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साहित्य जगत

वे दोस्‍त खेल के बाहर से भी खेलते रहे हैं खेल

[caption id="attachment_2731" align="alignleft" width="113"]हरे प्रकाशहरे प्रकाश[/caption]हरे प्रकाश उपाध्याय एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है. बिहार में 5  फरवरी 1981 को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी है. हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ.  भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है. ये जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी चार कविताएं जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक डा. सुभाष राय ने अपने ब्‍लाग साखी पर प्रकाशित की है तथा लिखा है कि मुझे हरे प्रकाश की कतिवाएं प्रस्‍तुत करते हुए हर्ष और गौरव दोनों हो रहा है.

हरे प्रकाश

हरे प्रकाश

हरे प्रकाश

हरे प्रकाश उपाध्याय एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्होंने अपनी और अपने पहले और बाद की पीढ़ियों को एक साथ आकर्षित और प्रभावित किया है. बिहार में 5  फरवरी 1981 को जन्मे इस अग्निधर्मा युवक ने लम्बी अराजक भटकन के बाद अपना दीप्त पथ बना लिया है और उस पर अब आगे बढ़ना जारी है. हरे के शब्दों में मैं हिन्दी का एक गरीब लेखक हूँ, रोटी के लिए पत्रकारिता करता हूँ.  भारतीय ज्ञानपीठ से एक कविता संकलन प्रकाशित है. ये जनसंदेश टाइम्स के फीचर संपादक के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी चार कविताएं जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक डा. सुभाष राय ने अपने ब्‍लाग साखी पर प्रकाशित की है तथा लिखा है कि मुझे हरे प्रकाश की कतिवाएं प्रस्‍तुत करते हुए हर्ष और गौरव दोनों हो रहा है.

डा. राय के शब्‍दों में, ” मैंने साखी के लिए रचनाएँ मांगी तो उन्होंने बदहवासी में एक साथ लिखी तीन कविताएँ मुझे मेल कर दीं. मैंने एक और रचना उनके संकलन से उठा ली, जो बदहवास समाज के बारे में है. प्रस्तुत है हरे प्रकाश उपाध्याय की चार कविताएँ….” साखी से ही साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

एक

माघ में गिरना
कविता मिली थी
बहुत दिनों के बाद
सावन के बाद माघ में
एक पेड़ के नीचे
पत्ते बुहार रही थी
चूल्हा जलाना था उसे शायद
हमने उलाहने नहीं दिए
उसने देखा एक नजर मेरी तरफ
मैं थोड़ी दूर पर शीतल हवा में कांपते हुए पत्तों सा
ठिठुरता अपने गिरने की प्रतीक्षा करते हुए
उसे देखता रहा भौंचक

हम यों तलाश रहे थे बरसों से
एक-दूसरे को हर सावन के मौसम में
ईश्वर की लीला ही कहिए जनाब कि
माघ में जब बिना ढूंढे मिले
अचानक
तब वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी
मैं रचता क्या उसे
रचा तो मुझे जाना था…

हम देर तक देखते रहे
नहीं पता क्या-क्या
उसकी आंखों के कोर भीग गए
और मैं गिरा तो उठ न सका…

जान-पहचान नये सिरे से हो रही थी।

दो

मायावी यह संसार
अधिकांश चीजें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल तुम पागल हो और एक दिन तुम पागल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी तुम जरा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं. दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो….
अधिकांश चीजें मायावी हैं…

जिनकी आवाजों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज न आए
उसी आवाज पर पागल पिया..
जहां रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहां नहीं, यहां नहीं, यहां नहीं…
पता नहीं कहां
चल कहीं चल मितवा…
अधिकांश चीजें मायावी हैं…

जिन चीजों से प्रेम वे अत्यंत अधूरी
इन अधूरी चीजों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दुःखी एक पहेली…

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घंटे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लंबी उम्र गुजार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम…

तीन

कविता के बारे में एक बड़बड़ाहट
कविता, ओ कविता
क्या तुम गरीब की जोरू हो…
नहीं तो क्यों इतने सारे लोग
तुम्हें भौजाई बनाए हुए हैं
कोई तुम्हें चिकोटी काट रहा है
कोई कागज के बिस्तर पर नचा रहा है तुम्हें

कोई माइक पर गूंजते
कुछ निहायत उपयोगी शब्दों के लिबास में तुम्हें पेश कर रहा है
कोई तुम्हें बेच रहा है
कोई खरीद रहा है
खाने-कमाने का काम भी ले रहे तुमसे कुछ लोग
क्या तुम ही हमारे समय की कामधेनु

तुमसे करते हैं इतने लोग जो प्रेम
क्या सब देह-संबंधी हैं तुम्हारे?
रहने दो कुछ गोपनीय प्रश्न और भी हो सकते हैं
कुछ लोग मां कहते होंगे तुम्हें, बुरा मान जाएंगे
जाओ जीयो अपनी जिंदगी, जाओ
नदी की तरह, हवा की तरह…चाहे जैसे

पर कविता को फसल की तरह
काटनेवाले कवियों
एक न एक दिन तुम्हें हिसाब देना ही होगा…

चार

खिलाड़ी दोस्त
खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं

वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं

वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की

सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं

दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम

हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं

दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम

उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल

जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
‘भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे’

खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!

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