कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानियों के बारे में टिप्पणी करते हुए मशहूर कथाकार मार्कण्डेय ने लिखा है कि जब हम एक बार लौटकर हिन्दी कहानी की यात्रा पर दृष्टि डालते हैं, और पिछले 70-80 वर्षों की सामाजिक विकास की व्याख्या करते हैं, तो बहुत सुविधा पूर्ण तरीके से कह सकते हैं कि कहानी अब तक प्रेमचंद से चलकर प्रेमचंद तक ही पहुंची है। अर्थात सिर्फ प्रेमचंद के भीतर ही हिन्दी कहानियों के इस लंबे समय का पूरा सामाजिक वृतांत समाहित है। समय की अर्थवत्ता जो सामाजिक संदर्भों के विकास से बनती है, वह बहुत मामूली परिवर्तनों के साथ आज भी जस की तस बनीं हुई है। यहां पर एक सवाल हो सकता है कि क्या प्रेमचंद के बाद का समय जहां का तहां ही टिका रह गया है? क्या समय का यह कोई नया स्वभाव है? नहीं ऐसा नहीं है।
फिर भी संदर्भों के विकास की प्रक्रिया जो सम स्थानिक परिवर्तन से रेखांकित होती है, और समय ही उसका कारक होता है। वह नहीं के बराबर हुई है। आधार भूत सामाजिक बदलाव नहीं है। इस लंबे काल में नया समाज नहीं बन पाया है। धार्मिक अंधविश्वासों और पारम्परिक कुंठाए जैसी की तैसी ही बनीं हुई है। भूमि संबंध नहीं बदले हैं। अशिक्षा सामाजिक कुरीतियों का अंधकार लगातार छाया ही हुआ है। अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। विख्यात कथाकार मार्कण्डेय की 1995 में की गयी यह टिप्पणी पिछले 16 साल में भी अपनी सार्थकता के साथ तेजी से बदलते समाज में जस की तस ही टिका हुआ है। इसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। मार्कण्डेय की उपरोक्त टिप्पणी आज प्रेमचंद के दिवंगत होने के 75 साल के बाद तो मानो और अधिक सटीक सी हो गई है।
प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि भारत आज भी नहीं बदला है। और भारत को यानी असली भारत को प्रेमचंद के चश्मे के बगैर देखा और समझा भी नहीं जा सकता है। पत्रकार प्रेमचंद को पढ़ते हुए खासकर अंतरराष्ट्रीय खबरों को देखकर हैरानी होती है। आज से 80-85 साल पहले जब संसार में रेडियो नामक यंत्र का अविष्कार नहीं हुआ था, और खबरों की पहुंच दूर-दूर तक नहीं थी। हर तरह के साधनों की कमी के बावजूद खासकर विदेशी खबरों और सामयिक हलचलों पर निगरानी रखने की कल्पना कर पाना भी आसान नहीं था। एक पत्रकार के रूप में प्रेमचंद ना केवल औरों से ज्यादा सतर्क थे बल्कि दूर-दूर की नजर भी रखते थे। छोटी छोटी घटनाओं को अपनी कलम और व्याख्या से सारगर्भित बनाने की कला तो आज के पत्रकारों को भी प्रेमचंद को पढ़कर सीखना चाहिए। प्रेमचंद की भाषा को एक मानक बनकर आज के पत्रकारों को यह बताती है कि रिपोर्ट किसे कहते हैं। लिखने और प्रस्तुत करने के मामले में तो प्रेमचंद का कोई जोड़ ही नहीं है।
परिवर्तन ही समय का विधान है। पिछले 100 साल में काफी बदलाव हुए हैं। गुलाम भारत में दिवंगत हुए प्रेमचंद को हम आजाद भारत के सातवें दशक में याद कर रहे हैं। आजादी के सातवें दशक में भी प्रेमचंद के समय के भारत और समकालीन भारत की तुलना करें तो दोनों को एक समान ही पाते हैं। 1947 में आजादी के समय भारत का सैद्वांतिक तौर पर धरती का बंटवारा हुआ था। देश के नक्शों में बदलाव आया था। मगर आजादी के सातवें दशक के आते-आते बगैर किसी विभाजन के ही भारत के दो टुकड़े हो चुके हैं। भारत यानी इंडिया बनाम भारत। अमीरों, लोगों के इंडिया में अरबपतियों खरबपतियों से लेकर घोटालेबाजों की कोई कमी नहीं है। अमीरों के इसी भारत को आज इंडिया कहा जाता है, जिसमें काले अंग्रेजों की भरमार है। रहने को वे भले ही इंडिया में हैं, मगर उनकी बातों में स्वप्न में भारत को छोड़ पूरा संसार ही समाहित है। अमीर भारत और गरीब भारत में विभाजित भारत के दो हिस्से हो चुके हैं। अमीर भारत में अब करोड़पतियों की नई पीढ़ी है। चर्चा अब अरबपतियों-खरबपतियों की होने लगी है और इनकी तादात भी लाखों में है।
इण्डिया में मॉल्स, मैट्रो, मोबाइल्स, मल्टीनेशनल्स, मल्टीस्टोरी अपार्टमेंटस और मोटर वाहनों का चस्का लग गया है। भारत देश का इंडिया आज झूम रहा है। इंडिया और भारत के बीच की दूरी लगातार चौड़ी हो रही है। इंडिया में बेशुमार घोटालों और एक से बढ़कर एक निराले मतवाले और बड़े बड़े बेशरम धाकड़ घोटालेबाजों की कतार लगी है। और घोटाले भी ऐसे होने लगे हैं कि हजारों करोड़ के घोटालेबाजों को भी अब शर्म आने की बजाय पछतावा होने लगा है कि हाय हमने घोटाले भी किया तो मात्रा हजारों करोड़ का ही घोटाला क्यों किया? इन घोटालेबाजों को लगता है मानों और बड़ा घोटाला क्यों नहीं किया? केंद्रीय मंत्री ए. राजा जैसे घोटालेबाजों के राजा के सामने तो बोफर्स, चारा आदि घोटाले के महान घोटालेबाज अब साधु-संत से शरीफ से दिखने लगे हैं।
अब हालत यह है कि गरीब भारत से गरीबी को हटाने की बात करते-करते ज्यादातर नेता अपनी कंगाली से मालामाल हो गये। हमारे ज्यादातर नेताओं की औकात एक कबाड़ी से करोड़ों-अरबों की हो गई है। घोड़ा रेसर कबाड़ीबाज हसन अली जैसा एक गुमनाम शाही रईस एकाएक प्रकट हुआ है, जिस पर 50 हजार करोड़ रुपए बाकायदा केवल आयकर का बकाया है। गरीब भारत के संसद में अमीर और अपराधी-माफिया नेताओं का जलवा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इंडिया में रहने वाले 10-15 प्रतिशत नवधनिक मालदार (जिसमें ज्यादातरों के अमीर बनने की कहानी परियों की कहानी सी है) लोगों की वजह से ही इंडिया एक ग्लोबल मनी पावर की तरह देखा (माना भले ही ना जाए) जाने लगा है।
बेशुमार (बेरोकटोक) आबादी की वजह से दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी इंडिया बन चुका है। एक तरफ बेशुमार धन दौलत की काली कमाई से लोग अघा से गए हैं। बोरियों में नोटों की गड्डियां रखी जा रही हैं, तो देश की 80 फीसदी आबादी आज भी दस हजार रुपया महीना कमा नहीं कमा पा रहा है। सारा जलवा 10-15 फीसदी नये कुबेरों का जलवा है। जहां पर प्रेमचंद नहीं खुशवंत सिंह, शोभा डे या इसी प्रकार के सेक्स प्रधान दर्जनों लेखकों की धूम है, जिनके लिए बेटी और 18 साल की कोई भी लड़की बस बिस्तर की तकिया सी दिखती है। क्राइम, कॉमेडी, सिनेमा, सेलीब्रिटी के न्यू रीच क्लास के इर्द-गिर्द घूम रहे इंडिया के न्यूज चौनलों में भारत का हंसता-खेलता खुशहाल चेहरा ही प्रकट होकर दिखता है। फैशन और समय की डिमांड पर नशा से लेकर शराब-सुरा का धंधा परवान पर है। इंडिया में मनीपावर के सामने आदर्श, नैतिकता, कल्चर, और शरम हया की बातें बेमानी सी हो गई हैं। समय के साथ कहें या उससे भी तेजी से मॉर्डन हो रही युवा पीढ़ी तो फैशन के नाम पर कपडों से ही परहेज करने लगी हैं। भारी भरकम और पारम्परिक कपड़ों के बोझ को कम करने पर तुली हैं। तो ठीक दूसरी तरफ कपड़ों के अभाव में ज्यादातर गरीब घरों की लड़कियों का शरीर ठीक से नहीं छिप पा रहा है। बदतर, बेहाल, और कंगाल सरीखे दिख रहे भारत में कंगालों की फौज लगातार बढ़ रही है।
अपनी ईमानदार के लिए मशहूर पीएम का पूरा शासन ही करप्शन का राज बन चुका है। रोजाना घोटाले हो रहे हैं। फिर भी सत्ता की चौकड़ी और करप्शन धमाल के बीच ईमानदारी का (बैंड बजाकर) सरकार के दाग-ए-दामन धोए जा रहे हैं। पंजा हो या कमल, साईकिल हो या लालटेन, हाथी हो या कोई और भी चुनावी चिन्ह चारों तरफ दाग ही दाग नजर आने लगे हैं। करप्शन और घोटाले के बीच कोई बेदाग नहीं दिख रहा। ऐसा लग रहा है मानो पूरा भारत ही अपनी तमाम पुरानी (कथित दकियानूसी) सभ्यता, संस्कार को भूलकर भ्रष्टाचार के दलदल में स्नान कर रहा हो। भारत में कंगाली से उबकर महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका आज आत्महत्याओं के लिए विख्यात हो गया है। पिछले एक दशक में 15 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। कृषि प्रधान भारत के कृषि मंत्री पूरे देश में क्रिकेट की सौदेबाजी कराने में व्यस्त हैं। अनाज और फल सब्जियों की मंड़ी भले ही वीरान पड़े हों, मगर पवार के पावर से क्रिकेट की मंड़ी में मस्ती ही मस्ती है। भारत में किसानों की हालत का अंदाजा लगाने के लिए और को क्या कहा जा सकता है?
अलग राज्य की मांग कर रहे बुंदेलखंड के किसान और गरीब भी अकाल की मार से बेहाल हैं। अपने बच्चों को बेचने के लिए विवश बुंदेलखंड भी भारत का एक काला सच और बदनाम चेहरा है। भूखमरी के लिए पूरी दुनियां में बदनाम कालाहांडी की किस्मत आज भी नहीं बदली है। अलबत्ता, राशन और राहत पहुंचाने के नाम पर नेता, नौकरशाहों और दलालों की मंडली बेशक करोड़पतियों की हो गई है। झारखंड के कालाहांडी के रूप में बदनाम पलामू की तस्वीर भी आज विदर्भ और कालाहांड़ी से खास अलग नहीं है। यहां के सैकड़ों किसानों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सामूहिक आत्महत्या की अनुमति मांगी है। सरकार द्वारा इन्हें राहत देने की बजाय सरकार और निष्ठुर प्रशासन की तरफ से राष्ट्रपति को पत्रा लिखने वालों की तलाश की जा रही है, ताकि उन्हें सच बोलने की सजा दी जा सके। इसके बावजूद इंडिया की ईमानदार सरकार के संवेदनशील राष्ट्रपति से लेकर पीएम का दिल विह्नल नहीं होता। दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार के ठीक नाक के नीचे हरियाणा का मेवात इलाका भी गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा, बदहाली के लिए भारत का एक बदनाम चेहरा है। उत्तर भारत के कालाहांडी के रूप में बदनाम, बेहाल हरियाणा का मेवात इलाका किसी भी सभ्य समाज की संवेदनशील और ईमानदार सरकार के चेहरे पर कालिख पोत देती है। मगर आजादी के सातवें दशक में भी ईमानदार पीएम या दलितों के सबसे बड़े हमदर्द दिखने के दिखावे में लगे युवराज को भी इन बेहाल इलाकों की सूरत बदलने की पीड़ा आहत नहीं करती।
भारत का इसे असली चेहरा कहें या इंडिया में असली भारत की असली तस्वीर। बक्सर से बिजनौर, बीकानेर तक, गंगानगर से लेकर मुजफ्फरनगर या मुजफ्फरपुर तक राजस्थान से लेकर हरियाणा, वेस्ट यूपी, बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश समेत छतीसगढ़ तक लड़कियों से धंधा कराने, बेचने, या द्रौपदी बनाकर कई भाईयों के लिए एक ही रखैल (पत्नी) रखने या शादी के लिए लड़कियों की कमी को पूरा करने के लिए लड़की खरीदने की कुप्रथा भी अब सामाजिक प्रथा सी बन गई है। प्रेम विवाह आज भी भारत के ज्यादातर हिस्सों में मौत का फरमान ही बन जाती है। कहीं दास प्रथा के नाम पर मंदिर में दलितों और महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। आधुनिक हो रहे इसी भारत में महिला शोषण के नाम पर सदियों से चली आ रही रखैल प्रथा को आज लिव इन रिलेशन के नाम पर महिमामंड़ित किया जा रहा है। विमेन फ्रीडम, या नारी आजादी के नाम पर ज्यादातर माडर्न विमेन इतरा रही है। मानो लिव इन रिलेशन के नाम पर इन्हें न जाने क्या और कौन सी आजादी या कारू का खजाना मिल गया है?
लगभग यही हाल समलैंगिकों-लेस्बियनों का है। अपने सेक्स संबंधों को नेचुरल रिलेशन का ठप्पा दिलाने (लगवाने) के लिए इनकी टोली अक्सर दिल्ली में धमाल मचाती फिर रही है। इन संबंधों के समर्थन हजारों लोग हमेशा कहीं ना कहीं मदमस्त कार्यक्रम कर रहे है। समाज में सेक्स को लेकर तमाम तरह की वर्जनाएं हैं। जिससे मुक्ति की चाहत के लिए देश के ज्यादातर इलाकों में संघर्ष बदस्तबर जारी है। कोई देहव्यापार को मान्यता दिलाने की वकालत कर रहा है, तो कोई चकलाघरों की चक्करघिन्नी के खात्मे को लेकर संघर्ष कर रहा है। रेडलाइट एरिया का धंधा मंदा क्या पड़ गया मानो बड़े शहरों से लेकर मंझोले और छोटे शहरों में कालगर्ल के नाम पर देह के लाखों दुकान खुल गए। पैसे के लिए सबकुछ जायज मान लिए गए इंडिया में एवरी थिंग इज राइट का नया मुहावरा सब कुछ मान्य और सामान्य सा (सारे हालात को) कर रहा है। भारत में प्रेमचंद का असली भारत तो बेहाल सा है, मगर इस समय इंडिया के निवासी मौज मस्ती और धन के नशे में चूर है।
भारत बनाम इंडिया के ग्रामीण भारत में आज भी प्रेमचंद की कहानियों के ही गांवों की कहानी है। प्रेमचंद के पात्र ही नाम बदल -बदल कर जिन्दा घूम टहल रहे हैं। प्रेमचंद को पढ़ना ना केवल उनके साहित्य को पढ़ना है, बल्कि एक सौ साल पहले लिखी गई भारत यानी असली भारत की जीवंत कहानी को आज भी देखना और महसूस करने के बराबर है। प्रेमचंद की कहानियां को यों कहें कि पूरा साहित्य में मानो, आज समय के साथ खत्म होने की बजाय इंडिया के लगातार पावरफुल होते समय में भारत के साढ़े छह लाख से भी ज़्यादा गांवों की सरकारी (नौकरशाही) उपेक्षा का एक श्वेतपत्र बन गयी है। जिसमे सरकारी उपेक्षा और सरकारी विकास के नाम पर गांधी और ना जाने किन किन के नाम पर अरबों खरबों की बंदरबांट के बाद भी इन योजनाओं से गांव, गरीबी और गरीबों को ही खत्म करने की बू आने लगी है। जल, जंगल और जमीन से हमेशा के लिए बेदखल कर दिए जाने वालों के वास्ते सरकार और गैरसरकारी संगठनों द्वारा पुर्नवास के नाम पर तोहफों की बारिश तो जरूर की जाती है, मगर पूरे देश में एक नहीं हजारों क्षेत्रों से अब तक उजाड़े गए करोड़ों लोगों की यह पीड़ा खत्म नहीं हुई। पिछले 65 सालों में और गहरी ही हुई है कि एक बार उजड़ने वालों का पुर्नवास आज तक फिर दोबारा कभी नहीं हो पाया। अलबता, उजड़ने वालों को बसाने के नाम पर लगे लोग इस कदर आबाद जरूर हो गए और देखते ही देखते करप्ट लोगों का यह सफेदपोशों, नौकरशाहों, ठेकेदारों और बाबू क्लास तो भारत को छोड़कर इंडिया में जा बसा। जहां से वह और उसके लोग भारत को गालियां देते हुए यहां के गरीबों को कोसते फिर रहे हैं।
सचमुच, आज जो कुछ भी कहीं भारत या इंडिया में हो रहा है वह करीब 100 साल पहले ही भांप चुके प्रेमचंद की नजर से बाकी नहीं रहा था, मगर इतने बुरे हाल की कल्पना तो शायद हमारे प्रेमचंद ने भी नहीं की थी, कि अपना भारत यानी इंडिया इतना महान निकलेगा। उन्होंने उन तमाम संकटों, समस्याओं के प्रति हमें आगाह भी किया था। एक पत्रकार के संदर्भ में देखें तो सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, जातिवाद, दहेज, अशिक्षा मंदिर में दलित प्रवेश आदि पर तो वे एक सौ साल जो पहले लिखा था। बस समय, समाज, संदर्भ और इलाके के नाम भर बदलकर हमारे सामने इस तरह की घटनाएं हमेशा सामने आ रही हैं। विख्यात साहित्यकार दिवंगत अमृतलाल नागर ने प्रेमचंद के बारे में लिखा भी है कि प्रेमचंद से पहले तक सदा राजे महाराजे राजकुमार, जमींदार और कुलीनों से नीचे वाला कोई पात्रा कथानायक के सिंहासन पर कभी नहीं बैठ पाया था। भारतीय समाज में पहली बार प्रेमचंद के सूरे, घीसू, होरी, सिलिया, पठानी, या गबन का नायक चुंगी क्लर्क जैसे सामान्य से सामान्य पात्र ही कथानायक बनकर उभरे। नागर कहते हैं कि जीवन के जिस यथार्थ को प्रेमचंद ने पहचाना और साहित्य एवं पत्रकारिता में स्थापित किया, वह एक तरह से उनका समाज में अनेक प्रकार से भोगा गया अपना यथार्थ था। निम्न मध्यवर्ग के ग्रेजुएट प्रेमचंद खेती क्लर्की प्रधान हिन्दी भाषी इलाके का सबसे सटीक प्रतीक बन गया। साहित्य पर प्रेमचंद के प्रभाव ने यह सिद्ध किया है कि जबतक भारत देश संपंन्न नहीं हो जाता, तब तक उनके साहित्य का नायकत्व दीनहीन, दलित, और संघर्षशील नर नारी के हाथों में ही रहेगा।
प्रेमचंद ने अपने देशनायकों को पहचाना और उसके सबसे बड़े चितेरे बन गए। प्रेमचंद की पत्रकारिता का मूल स्वर भी सामाजिक सरोकारों से लबरेज है। दिवंगत नागर लिखते भी है कि प्रेमचंद लोकमानस के अनोखे पारखी थे। वे हमारी वह निधि हैं, जिस पर हम हमेशा गर्व करते रहेंगे। यही हाल यही व्याख्या एक पत्रकार प्रेमचंद की भी होनी चाहिए, क्योंकि पत्रकार प्रेमचमद ने साहित्य से इतर पत्रकारिता में जो नयी शैली और नजरिया आरंभ किया था उसकी आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है। प्रेमचंद को एक पत्रकार की तरह देखना मेरा कोई धर्म नही है। बस आज के समय में प्रेमचंद का मूल्यांकन एक पत्रकार के रूप में भी होना चाहिए यही मेरा मूल मकसद है। इस काम में तमाम मित्रों और लोगों ने जो मदद की है, उसके लिए आभार जताना केवल दिखावा होगा। मैं सबों के प्रति तहे दिल से आभारी हूं। खासकर प्रकाशक राघव के प्रति तो खासकर जिनकी उम्मीदों पर मैं कभी खरा नहीं उतर सका। एक सप्ताह के लिए वादा करके पांडुलिपि को साथ लाता और दो एक माह तक लापता हो जाता। मेरी तमाम लापरवाहियों का वे खामियाजा उठाते रहे, लिहाजा राघवजी के इंतजार के बगैर इसे साकार करना नामुमकिन था। पाठको से यह महज औपचारिकता नहीं सही मायने में कह रहा हूं कि इसमें जो भी त्रुटियां रह गई हो तो वे इस ओर मेरा ध्यान जरूर दिलाने का कष्ट करेंगे, ताकि बाद के संस्करणों में इसे सुधारा जा सके।
पत्रकार अनामी शरण बबल ने मशहूर कथाकार और उपन्यासकार प्रेमचंद को एक पत्रकार के रूप में स्थापित करते हुए तीन खंडों में ”प्रेमचंद की पत्रकारिता” पुस्तक का संपादन किया है। इस पुस्तक के दो खंडों में अनामी ने जो भूमिका लिखी है, उसे भडास4मीडिया के पाठकों के लिए खासतौर पर प्रस्तुत किया गया है.

