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मेरी भी सुनो

संचालक जी की माया

उमेश चतुर्वेदीसाहित्यिक समरोहों की सफलता के लिए पहले मुख्य अतिथि और अध्यक्ष का नाम ही काफी होता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें एक और हस्ती जुड़ गई है –  संचालक की। अव्वल तो सभा-समारोह अध्यक्ष जी की ही अनुमति से आगे बढ़ती है, लेकिन हकीकत में सभा-समारोह में किसे गुलदस्ते देना है और कौन देगा या फिर कौन वक्ता कब बोलेगा और किसको कब बोलने से रोकना है, यह सब संचालक महोदय ही तय करते हैं। कहने का मतलब है कि सभा समारोहों में संचालक महोदय ही चलती है। संचालक का काम वैसे सूत्रधार का होता है।

उमेश चतुर्वेदीसाहित्यिक समरोहों की सफलता के लिए पहले मुख्य अतिथि और अध्यक्ष का नाम ही काफी होता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें एक और हस्ती जुड़ गई है –  संचालक की। अव्वल तो सभा-समारोह अध्यक्ष जी की ही अनुमति से आगे बढ़ती है, लेकिन हकीकत में सभा-समारोह में किसे गुलदस्ते देना है और कौन देगा या फिर कौन वक्ता कब बोलेगा और किसको कब बोलने से रोकना है, यह सब संचालक महोदय ही तय करते हैं। कहने का मतलब है कि सभा समारोहों में संचालक महोदय ही चलती है। संचालक का काम वैसे सूत्रधार का होता है।

इसके साथ ही अगले वक्ता से पिछले वक्ता के विचारों की कड़ी को जोड़ना या उसे आगे बढ़ाना होता है। इसमें उन्हें दो-चार लाइनें बोलने की छूट रहती है। लेकिन राजधानी दिल्ली में इन दिनों नया चलन दिख रहा है। अब संचालक लोग अपनी इस छूट का फायदा उठाने लगे हैं। मुख्य वक्ता से ज्यादा अब उनके ही मुखारविंद से फूल ज्यादा झड़ते हैं। कई बार इतने ज्यादा कि उनका संचालन ही उबाऊ लगने लगता है। राजधानी में कुछ साल पहले एक संचालक के प्रलाप को रोकने के लिए एक वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार ने ऐसी जम्हाई ली कि पूरा हॉल ही हंसने लगा। लेकिन संचालक महोदय पूरे ढीठ थे। फिर भी नहीं रूके।

अभी हाल ही में मशहूर ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय पर दिल्ली की हिंदी अकादमी ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें मुख्य वक्ता के तौर पर रामजन्म शर्मा जैसे आलोचक के साथ ही कई और लोग आमंत्रित थे। मंच पर हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर भी मौजूद थे। चूंकि कार्यक्रम हिंदी अकादमी का था, लिहाजा उसके कार्यक्रम के संचालक का दायित्व उसके सचिव ने संभाल लिया था। रवींद्र श्रीवास्तव उर्फ परिचय दास इन दिनों हिंदी अकादमी के सचिव हैं। कुबेरनाथ राय की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम का संचालन करते वक्त परिचय दास जी राजधानी में जारी संचालन प्रवृत्ति से खुद को रोक नहीं पाए। जो श्रोताओं को पच नहीं रहा था। मुख्य वक्ताओं से ज्यादा संचालक महोदय के मुखारविंद से फूलों का झड़ने पर नियंत्रण नहीं दिखा तो एक श्रोता उनसे गुजारिश करने की भूल कर बैठे कि वे कम बोलें और वक्ताओं को बोलने के लिए आमंत्रित करें।

अब परिचय दास जी ठहरे सरकारी अधिकारी। खुली सभा में ऐसा टोका जाना उन्हें नागवार गुजरा और लगे हाथों उन्होंने श्रोता को ही धमका दिया कि आप चुप बैठेंगे या फिर आपको सभा से बाहर फिंकवा दूं। बिल्कुल राजनीतिक अंदाज में उन्हें विपक्षी आवाज पची ही नहीं। कायदे से अशोक चक्रधर जी को इसका विरोध करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने नहीं किया। परिचय दास के इस व्यवहार का कुछ युवा पत्रकारों ने विरोध जरूर किया और वे सभा स्थल से बाहर निकल आए। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी समाज के प्रबुद्ध जनों को संचालक महोदय का यह व्यवहार नागवार नहीं लगा। वे पूर्ववत परिचय जी की परिचयोक्तियों का बेमन से ही सही स्वाद लेने के लिए रूके रहे।

ऐसा नहीं कि हिंदी में अच्छे संचालक नहीं है। लेकिन जोड़-जुगत और समीकरण साधने के दौर में उनकी पूछ-पहुंच अपने ही खेमे तक है। खेमेबंदी ने विचारबंदी को बढ़ावा दिया है और कहना न होगा कि आज की संचालक नाम की प्रजाति भी इसी विचारबंदी को ही बढ़ावा दे रही है। इसलिए उसे अपने किए पर पछतावा भी नहीं होता। उसे दर्प है कि वह चाहे तो वक्ता को बना सकता है और चाहे तो बिगाड़ सकता है। लेकिन ऐसा करते वक्त वह भूल जाता है कि वक्ता को बनाना और बिगाड़ना उसके लिए क्षणिक तौर पर ही संभव है। हिंदी का व्यापक पाठक और श्रोता समाज जानता है कि किसे सुनना है और किसे नहीं सुनना।

लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. ये लेख उनके ब्‍लॉग मीडियामीमांशा से साभार लिया गया है.

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