: सुनो भाई साधो- 8 : कविता और बांसुरी : कविता और बांसुरी का क्या संबंध है? कोई कविता पढ़े और बांसुरी भी बजाये तो कैसा लगेगा? आप बांसुरी पसंद करेंगे या कविता? बांसुरी मुग्ध करती है। कृष्ण के अद्वितीय सम्मोहन में रुप के साथ बांसुरी का भी बड़ा योगदान था। बांसुरी उनके व्यक्तित्व की सांगीतिक पहचान थी। उनकी बांसुरी केवल गोपियों को ही आकर्षित नहीं करती थी बल्कि उसकी मधुर स्वर लहरी से गायें भी खिंची हुई उनके पास तक आ जाती थीं, कदम्ब के तने, उसकी पत्तियां नाच उठती थीं, यमुना में लहरें उठने लगती थीं, मानों तट को पार कर उन्हें छू लेना चाहती हों। राधा का हाल तो बांसुरी की धुन सुनते ही बेहाल हो जाता था। उनके गौर वर्ण पर बांसुरी का कृष्ण आकाश छा जाता था। कहां भागें, मुरलीधर की तलाश में, वंशीबजैया की खोज में। वे जहां होतीं थीं, वहीं बज उठती थीं, बांसुरी की तरह।
बांसुरी का आरोह-अवरोह, इसका ज्वार, इसके पोरों में बहती हवा के साथ उभरती पीड़ा, दुख, वेदना और इसकी स्वप्नलोक में बहा ले जाने वाली मधुर सप्तस्वर तरंग किसका मन नहीं मोहती है। एक पल के लिए कविता भले आकर्षित न करे पर बांसुरी जब भी किसी एकांतिक नीरवता में बजती है तो बरबस खींच लेती है। बांसुरी ने हिंदी कविता को बहुत प्रभावित किया है। अनेक कवियों के मन में वह सतत बजती हुई दिखायी पड़ती है। महादेवी प्राण की बांसुरी बजाती हैं। वे इसके आरोह में स्वप्न और अवरोह में पीड़ा देखती हैं। तरल विद्युत ज्वार सा क्या, चांदनी घनसार सा क्या, दीपकों के हार सा क्या? बांसुरी चाहे बांस की हो या प्राण की, क्या फर्क पड़ता है। बांस के पांचजोड़ से भी जब हवा गूंजती हुई बहती है तो मन को सपनों के पंखों पर एक नये कल्पनालोक में उड़ा ले जाती है। धर्मवीर भारती की पावन प्रेम कल्पना में भागवत के पृष्ठ पर रखी बांसुरी सबको रोमांचित करती है। ठाकुर प्रसाद सिंह बासंती रात के विह्वल पल में पर्वत के पार बजती बांसुरी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। फिर वे वंशी ही हो जाते हैं, माँ हमारी दूध का तरु/ बाप बादल/ औ’ बहन हर बोल पर/ बजती हुई मादल/ उतर आ हँसी/ कि मैं वंशी। कुमार रवीन्द्र की वंशी की धुन राधा की सांस को नीलवरन कर देती है।
एक और बांसुरी है नरेश सक्सेना के अधरों पर। मनमोहनी, बजती है तो सुनने वाले बजने लगते हैं, खो जाते हैं। समझ में नहीं आता, यह इंजीनियर है या कवि या अपने ब्रज का वंशीधर। जब तक नरेशजी अपने फेफड़ों से बांसुरी में स्वर फूंकते हैं तब तक वे एक मस्तमौला फकीर की तरह दिखते हैं, जैसे बांसुरी सबके जेहन में मधुर मधु घोल देगी, सबको बदल देगी। उन्हें यकीन होता है कि सभी बज उठेंगे उनके साथ और बजेंगे तो भीतर के कचरे से मुक्त हो जायेंगे, बांसुरी की तरह पेश आयेंगे अपने जीवन में। पर सच में ऐसा होता कहां है। लोग जब तक संगीत सुनते हैं, तब तक उनकी नसों में उसकी खनकती लहर बहती है। हो सकता है वे माधूर्य के रस सागर में कुछ देर के लिए डूब जायें पर जैसे ही सितार से उंगली हटती हैं, अधर के आलिंगन से बांसुरी मुक्त होती है, वे भी सम्मोहन पाश से मुक्त हो जाते हैं, अपनी ठहरी और सड़ती हुई जिंदगी में लौट आते हैं, अपने बेसुरेपन से फिर अपने मन को रंग लेते हैं, बजबजाते, गंधाते मन की मांसल तृप्ति के लिए अपने परिचित मखमली दलदल में वापस लौट जाते हैं।
नरेश जी को यह अंतर्कथा मालूम न हो, ऐसा नहीं है। वे उनके गिरने से चिंतित नहीं होते। वे बांसुरी बजाते हैं पर जानते हैं कि जब तक बजती रहेगी बांसुरी, तभी तक उसका मुग्धलोक कायम रहेगा। संभव नहीं कि निरंतर बजती रहे, संभव नहीं कि हमेशा के लिए भीतर उतरकर बैठ जायें। बाहर तो आना पड़ेगा और बाहर तमाम चुनौतियां हैं, विकराल समर है, जूझते, पराजित होते, टूटते, गिरते हुए लोग हैं। ऐसे में संगीत ही नहीं संग्राम भी जरूरी है। वे बांसुरी से कविता पर आते हैं तो बहुत सहजता के साथ उन्हीं फेफड़ों की हवा से तूफान रचते दिखायी पड़ते हैं, इससे पहले कि गिर जाये समूचा वजूद/ एकबारगी तय करो अपना गिरना /अपने गिरने की सही वजह और वक्त/ और गिरो किसी दुश्मन पर गाज की तरह/ उल्कापात की तरह गिरो/ वज्रपात की तरह गिरो/ मैं कहता हूं गिरो। जीवन मूल्यों के निरंतर क्षरण की ध्वनि को एक उदात्त स्वर में बदल देने का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है। पतन के इस गहन संक्रमणकाल में गिरना ही उठने का पर्याय हो गया है। गिरकर कुछ भी हासिल किया जा सकता है, इसलिए लोग इस बात की परवाह नहीं करते कि वे कहां गिर रहे हैं, किस सीमा तक गिर रहे हैं, जहां गिर रहे हैं, वहां से उठ भी पायेंगे या नहीं। नरेशजी को गिरना कतई बुरा नहीं लगता पर वे नहीं चाहते कि गिरने वाला खुद टूट जाये, गिरे तो उठ ही न पाये। उनकी सलाह है कि गिरो तो तोड़ने के लिए गिरो। समाज के पतन के लिए जिम्मेदार ताकतों पर उसी तरह गिरो, जैसे कोई उल्कापिंड जमीन से टकराता है, जैसे आसमान से बिजली छल, कपट और षड्यंत्र से रचे महल पर गिरती है। गिरो तो कुछ तोड़ो, कुछ तोड़ोगे तो कुछ नया रचे जाने की संभावना पैदा करोगे। कुछ नया होगा तो जीवन भी रहेगा, कविता भी और बांसुरी भी।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

