आज तक नहीं रोक पाता। प्रेमचंद को लेकर अक्सर उठते और उठाये जाने वाले विवादों के बाद जब प्रेमचंद पर दोबारा नजर डालता हूँ तो कभी दलित विरोधी प्रेमचंद तो कभी महाजनों के मुंशी आदि तगमों से नवाजे गए तोहमतों को देखकर तथाकथित प्रेमचंद विरोधी विद्वानों पर तरस आता है। दरअसल इस तरह के तोहमत से प्रेमचंद की छवि, महानता, रचनात्मक महत्व और प्रसंगिकता पर तो कोई असर ना पड़ा है और ना कभी पड़ेगा। इन आरोपों से तो लगता है मानो इस तरह की मुहिम चलाने- और लगाने वाले लोग ही खुद को मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए ही ऐसे आरोपों का सहारा लेते हैं। प्रेमचंद का साहित्य किताबों से ज्यादा पाठकों के दिल में अंकित है। जिस तरह सूर, तुलसी, कबीर, रहीम, मीरा, जायसी का पुतला जलाकर भी उनके साहित्य को कभी खारिज नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार प्रेमचंद के खिलाफ मुहिम चलाकर भी प्रेमचंद को खारिज नहीं किया जा सकता। हैरानी तो यह है कि जिस लेखक की एक-एक पंक्तियों पर अलग-अलग तरीके से सैकड़ों विद्वानों और छात्रों ने मूल्यांकन और शोध किया हो। इसके बावजूद प्रेमचंद की पत्रकारिता के हजारों पृष्ठ को कभी महत्व के लायक भी नहीं माना गया। पत्रकार प्रेमचंद पर क्यों नहीं दिया गया ध्यान यह एक अबूझ पहेली है?

मेरे पास पत्रकार प्रेमचंद की पुस्तक ‘विविध प्रसंग’ भाग-2 है। जिस पर 11 अगस्त 1997 की तिथि अंकित है। इस पुस्तक को कब, कहां कैसे, किससे खरीदा था, इसकी याद नहीं है। करीब 14 साल पहले इस पुस्तक को देखा, पढ़ा और सामान्य तरीके से अपने पुस्तकालय में सहेज कर रख दिया। सक्रिय पत्रकारिता में व्यस्त रहने के बावजूद इस पुस्तक को पिछले 14 साल के दौरान सैकड़ों बार उलटने-पलटने का मौका मिला। साल 2000 में कहीं पत्रकार प्रेमचंद को लेकर हो रही चर्चा के बाद एकाएक इस पुस्तक के महत्व का बोध हुआ। और पत्रकार प्रेमचंद को और ज्यादा जानने की ललक मन में पैदा हुई। प्रेमचंद की पत्रकारिता के प्रति एकाएक मेरी लालसा बढ़ती ही चली गयी। विविध प्रसंग भाग-2 के अलावा भाग एक और तीन को पाने की ललक जागी। इसकी खोज में दिल्ली के कई दुकानों समेत दर्जनों बार दरियागंज पुस्तक बाजार का चक्कर काटा। मगर विविध प्रसंग के भाग एक और तीन को पाने में विफल रहा। नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेलों में भी इसे पाने की मेरी हर चेष्टा के बाद भी इस पुस्तक से मेरी दूरी बनीं रही।

एक पत्रकार होने के नाते प्रेमचंद को पत्रकार प्रेमचंद की पत्रकारिता को सामने लाने की लालसा मन में लगातार बनी रही। इसी दौरान रत्नाकर पांडेय जी की पुस्तक को देखकर मेरे उद्वेलित मन को काफी शांति मिली। पांडेय जी के प्रति मन नतमस्तक हो गया। मेरे मन में पांडेय जी के अधूरे काम को और आगे बढ़ाने की ललक और प्रबल हो गयी। एक पत्रकार का काम महत्वपूर्ण होने के बावजूद उसकी क्षणिक प्रासंगिकता अंततः मिट ही जाती है। पत्रकारिता में रोजाना के जीवन का हाल जानना ही नया और रोमांचक सा होता है। हमेशा पुराना होकर कबाड़ी में बिक जाना ही हर अखबार की नियति होती है। इसके बावजूद पत्रकारिता में रोजाना के इसी संघर्ष को सामने लाना एक पत्रकार का शगल और सनक होता है। विषम हालात में पत्रकार प्रेमचंद के काम को भी मुख्यधारा में लाने की लालसा मन में बनीं रहीं। कहानीकार और उपन्यासकार की तरह ही वे एक समर्थ पत्रकार थे। उनकी क्षमता को नकारना कभी संभव नहीं हो सकता, मगर उनके दिवंगत होने के 75 साल बाद भी पत्रकार प्रेमचंद अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। क्योंकि इसका अभी मूल्यांकन होना बाकी है।

दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला 2010 में अंततः विविध प्रसंग को प्रेमचंद के विचार के नाम से पाने का सुअवसर मिला। किताब पाने की तड़प और बेकली तो खत्म हो गयी। तीनों खंडों को गंभीरता से देखा और मेरी यह धारणा यकीन में बदल गयी कि पत्रकार प्रेमचंद ना केवल एक बड़े पत्रकार थे। मेरी यह धारणा और पुख्ता हो गई कि यदि वे कथाकार या उपन्यासकार होने की बजाय केवल पत्रकार भी होते तो भी प्रेमचंद आज तक हमारे बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और जागरूक पत्रकार की तरह निश्चित तौर पर रहते। अपने समकालीन कालजयी पत्रकारों में पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, बनारसी दास चतुर्वेदी जैसे पत्रकारों की श्रेणी में गिने और माने जाते। हालांकि प्रेमचंद की पत्रकारिता को नकारने या महत्वहीन करार देने वालों में अमृतलाल नागर भी हैं, जो एक साहित्यकार के रूप में साहित्यकार प्रेमचंद की तो भूरि-भूरि सराहना करते हुए कभी नहीं थकते हैं। मगर पत्रकार प्रेमचंद को पहचानने में भूल की।

कथाकार और उपन्यासकार प्रेमचंद की विराट पहचान से अलग अब एक पत्रकार प्रेमचंद को देखने की आवश्यकता है। पत्रकार प्रेमचंद यदि आज हमारे बीच जीवित है तो इसके लिए अमृतराय से भी ज्यादा उन लोगों के प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने पत्रकार प्रेमचंद की ख्याति और रचनात्मक थाती को संभालकर सालों तक सुरक्षित रखा। अमृतरायजी ने लिखा भी है कि ”मुंशी जी”  के इस खजाने की तरफ किसी का भी ध्यान नही गया था, और शायद मेरा भी ध्यान इस ओर कभी नहीं जाता। अगर मुंशी जी की प्रामाणिक जीवनी लिखने के तकाजों ने उसे मजबूर नहीं किया होता। उन सब चीजों की छानबीन की। जिसे मुंशी जी ने जब-तब और जहां-तहां लिखी। पुरातत्व विभाग की इसी खुदाई में ही यह खजाना हाथ लगा। यह लगभग 1600 पृष्ठों की सामग्री थी। अमृतराय ने पत्रकार प्रेमचंद की लगभग लुप्त और दफन हो गयी इन रचनाओं को सहेजने और सुरक्षित रखने का श्रेय लखनऊ और अलीगढ़ विश्वविद्यालय को दिया है।

उर्दू के मशहूर आलोचक प्रो. एहतेशाम हुसैन और डाक्टर कमर रईस को दिया है। मौलाना मोहम्मद अली, इम्तयाज अली ताज के और हमदर्द पत्रिका के प्रति भी आभार जताया है। इन लोगों के सार्थक प्रयासों से ही प्रेमचंद की अधिकांश रचनाएं करीब 25-28 साल के बाद भी सुरक्षित मिली। हिन्दी में लिखी रचनाएं पंडित विनोद शंकर व्यास जी के जरिये ही प्राप्त हो सकी। व्यास जी के काम और संरक्षण से अभिभूत अमृतराय जी ने लिखा भी हैं, कि उनके सहयोग और सविनय से ही प्रेमचंद का यह तेजस्वी पत्रकार का रूप हिन्दी संसार के सामने प्रस्तुत करना संभव हो पाया। पत्रकार प्रेमचंद को सामने लाने के पीछे महादेव साहा और कोलकाता में गहन खोज बीन और तलाश के बाद दर्जनों रचनाएं उपलब्ध कराने वाले श्री नाथ पांडेय जी के प्रति भी अमृत राय ने भाव विभोर होकर आभार जताया है।

आज से करीब 50 साल पहले प्रकाशित विविध प्रसंग में सक्रिय भूमिका निभाने वाले लोगों में शायद ही कोई आज हमारे बीच जीवित होंगे। मैं भी श्री अमृतराय जी समेत उन तमाम लोगों के प्रति भी हृदय से कृतज्ञता प्रकट करके सम्मान देना अपना धर्म समझता हूँ कि सभी ने पत्रकार प्रेमचंद को पहचान दिलाने की पहल की। इन सभी के काम के सामने सही मायने में मेरे काम का तो कोई महत्व ही नहीं है। इस पुस्तक के प्रकाशन के 50 साल हो जाने के बाद भी पत्रकार प्रेमचंद के महत्व को बड़े फलक पर नये तरीके से सामने लाना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है। ताकि मीडिया के सौजन्य से पत्रकार प्रेमचंद को पढ़ने के बहाने हर भारतीय नागरिकों को गुलाम भारत की असली तस्वीर को जानने का एक सुअवसर भी मिल सके।

प्रेमचंद के दिवंगत होने के 75 साल के बाद उनका महत्व तब और ज्यादा बढ़ जाता है जब आज के ग्लैमर युग में टेलीविजन का खबरिया चैनल फाइव सी यानी क्राइम, सेलेब्रिटी, कॉमेडी, सिनेमा और क्लास के इर्द-गिर्द ही घूमते हुए पत्रकारिता को जनसरोकार से जोड़ने की बजाय मीडिया से विमुख कर रहा है। प्रेमचंद के तमाम विद्वानों, समीक्षकों, शोधकर्ताओं, से मेरा यह निवेदन है कि वे पत्रकार प्रेमचंद के तेजस्वी स्वरूप को सामने लाने की पहल को आगे ले जाए। इसके लिए प्रेमचंद की प्राथमिकताओं को नए सिरे से मूल्यांकन की जरूरत है। यह हम सबके लिए सबसे दुःखद पहलू है कि प्रेमचंद की पत्रकारिता की जो सामग्री हमारे बीच है, शायद उससे भी ज्यादा सामग्री नष्ट हो चुकी है। जिसे गहन खोजबीन के बावजूद प्राप्त नहीं किया जा सका है।

खैर, हमारे बीच प्रेमचंद की जो रचनायें उपलब्ध हैं, उससे ही यह दावा और पुख्ता होता है कि वे काफी समर्थ पत्रकार थे। एक पत्रकार के रूप में प्रेमचंद के काम को कभी महत्व के लायक समझा ही नहीं गया। यही लापरवाही हम सबकी सबसे बड़ी पीड़ा है। विद्वानों आलोचकों की तमाम ख्यालों के विपरीत मेरा यह दावा है कि पत्रकार प्रेमचंद की छवि, किसी भी मायने में कमतर नहीं है। इस पुस्तक के पीछे मेरी मेहनत से ज्यादा मेरी बेबसी को देखकर कभी नाराज तो कभी उत्साहित होने वालों की एक लंबी सूची है। मेरे माता-पिता राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा और मां उषा रानी सिन्हा और सास माँ रेणु दत्ता के अलावा मेरी पत्नी डा. ममता शरण और बेटी कृति शरण ने मेरे प्रेमचंद प्रेम को देखकर ही प्रेमचंद को पढ़ना चालू किया। हंसराज पाटिल सुमन और सरिता पाटिल सुमन के प्रति आभार नहीं जताना एक अपराध सा होगा। इससे पहले भी प्रकाशित किताबों के प्रकाशन का यह सिलसिला हंसराजजी के सहयोग से ही आरंभ हुआ। प्रेमचंद को लेकर किस्तों में दर्जनों बार हंसराजजी से मशविरा करने का संयोग बना। खासकर दुर्गेश कुमार द्विवेदी और देवेश श्रीवास्तव समेत शिशिर शुक्ला के प्रति भी आभार जताना मेरा फर्ज है, क्योंकि मैंने जिस अधिकार के साथ रचना संकलन, संपादन और सामग्री चयन के मामले में इन लोगों का समय जाया किया, इसके बावजूद पत्रकारिता के इन नवांकुरों ने कभी शिकायत ना करके हमेशा पूरे उत्साह के साथ मेरे आदेश का पालन किया। मैं इन तीनों उत्साही पत्रकारों के उज्ज्‍वल भविष्य की कामना करता हूं। और भी काफी लोग है, जिन्होंने पत्रकार प्रेमचंद के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर की।

खंड एक में शामिल सभी लेखकों के प्रति भी मैं आभार प्रकट करता हूं, जिनकी वजह से ही मुझे इस पुस्तक को साकार करने में काफी मदद मिली है। शायद यह कहना ज्यादा बेहतर होगा कि इन रचनाओं के बगैर इस पुस्तक की कल्पना कर पाना मेरे लिए लगभग नामुमकिन सा था।

जारी….

लेखक अनामी शरण बबल दिल्‍ली में पत्रकार हैं.

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