लोकसभा चुनाव के शंखनाद के साथ उत्तर प्रदेश में सियासी कुरूक्षेत्र के लिए सेना सज गयी है। सेनाओं के सेनापतियों द्वारा पाला बदलने के बाद राजनैतिक समीकरण बीते विधानसभा चुनावी संग्राम के सियासी गणित से उलट गये है। कल तक मुलायम सिंह यादव पानी-पी-पी कर मैडम सोनिया गांधी को कोसते नहीं थकते थे। आज वे ही सोनिया गांधी की शरण में पहुंच चुके हैं। सोनिया गांधी के रथ के आगे से कंकड़ पत्थर अलग करने को आतुर मायावती आज दो-दो हाथ आजमाने को तैयार हैं। मुस्लिम और ब्राह्मण एक बार फिर संग्राम के सबसे बड़े वोटों के मददगार बनकर उभरे हैं जिन्हें लपकने के लिए राजनैतिक दल अनेक प्रकार के लालीपाल देकर उन्हें अपने खेमे में करने की पुरजोर कोशिश में लग गये हैं। ब्राह्मण समीकरण के बल पर 16 वर्ष बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनीं बसपा सुप्रीमो मायावती इसी गणित के आधार पर देशव्यापी ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही हैं तो मुलायम सिंह भी पीछे नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के ऊपर होने वाले अत्याचारों को मुद्दा बनाकर माया को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।
मजे की बात तो यह है कि मायावती ने मुस्लिम प्रेम में सनातन संस्कृति के सबसे बड़े केन्द्र वारणसी में माफिया
विधायक मुख्तार अंसारी को लोकसभा प्रत्याशी बनाकर ब्राह्मणों को नाराज कर दिया है।
इसी नाराजगी की भरपाई के लिये बसपा महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों को एकजुट करने के लिये सम्मेलन करने में जुट गये हैं। ब्राह्मण समाज पहले की तरह इस बार बसपा के साथ लामबंद होगा या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। भारतीय जनता पार्टी भी ब्राह्मणों को पार्टी में जोड़े रखने के लिये अपनी कमान रमापति राम त्रिपाठी तथा कलराज मिश्र के हाथों सौपकर ब्राह्मण दांव खेल रही है। कांग्रेस भी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में डा० रीता बहुगुणा जोशी को सेनापति बनाकर लोकसभा का समर लडऩे के लिये अपने प्यादे तैयार करने में जुटी है। कांग्रेस और सपा के समझौते के बाद बचाव की मुद्रा में आयी बसपा ने उलेमा एक्सप्रेस के माध्यम से आजमगढ़ से मुस्लिमों के दल का दिल्ली और लखनऊ में प्रदर्शन कराके सपा को नुकसान पहुंचाने की कवायद कर रही है तो भारतीय जनता पार्टी इस प्रदर्शन का भरपूर लाभ लेना चाहती है। भाजपा जानती है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के साथ-साथ प्रतिक्रया स्वरूप हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण स्वत: हो जाता है। इसीलिए भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ह्रदयनारायण दीक्षित ने कहा कि लखनऊ में प्रदेश सरकार से गुप्त डील से उत्साहित उलेमा प्रदर्शनकारियों ने आजमगढ़ के सिसरहा बाजार में हिन्दुओं पर धावा बोला और दलितों को पीटा, लेकिन पुलिस ने हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टे हिन्दुओं को ही पुलिस ने भी कानून का पाठ पढ़ाया।
मुलायम सिंह कल्याण प्रेम के कारण अपना कल्याण कितना कर पाते हैं, यह चुनावी रिजल्ट के बाद ही पता चलेगा। लेकिन यूपी में भारतीय जनता पार्टी को कल्याण द्वारा टाटा करने से अनेक सीटों पर समीकरण गड़बड़ाने की पूरी सम्भावना बन गयी है। भाजपा में भगदड़ के हालात बनते जा रहे है। पुत्र मोह ने भाजपा को उस राह पर ला दिया है जहां से पतन के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता। अनुशासन और आन्तरिक लोकतंत्र का नगाड़ा पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी इन दिनों अपने ऊर्जा प्रदेश, उत्तर प्रदेश में सिमटती नजर आ रही है। राम के नाम पर दिल्ली का ताज पा चुकी भाजपा को राम का नाम त्यागना अधोगामी हो गया है। भाजपा के ताबूत में कील ठोकने पर अमादा कांग्रेस और सपा के लिये इससे अच्छा मौका फिर कभी मिलने वाला नहीं है। राजनैतिक प्रेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश की 8० सीटों में सिर्फ 25 सीटें बहुजन समाज पार्टी के खाते में जाती नजर आ रही है। भाजपा के 5 सीटों तथा रालोद को 2 सीटों पर सिमट जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। शेष सीटों पर सपा कांग्रेस गठबंधन की पौबारा होने का गणित नजर आ रहा है। मुस्लिम समाज में राष्ट्रव्यापी स्तर पर कांग्रेस के पक्ष में विकसित होने के कारण यूपीए को सियासी लाभ मिलेगा। भाजपा के पीएम इन वेटिंग का गणित गड़बड़ा जाने से भाजपा का जनाधार हाशिये पर चला गया है। भाजपा की हालात यह है कि प्रदेश के कई बड़े महानगरों में पार्टी को प्रत्याशी तक नहीं मिल रहे हैं। बुन्देलखण्ड में सूपड़ा साफ करा चुकी भारतीय जनता पार्टी अवध और पूर्वाचल में भी हाशिये पर नजर आने लगी है। कांग्रेस के लिये मध्य उत्तर प्रदेश तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजबूती के साथ इस बार उभरने की सम्भावना बन रही है।
मुस्लिम समुदाय ने अपने अधिकारों को लेकर वादा खिलाफी के नारे लगाते हुये माया सरकार को घेरने की कोशिश की है तो पूरे प्रदेश में कानून और व्यवस्था की समस्या खड़ी होती नजर आ रही है। हाथरस में पेशी पर लाये जा रहे दो बन्दियों की अदालत परिसर में दिनदहाड़े हत्या अपराधी तत्वों के बड़ते दुस्साहस का परिणाम है। सपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव चुटकी लेते हुए कहते हैं कि बसपा ने नया नारा अपना लिया है- गुण्डे सब हैं अपने साथी, जिता रहे हैं अपना हाथी। कांग्रेस के प्रदेश महासचिव भानु सहाय कहते हैं कि किसान कराह रहा है। बुन्देलखण्ड में किसानों के नाम पर करोड़ों रुपये की बन्दरबांट हो गयी है। वृक्षारोपण के नाम पर लूट का नंगा नाच हुआ है। प्रदेश की जनता ने माया को मुलायम से मुक्ति के लिये चुना लेकिन एक दो कदम के बाद सारे सपने धराशाई हो गये हैं।
दौलत की चमक ने सबको पागल बना दिया है। लखनऊ की गद्दी पर बैठी माया सरकार जनता से चार कदम की जगह चार हजार कदम पीछे चली गई हैं। इससे अपरिचित मायावती दिल्ली की गद्दी का दम भर रही हैं। यहां गरीबों को दोनों समय की रोटी भी मयस्सर नहीं, किसानों की जमीन, गंगा एक्सप्रेस हाइवे और बड़े-बड़े मालों के नाम पर जबरन छीने जाने के बाद बादलपुर और ग्रेटर नोएडा में सड़कों पर बिखरे खून के छीटों ने प्रदेश की सियासी तस्वीर बदल दी है। आम आदमी के लिये सरकार क्या होती है, यह जानकर उत्तर प्रदेश की जनता कराह उठी है और उसने परिवर्तन का मन बना लिया है।
गठजोड़ और जोड़-तोड़ का मौसम आ गया है। सभी पार्टियां अपने-अपने राजनीतिक खेल ठीक-ठाक करने में जुट गयी हैं। अपनी उपलब्धियों, अपने आदर्शों या जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं पर अब राजनैतिक दलों को भरोसा नहीं रहा। पूरा चुनाव मनाओ-पटाओ की तर्ज पर ज्यादा से ज्यादा गुटों, जातियों और समुदायों को किसी भी तरह अपने पक्ष में कर लेने का कौशल बन कर रह गया है। इसीलिए सभी को चुनाव प्रबंधन की महारत वाले लोगों की जरूरत है। भाजपा मुख्य रूप से राम की कृपा पर आश्रित है। बसपा और कांग्रेस मुसलमानों तथा ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचने के प्रयास में लगी है।
वोट कटवा दलों की होगी चांदी
लोकसभा चुनाव की पूर्ण संध्या पर छोटे-छोटे वोट कटवा दल अपने झण्डे और डंडे लेकर मैदान में आ गये हैं। इन दलों
ने गठबंधन की राजनीति को भी अपनाने का मन बना लिया है। मुस्लिम राजनीति पर पीस पार्टी के डा. आयूब सैय्यद तथा उलेमा कांउसिल बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। दलित जातियों को अपने झण्डे में लेकर दलित मोर्चा में इण्डियन जस्टिस पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी, आर.पी.आई. पार्टी आगे आयी है। आजमगढ़ के मुसलमानों पर शक के खिलाफ खड़ी हुई उलेमा कांउसिल अब सियासी सफर शुरू करने जा रही है। लखनऊ संसदीय सीट पर वो अपना प्रत्याशी तो घोषित कर ही चुकी है, अब वह छोटे दलों के साथ मिलकर राजनीति का बड़ा मंच तैयार करना चाहती है। काउंसिल के संयोजक मौलाना आमिर रशादी ने कहा, सोने लाल पटेल, आरके चौधरी, ओम प्रकाश राजभर की पार्टियां उनके सम्पर्क में हैं। कभी सीधे और कभी किसी के मार्फत उन लोगों से लगातार बातचीत चल रही है। हम उन लोगों के साथ गठबंधन करना चाहते हैं जो अभी तक सत्ता में नहीं रहे और मुसलमानों पर होने वाले जुल्म के खिलाफ लड़ऩा चाहते हैं।
इस सवाल पर कि कतई एक गैर सियासी मकसद (आजमगढ़ के हर मुसलमानों को आतंकी न समझा जाए) के लिए तैयार की गई ताकत का इस्तेमाल अचानक सियासत में करने के पीछे की वजह क्या है, उमेला काउंसिल के संयोजक ने कहा, यह वक्त की जरूरत है। मुसलमान का राजनीतिक रूप से ताकतवर होना जरूरी हो गया है। जिस दिन वह राजनीतिक ताकत बन जाएगा, उस दिन से कोई भी उसे न तो आतंकवादी कह पाएगा और न ही बेमकसद के दंगों में उसका कत्ल होने पाएगा। मौलाना ने खुल कर कहा- मुसलमान जहां भी अच्छी तादाद में है हम वहां अपना उम्मीदवार उतार सकते हैं और अगर छोटे दलों के साथ कोई बड़ा गठबंधन तैयार हो गया तब तो हम पूरे प्रदेश में उम्मीदवार उतारने की स्थिति में होंगे। यह पूछे जाने पर कि जिस संगठन से उलेमा जैसा पवित्र शब्द जुड़ा हो, जिसका गठन गैर-सियासी रहा है, उसे क्या सियासत करनी चाहिए, मौलाना ने कहा इस्लाम में कहां पर यह लिखा हुआ है कि सियासत नहीं करनी चाहिए या सियासत गंदी चींज है।
उधर उलेमा काउंसिल के इस कदम से कई दूसरे मौलाना हताप्रभ है। लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, वो शुरू से ही इस राय के हैं कि मजहब व सियासत अलग-अलग हैं। इन्हें एक में नहीं मिलाना चाहिए। जो दल अभी तक घालमेल करते रहे हैं, उनकी आलोचना होती रही है। राजनीति में धर्म को शामिल करके भाजपा ने फतह हासिल की थी, उसी इतिहास को मुस्लिम मौलाना भी दोहराना चाहते हैं।
मुसलमानों को समझना होगा : डा. इकबाल
शिक्षाविद् डा. इकबाल खान मुस्लिम राजनीतिक पर टिप्पणी कुछ इस तरह करते हैं- गुजरात नरसंहार के दोषी नरेन्द्र मोदी की पीठ थपथपाने वाली मायावती को भी माफ ही किया है। कितने ही शिवसेना के नेताओं को अपने यहां एडजस्ट करने वाली कांग्रेस को लगातार माफ कर ही रहे हैं। जब मुसलमान आज तक अपने कुसूरवारों को माफ करता आ रहा है, तो कल्याण सिंह को माफ करने में इतनी तंगदिली क्यों दिखा रहा है। यह मुसलमानों की सरासर नासमझी है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए पर्याप्त माहौल बनाने वाले मुलायम सिंह को तो माफ कर दिया और कल्याण सिंह को पकड़े हुए हैं। मुस्लिम वोट बैंक से प्रेरित राजनीति के सिलसिले में एक और बात अच्छी तरह से समझ जानी चाहिए कि हिंदुस्तान का आम मुसलमान वह मुसलमान है जो मजदूर है, कामगार है, मिस्त्री है, किसान है, कुली और कबाड़ी है, फेरीवाला और उठाईगीर है। सच में वही अपने उलेमा और नेताओं के बीच पिस रहा है। क्योंकि इन उलेमा और नेताओं के एजेंडे अपने-अपने स्वार्थ के लिए हैं, न कि मुसलमानों की तरक्की और खुशहाली के लिए। इन तथाकतिथ मुस्लिम रहनुमाओं के धार्मिक और राजनैतिक जलसों की भीड़ में यही आम मुसलमान जुटता है। पर इन्होंने आज तक मुसलमानों की सिर्फ जज्बाती ब्लैकमेलिंग की है। जिस पार्टी में रहते हैं, वहां के लिए मुसलमानों में दलाली करते हैं।
लेखक सुरेंद्र अग्निहोत्री लखनऊ के निवासी हैं और राजनीति व मीडिया से जुड़े हुए हैं। इनसे संपर्क 09415508695 के आधार पर या [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

