
‘‘….. मैं अभी छटवीं में हूं। पांचवी में पहले नंबर पर आई थी। यहां से जाने पर परीक्षा देनी है। फिर सातवीं में बैठना है।’’ ऐसा कहते हुए मुद्रिका कस्बे यह जानती है या नहीं कि जब तक वह प्राइमरी स्कूल- कराठ, जिला सांगली पहुंचेगी तब तक उसकी परीक्षाएं छूट जाएंगी?
चीनीपट्टी के नाम से मशहूर मराठवाड़ा के हजारों मजदूरों को हर साल अपने आसपास के इलाकों में गन्ना काटने के लिए जाना ही पड़ता है। ‘नंवबर से जून’ तक बच्चे भी बड़ों के साथ अपने गांव छोड़ देते हैं। इधर गांव के गांव खाली होने से स्कूलों में अकाल रहता है। उधर बच्चों के शोषण से खेतों में गन्ने की पैदावार का आकड़ा फलता-फूलता है। उस्मानाबाद जिले के ‘धाराशिव चीनी मिल, चैरारूवली’ से करीब 25 किलोमीटर दूर, खेड़की गांव के खेत में मुद्रिका कस्बे ने बातों ही बातों में ढ़ेर सारी तकलीफें सुनाई।
हमारे सामने पन्नी, कपड़े और लकड़ियों से खड़े जिन घरों की बस्ती है, उन्हें मुद्रिका ने अंगुलियों पर गिना है- ‘‘12 घर। सारे एक-दूसरे से कितने दूर-दूर, आड़े-तिरछे, बिखरे से हैं। घर में देखो एक ही कमरा है, वह भी इतना छोटा कि पापा का पूरा पैर तक नहीं बनता। पन्नी के गर्म होने पर बहुत धूप लगती है। ऐसा घर ठण्ड, बरसात से भी नहीं बचा पाता। बरसात में तो पूरा खेत कीचड़ से भरता है। उबड़-खाबड खेत में न एक गली है, न खेल का मैदान।’’
मुद्रिका से खेल का सवाल पूछा तो उसने पानी पर जबाव दिया- ‘‘सारे सबेरे जल्दी उठते हैं, पीने का पानी बहुत दूर (दो किलोमीटर) वाले खेत से लाते हैं। सारे खुले में नहाते हैं। रात को लाइट नहीं रहती, घुप्प अंधेरा रहता है। सोचती हूं, सुबह जल्दी आए।’’
जब उसने सुबह जल्दी उठने की बात सुनी तो सुनाया- ‘‘सुबह से छोटे भाई को संभालना है। दिनभर रखे-रखे कंधे खूब दुखते हैं। घर के काम करते-करते अंधेरा आ जाता है।’’ मुद्रिका की उम्र खेतों में काम करने लायक नहीं हुई, उसकी सुने तो- ‘‘उससे बड़े बच्चे गन्ने काटते, बांधते, उन्हें ट्रालियों में भरते हैं। (मिलों से) ट्रालियां देर रात तक आती-जाती हैं। सुबह-सुबह बच्चों के हाथों में कोयना (गन्ना काटने के लिए लोहे का धारदार हथियार) होता है।’’ मुद्रिका हाव-भाव के साथ समझाती है- ‘‘बच्चे गन्ने की तरफ ऐसे झुककर पहले तो उसकी जड़ों को ऐसे काटते हैं, फिर उसे दो भागों में ऐसे बांटकर पीछे फेंकते हैं।’’ इस तरह हर जोड़ा अपने बच्चों की मदद से 2 टन गन्ना काटकर, उन्हें बांधकर ट्रालियों में भरता है।
जो घर पर रह जाते हैं वो ?- ‘‘वो… (थोड़ा सोचते हुए) वो अकेले रह जाते हैं, कहने को घरवाले भी साथ हैं। मगर वो तो खेत पर ही ज्यादा रहते हैं। हम यहां न पढ़ पाते हैं, न खेल पाते हैं। गांव में तो खूब बातें करने का मन करता था, और गुस्सा भी नहीं आता था।’’ इतना कहकर मुद्रिका देर तक चुप रहती है। कुछ देर में वह अपनी मां शोभायनी की फ्रिक जताती है- ‘‘वह (मां) कहती भी है कि तू साथ होकर भी बड़ी दूर है, वह कभी मेरे चिड़चिड़ाने, कभी अचानक चुप हो जाने पर पूछती भी है। मैं कहती हूं कि ऐसे तो किसी का भी दिमाग बिगड़ सकता है, खेलने-पढ़ने के समय इतना काम करने का मन नहीं करता। मुझे पढ़ाई से डर नहीं लगता। वह कहती है खाने की मजबूरी है इसीलिए। इसीलिए तो मैं स्कूल से दूर हूं…..
अचानक मुद्रिका जैसे अपनी उम्र से बहुत बड़ी बातें कहने लगती है- ‘‘गांव के बच्चों से बहुत अलग हैं यहां के बच्चे।’’ 13 की दहलीज पर कदम रखने से पहले वह अपने पिता कहमत कस्बे की राय भी जानने लगी है- ‘‘वह (पिता) कहते हैं पढ़े तो ठीक, नहीं तो 2-3 साल में शादी करेंगे। फिर अपने पति के साथ जोड़ा बनाकर काम करे।’’ मुद्रिका अनजान नहीं है कि कहमत कस्बे की तरह यहां ज्यादातर लोग ‘अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में’ कर देते हैं। ऐसे पिताओं को लगता है कि ‘परिवार में जितने अधिक जोड़े, आमदनी उतनी अधिक’। इस तरह ‘बाल-विवाह’ का रिवाज यहां ‘नए रुप’ में उजागर होता है।
चलते-चलते : मजदूरों की दूसरी बस्तियों में भी मुद्रिका कस्बे जैसी तमाम बच्चे-बच्चियों की दिक्कतें एक समान पायी गई, जैसे- 1) बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता। इससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है। 2) खेतों में बच्चे सबसे ज्यादा सर्दी में बीमार होते हैं। 3) गन्ना काटते वक्त कोयना जैसे धारदार हथियार लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं। 4) खेतों से ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र’ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं। इसलिए इमरजेंसी में अनहोनी का खतरा है। मतलब ढ़ेर सारी ‘मुद्रिकाएं’ स्कूल की परीक्षा के मुकाबले यहां ढ़ेर सारी कठिन परीक्षाओं का सामना कर रही हैं।
कुछ तथ्य-
– पलायन करने वाले मजदूरों में ज्यादातर दलित, बंजारा और पारदी जनजाति से हैं। इनके पास न तो खेतीलायक जमीन है, न ही अपना धंधा। यहां मुकादम (दलाल) चीनी कमेटी से 5-10 लाख रूपए लेकर करार करता है। वह 12-20 जोड़ों (पति-पत्नी) को 25-30 हजार रूपए के बदले 6-10 महीनों तक काम करवाने के लिए स्टाम्प पेपर पर अंगूठा लगावाता है। यहां के जोड़ों को नगर (200 किमी), पुणे (300 किमी), कोल्हापुर (500 किमी) और कर्नाटक (700 किमी) के बिदर, आलूमटी, बेड़गांव तक जाना पड़ता है। दीवाली के बाद मजदूरों के छोटे-छोटे समूह गन्ने के खेतों में बंट जाते हैं, फिर काम के हिसाब से उनकी बस्तियां बदलती रहती हैं।
– केन्द्र सरकार 2010 तक देश के सारे बच्चों को स्कूल ले जाना चाहती है। लेकिन 11वीं योजना में साफ तौर से कहा गया है कि 7 प्रतिशत बच्चों को स्कूल से जोड़ना मुश्किल हैं। यह बच्चे सामाजिक-आर्थिक वजहों से सरकार की पहुंच से काफी दूर हैं। इनदिनों भारत के 70 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। दुनिया के 17 देशों की तरह भारत में प्राइमरी स्कूलों से लड़कियों का पलायन ज्यादा हो रहा है। आखिरी जनगणना के हिसाब से 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.96 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं। ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ मानता है कि भारत में 5 से 9 साल की 53 प्रतिशत लड़कियां पढ़ नहीं पाती।
– ‘चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ और ‘लोकहित’ ने कलंब तहसील के 19 गांवों में सर्वे किया तो पाया कि 6-14 साल के कुल 1,555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते। इसमें 193 लड़कियां हैं। इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है। इसमें से भी 89 लड़कियां हंै। यहां एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी उजागर हुए हैं। इन दोनों संस्थाओं ने 29 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए मुहिम चलाने का फैसला लिया है। इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की उम्मीद बंधी है।
शिरीष खरे ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू, मुंबई’ के ‘संचार-वषिभाग’ से जुड़े हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

