भारतीय राजनैतिक आंगन में देश की सबसे बड़ी पंचायत है लोकसभा। लोकसभा में 80 सदस्य भेजता है उत्तर प्रदेश।
कभी केंद्रीय सत्ता में केंद्रीय दखल रखने वाला उत्तर प्रदेश इन दिनों हाशिए पर पहुंच चुका है। यूपी के वाशिंदे सत्ता आतंक से भयभीत होकर सच सामने लाने से डरने लगे हैं। यह सब देख के लगने लगा है कि क्या देश में लोकतंत्र के दिन गिने-चुने रह गए हैं? स्थिति यहां तक पहुंचाने के लिए दोषी कौन है? इसके लिए मैं कहीं न कहीं बड़े दलों के कमजोर होने और छोटे-छोटे दलों के पैदा होने को जिम्मेदार मानता हूं। आइए थोड़ा अतीत में झांकें। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचानी जाने वाली कांग्रेस उत्तर प्रदेश के राजनैतिक धरातल से रातोंरात गायब हो गई।
कांग्रेस को कमजोर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर षडयंत्र रचे गए। देश की सत्ता से कांग्रेस की पकड़ कमजोर करने की नीति के तहत विदेशी खुफिया एजेंसियों की शह पर भारी धन भेजा गया। इसी धन से वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़े राम जन्म भूमि मामले को गर्म कराने की योजना को अमली जामा पहनाया गया। इस योजना में नेहरू परिवार के एक सदस्य को विदेशी एजेंसी ने अपना भेदिया बनाया। पूरे प्रदेश को धर्म की आग में झुलसा दिया गया। जब यह आग चरम पर थी तब राजनीति के चतुर खिलाडि़यों ने राजीव गांधी को भयाक्रांत करके अपना उल्लू सीधा करने के लिए राम जन्म भूमि का ताला तो खुलवा दिया लेकिन हिंदू हित चितंक की भूमिका में आगे बढ़ने से रोक कर एक तीर से दो शिकार करा दिये।
एक खुलकर हिंदू समुदाय के साथ नहीं आने दिया और मुस्लिम समुदाय को नाराज कराके राजनैतिक समीकरण उल्टा कर दिया। इस उलटफेर के बाद दिल्ली में कमजोर सरकार के गठन का सूत्रपात हो गया। इसी साजिश के तहत बुद्धपरस्त देशों ने चीन और जापान के आर्थिक सहयोग के बल पर हिन्दी बेल्ट में अनुसूचित जाति और जनजाति को कांग्रेस से पृथक करके अपने हितों को साधने की परिकल्पना के तहत राजनैतिक दल के रूप में उन्हें संगठित कराने की रूपरेखा तैयार की। इन लोगों ने सामाजिक खाई का लाभ उठा लिया। आज हालात यह है कि उ.प्र. से 35 सांसदों को लेकर मुलायम सिंह यादव सड़क पर टहल रहे हैं और चार सांसदों वाले रामविलास पासवान केंद्र में मंत्री बने हैं।
उ.प्र. की राजनीति केंद्र के विरोध पर टिकी नजर आने लगी है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव जब प्रदेश पर काबिज थे तो उनका टकराव दिल्ली की गद्दी से होता रहा। वही इतिहास बसपा सुप्रीमो मायावती दुहरा रही हैं। राजनैतिक समीक्षक कहते हैं कि केंद्र से टकराव रीजनल राजनैतिक दलों का सिर्फ स्वार्थ की प्रतिपूर्ति के तहत चलता है। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी जैसी लोकप्रिय योजना तथा राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये धन से केंद्र को प्रसिद्धि न मिले, इसी रणनीति में क्षेत्रीय दल लगे रहते हैं क्योंकि उनकी कोई विकास की नीति तो होती नहीं है। जाति और क्षेत्रीयता की भावनाओं को कैश करके प्रदेश की गद्दी हथियाने वाले दलों के सामने केंदीय योजनायें भारी राजनैतिक संकट का कारण बन सकती हैं। आम आदमी को यदि सच पता चल गया कि प्रदेश की सरकार को उनके
सुख-दुख से कोई लेना-देना नहीं रहा है तो वे उन्हें गद्दी से बेदखल कर देंगे। इसी सच को छिपाने के लिए जनता को भ्रमित करने के तहत रायबरेली में एक बार करोड़ की लागत से खुलने जा रहे रेल कोच फैक्ट्री के मुद्दे पर प्रदेश सरकार ने अनेक अड़ंगे डालकर इस योजना को रोका था। लोकसभा चुनावी दंगल का पर्दा गिरने के पहले रायबरेली में रेल कोच कारखाने की आधारशिला रखे जाने के बाद प्रदेश की राजनीति में विकास बड़ा मुद्दा बनने को है। इसे रोकना इस बार कठिन होता जा रहा है। प्रदेश की गद्दी पर काबिज बहुजन समाज पार्टी दागी, माफिया और बाहुबलियों के दम पर लोकसभा चुनाव की जंग जीतने के लिये अपने दरवाजे अपराधियों को खोल चुकी है। इस पार्टी ने नया नारा अपना लिया है ‘गुंडे सब हैं अपने साथी, जिता रहे हैं अपना हाथी´। इस नारे के बाद बड़े-बड़े अपराधी पार्टी में शामिल होने के लिये लाइन लगाने लगे हैं। मुख्तार अंसारी से लेकर अफजाल अंसारी, अबू सलेम तक के नाम बसपा कतार में शामिल होने वालों में हैं। बसपा के बाहुबलियों से मुकाबले के लिये समाजवादी पार्टी फिल्मी सितारों के बल पर चुनावी बैतरणी पार करना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी भी फिल्मी सितारों के मामले में किसी से पीछे रहने को तैयार नहीं है। वह भी स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी को लखनऊ से तथा स्मृति इरानी को इलाहाबाद तथा नीतीश भारद्वाज को फिरोजाबाद से चुनावी जंग में उतार सकती है।
देश का ताज पाने के लिए लालायित बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को उन्हीं के आंगन में मात दिलाने के लिए इस बार समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव में फिल्मी सितारों को चुनावी जंग में उतारने का ऐलान कर चुकी है। उ.प्र. की राजनीति में शहंशाह के रूप में पहचाने जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को अर्श से फर्श पर लाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने अपने बालसखा अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से चुनाव समर में उतारकर बहुगुणा को धूल चटा दी थी। तब से प्रदेश की राजनीति में फिल्मी सितारे गाहे-बगाहे अपनी दस्तक देते रहे हैं लेकिन दक्षिण भारत की तरह राजनीति पर वर्चस्व करने का सपना उत्तर भारत में कोई फिल्मी सितारा पूरा नहीं कर पाया है। हालांकि विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, जया प्रदा, राज बब्बर, धर्मेंद्र सड़क से संसद तक पहुंचे हैं लेकिन उत्तर भारत में उनका जादू वोटरों के उतना सर चढ़ कर नहीं बोला। तभी तो लखनऊ में भाजपा के पितामह अटल बिहारी बाजपेयी के विरूद्ध अभिनेता राजबब्बर पूरी ताकत के साथ समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ने के बाद भी हार का सामना करने को मजबूर हुए थे। फिल्मकार मुजफ्फर अली का भी कोई जादू अटल की आंधी रोक नहीं पाया। लेकिन बदलते वक्त के साथ रामपुर रियासत में मुस्लिम बहुल सीट पर जया प्रदा ने बेगम नूरबानो को हराकर अपने ग्लैमर का जो जादू छोड़ा है उससे सबक लेकर समाजवादी पार्टी ने उ.प्र. की सिसायत में नया प्रयोग करने का इरादा जता दिया है। इसी सोच के तहत हिन्दू धर्मरक्षक की छवि बनाये महंत अवैद्यनाथ को गोरखपुर में मात देने के लिए भोजपुरी फिल्म स्टार मनोज तिवारी को और लखनऊ में संजय दत्त उर्फ मुन्ना भाई को उतारने का ऐलान करके सपा ने माया कैंप में हड़कंप मचा दिया है।
इस बार रामपुर से जयप्रदा, वाराणसी से शत्रुघ्न सिन्हा, आगरा से राजबब्बर, झांसी से राजा बुंदेला आदि प्रमुख फिल्म स्टारों के चुनावी जंग में उतरने की संभावना जताई जा रही है। कुल मिलाकर लोकसभा का यह चुनाव उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मुद्दो के आधार पर नहीं बल्कि ग्लैमर और स्टारों के जरिए लड़ा जाएगा जो लोकतंत्र के लिए बेहद दुखद है।
लेखक सुरेंद्र अग्निहोत्री लखनऊ के निवासी हैं और राजनीति व मीडिया से जुड़े हुए हैं। इनसे संपर्क 09415508695 के आधार पर या [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

