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बांसगांव की मुनमुन (एक)

दयानंद पांडेयअपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय को 33 साल हो गए हैं पत्रकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के गांव बैदौली में जन्‍में दयानंद पांडेय हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए थे। अपनी लेखनी से अलग पहचान रखने वाले दयानंद पांडेय के नए उपन्‍यास ”बांसगांव की मुनमुन” का भड़ास पर प्रकाशन होने जा रहा है। उनके इस नए उपन्‍यास को प्रत्‍येक रविवार को प्रकाशित किया जाएगा। इसके पहले भी दयानंद पांडेय के कई उपन्‍यासों का प्रकाशन भड़ास पर किया जा चुका है। जिसे उनके नाम को सर्च में डालकर पढ़ा जा सकता है।

दयानंद पांडेय

दयानंद पांडेयअपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय को 33 साल हो गए हैं पत्रकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के गांव बैदौली में जन्‍में दयानंद पांडेय हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए थे। अपनी लेखनी से अलग पहचान रखने वाले दयानंद पांडेय के नए उपन्‍यास ”बांसगांव की मुनमुन” का भड़ास पर प्रकाशन होने जा रहा है। उनके इस नए उपन्‍यास को प्रत्‍येक रविवार को प्रकाशित किया जाएगा। इसके पहले भी दयानंद पांडेय के कई उपन्‍यासों का प्रकाशन भड़ास पर किया जा चुका है। जिसे उनके नाम को सर्च में डालकर पढ़ा जा सकता है।

दयानंद पांडेय को लोक कवि अब गाते नही पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान मिल चुका है। वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’  नाम से प्रकाशित हो चुकी है। – एडिटर


बांसगांव की मुनमुन

मुनक्का राय के टूटने की यह इंतिहा थी। पांच बेटे और तीन बेटियों वाले इस पिता की जिंदगी में पहले भी कई मोड़ आए थे, परेशानियों और झंझटों के कई ज़ख़्म, कई गरमी बरसात और चक्रवात वह झेल चुके थे, पर कभी टूटे नहीं थे। पर आज तो वह टूट गए थे। उन का सब से छोटा बेटा राहुल कह रहा था, ‘ऐसे मां बाप को तो चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए।’  पिता पर ज़ोर उस का ज़्यादा था। सतहत्तर-अठहत्तर साल की उमर में क्या यही सुनना अब बाक़ी रह गया था? वह अपने दुआर पर खड़े सोच रहे थे और दरवाज़े पर लगी अपने ही नाम की नेम प्लेट को घूर रहे थे; मुनक्का राय, एडवोकेट! ग़नीमत यही थी कि बेटा घर के आंगन में ही तड़क रहा था और वह बाहर दुआर पर चले आए थे। बेटे में जोश भी है, जवानी भी और पैसे का गुरूर भी। एनआरआई है। यही सोच कर वह उस से उलझने या कुछ कहने की बजाय आंगन से निकल कर दुआर पर आ गए हैं। बेटा राहुल चिग्घाड़ रहा है, ‘इस आदमी की यही पलायनवादिता पूरे परिवार को ले डूबी है।’  वह बोल रहा है, ‘यह आदमी सीधा किसी बात को फे़स ही नहीं कर सकता। बात को टाल देना और घर की बातों में भी कचहरी की तरह तारीख़ ले लेना इस आदमी की फ़ितरत हो गई है।’

ज़हर का घूंट पी कर रह गए हैं, मुनक्का राय। पर चुप हैं।

बेटे राहुल की ज़िद है कि बहन की विदाई अभी और इसी वक्त हो जानी चाहिए। और मुनक्का राय की राय है कि, ‘बेटी को इस तरह वह मर जाने के लिए उस की ससुराल नहीं भेज सकते।’

‘तो यहीं अपनी छाती पर बिठा कर उसे आवारगी के लिए छुट्टा छोड़ देंगे? रंडी बनाएंगे?’  बेटा बोल रहा है, ‘पूरे बांसगांव में इस की आवारगी की चर्चा है। इतनी कि किसी की दुकान, किसी के दरवाज़े पर बैठना मुश्किल हो गया है। यहां तक कि अपने दरवाज़े पर भी बैठने में शर्म आती है।’

लेकिन मुनक्का राय अड़ गए हैं तो अड़ गए हैं। बेटे को बता दिया है कि, ‘बांसगांव में मैं रहता हूं तुम नहीं। मुझे कोई दिक्क़त नहीं होती। न अपने दरवाज़े पर बैठने पर न किसी और के दरवाजे़ या दुकान पर। कचहरी में मैं रोज़ बैठता ही हूं।’  और कि, ‘मेरी बेटी रंडी नहीं है, आवारा नहीं है।’

‘आप की बुजुर्गियत का, आप की वकालत का लोग लिहाज़ करते हैं, इस लिए आप से कुछ नहीं कहता कोई। पर पीठ पीछे सब कहते हैं।’  कहते हुए वह बहन के बाल पकड़ कर खींचते हुए कमरे में से बाहर आंगन में आ जाता है, ‘अब यह यहां नहीं रहेगी।’  मां रोकती है तो वह मां को भी झटक देता है, ‘इस का कपड़ा-लत्ता, गहना-गुड़िया सब बांधो। इसे मैं अभी इस की ससुराल छोड़ कर आता हूं।’

‘मैं नहीं जाऊंगी भइया, अब बस कीजिए।’  वह सख़्ती से भाई से अपने बाल छुड़ा लेती है। पलट कर वह बोलती है, ‘मुझे मरना नहीं, जीना है। और अपनी शर्तों पर।’

‘तो क्या इसी लिए आठ-दस लाख रुपए ख़र्च कर तुम्हारी शादी की थी?’

‘मेरी शादी नहीं की आप ने आठ-दस लाख ख़र्च कर के।’  वह बोली, ‘अपना बोझ उतार कर मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।’

‘क्या बात करती हो?’

‘ठीक कह रही हूं।’  वह लपक कर एक फ़ोटो अलबम दिखाती हुई बोली, ‘देखिए इस घर के एक दामाद यह हैं, दूसरे दामाद यह हैं और यह रहे तीसरे! क्या यह भी इस घर के दामाद होने लायक़ थे? आप देख लीजिए ध्यान से अपने तीनों बहनोइयों को फिर कुछ कहिए।’

‘तुम्हारी ये अनाप शनाप बातें मुझे नहीं सुननीं।’  वह बोला, ‘तुम बस चलो।’

वह आंगन में से झटके से उठी और अपने कमरे में चली गई। भीतर से दरवाज़ा धड़ाम से बंद करती हुई बोली, ‘भइया अब आप जाइए यहां से, मैं कहीं नहीं जाऊंगी।’

‘मुनमुन सुनो तो!’  उस ने दरवाज़ा पीटते हुए दुहराया, ‘सुनो तो!’

पर मुनमुन ने नहीं सुना। न ही वह कुछ बोली।

‘तो तुम यहां से जाओगी नहीं?’  राहुल ने फिर से अपनी बात दुहराई। पर मुनमुन फिर कुछ नहीं बोली। थोड़ी देर चुप रह कर राहुल फिर बोला, ‘पिता जी के तो नाक रही नहीं। तेरी मोह में अपनी नाक उन्हों ने कटवा ली है। पर सोच मुनमुन कि तेरे भाइयों की नाक अभी है।’

मुनमुन फिर चुप रही।

‘इतने बड़े-बड़े जज, अफ़सर, बैंक मैनेजर और एनआरआई की बहन इस तरह आवारा फिरे यह हम भाइयों को मंज़ूर नहीं है।’  राहुल बोला, ‘मत कटवाओ हम भाइयों की नाक!’

मुनमुन फिर चुप रही।

‘लो तो जब तुम नहीं जा रही तो मैं ही जा रहा हूं।’  राहुल बोला, ‘अम्मा जान लो अब मैं भी फिर कभी लौट कर बांसगांव नहीं आऊंगा।’

अम्मा भी चुप रही।

‘तुम लोगों की चिता को अग्नि देने भी नहीं।’  राहुल जैसे चीखते हुए शाप दे रहा था अपनी अम्मा को। फिर अम्मा बाबू जी के बिना पांव छुए ही वह घर से बाहर आया और बाहर खड़ी कार में बैठ कर छोड़ गया बांसगांव। इस के पहले तो नहीं पर अब मुनमुन राय एक ख़बर थी। ख़बर थी बांसगांव की सड़कों पर। गलियारों, चौराहों से चौबारों और बाज़ारों तक। यह मुनमुन जब पैदा हुई थी तो यही राहुल उसे गोदी में ले कर खिलाता-पुचकारता घूमता और गाता-मेरे घर आई एक नन्हीं परी! और राहुल ही क्यों बड़े भइया रमेश, मझले भइया धीरज और छोटे भइया तरुण भी गाते। अम्मा बाबू जी तो ख़ैर भाव विभोर हो गाते-मेरे घर आई एक नन्हीं परी! साथ में बड़ी दीदी विनीता और रीता भी सुर में सुर मिलातीं; चांदनी के हसीन रथ पे सवार मेरे घर आई एक नन्हीं परी! सचमुच पूरा घर चांदनी में नहा गया था। घर के लोग जैसे समृद्धि की सीढ़ियों पर सीढ़ियां चढ़ने लगे। उन्हीं दिनों एक बुआ आई थीं। अम्मा से कहने लगीं, ‘ई पेट पोंछनी तो बड़ी क़िस्मत वाली है। आते ही देखो रमेश को हाई स्कूल फ़र्स्ट डिविज़न पास करवा दिया। बाप की कचहरी की लुढ़की प्रैक्टिस फिर से चमका दी।’

‘ये तो है दीदी!’  मुनमुन की अम्मा कहतीं। मुनमुन नाम की यह नन्हीं परी जैसे-जैसे बड़ी होती गई, परिवार की खुशियां भी बड़ी होती गईं। इसी बीच घर में पट्टीदारी की नागफनी भी उगने लगी। यह पट्टीदारी की नागफनी ही मुनमुन के घर परिवार को आज इस राह पर ला पटके थी।

मुनक्का राय के एक चचेरे बड़े भाई थे गिरधारी राय। गिरधारी और मुनक्का की एक समय ख़ूब पटती थी। बचपन में तो बहुत ही। संयुक्त परिवार था। मुनक्का राय के पिता दो भाई थे। बड़े भाई रामबली राय उन दिनों वकील थे और छोटे भाई श्यामबली राय प्राइमरी स्कूल में मुदर्रिस। यानी मास्टर। दोनों भाइयों में ख़ूब बनती। बड़ा भाई ख़ूब स्नेह करता तो छोटा भाई ख़ूब आदर। मुनक्का के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही मुनक्का की मां टी.बी. की बीमारी से चल बसीं। तो बड़े भाई रामबली ने छोटे भाई श्यामबली की दूसरी शादी करवा दी। अब मुनक्का सौतेली माता के हाथ पड़ गए। ममत्व और दुलार तो वह नहीं मिला उन्हें लेकिन खाने पीने के लिए सौतेली मां ने कभी उन को नहीं तरसाया। इस बीच रामबली राय की वकालत चल पड़ी थी। और पूरी तहसील में उन के मुक़ाबले कोई और वकील खड़ा नहीं हो पाता। नाम और नामा दोनों उन के ऊपर बरस रहा था। इतना कि अब वह गांव में खेत ख़रीद रहे थे, पक्का मकान बनावा रहे थे। और सब कुछ संयुक्त। मतलब छोटे भाई श्यामबली को घर मकान सब में बराबरी का हिस्सा। इस एका को देख कर गांव में ईर्ष्या उपजनी स्वाभाविक थी। बहुत लगाने-बझाने की भी कोशिश हुई पर दोनों भाइयों में जीते जी कभी कोई दरार नहीं पड़ी। लेकिन परिवार बढ़ा, बच्चे बढ़े, बच्चों के बच्चे हुए तो थोड़ा बहुत रगड़ा-झगड़ा भी बढ़ा। तो रामबली राय एडवोकेट ने अकलमंदी से काम लिया। एक बड़ा सा मकान बांसगांव तहसील में भी बनवा लिया। और धीरे-धीरे अपने बीवी बच्चों और नातियों को बांसगांव में ही शिफ़्ट कर दिया। बार-बार गांव आने जाने से भी फ़ुर्सत हो गई। और गांव का मुसल्लम राजपाट, खेती बारी सब कुछ छोटे भाई के सुपुर्द कर दिया।

अब गांव की पट्टीदारी में कोई शादी-व्याह होता तभी रामबली राय गांव आते। नहीं तो बांसगांव में ही डेरा जमाए रहते। इसी बीच उन्हों ने शहर में भी एक तिमंज़िला मकान बनवा दिया। यह सोच कर कि बच्चों के पढ़ने लिखने में आराम रहेगा। वह यह भी बहुत चाहते थे कि उन का भी कोई बेटा वकील बन कर उन का तख़त संभाल ले। लेकिन उन के दोनों बेटों ने उन्हें बेहद निराश किया। बड़े बेटे गिरधारी राय को तो उन्हों ने बड़े अरमान के साथ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भेजा था। पढ़ने को। लेकिन गिरधारी राय कोई दस-बारह साल बिता कर भी बमुश्किल बी.ए. करने के बाद एल.एल.बी. कंपलीट नहीं कर पाए। लौट आए बांसगांव। कभी कोई नौकरी नहीं की और ज़िंदगी भर बाप की कमाई उड़ाते हुए ऐश करते रहे। छोटा बेटा गंगा राय तो इंटर भी कई साल में पास नहीं हो पाया। पर बाप के पैसे से व्यापार करता रहा। किसिम-किसिम के व्यापार में घाटा उठाते हुए वह बाप की कमाई उड़ाता रहा। पर रामबली राय के दोनों बेटे भले एल.एल.बी. नहीं कर पाए पर उन के अनुज श्यामबली राय के बेटे मुनक्का राय ने एम.ए. भी किया और एल.एल.बी. भी। भले एक-एक क्लास में दो-दो साल लगाए तो क्या हुआ। रामबली राय का सपना पूरा किया। आखि़र कचहरी में उन का तख़ता संभालने के लिए उन का कोई वारिस तो मिला। अनुज पुत्र के साथ मिल कर उन्हों ने अपनी वकालत के झंडे को और ऊंचा किया।

गिरधारी राय को यह सब फूटी आंख भी अच्छा नहीं लगा। हार मान कर उन्हों ने राजनीति में हाथ पैर मारने की कोशिश की। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से वह एल.एल.बी. भले नहीं पास कर पाए हों उन के साथ पढ़े कुछ लोग अफ़सर और नेता तो हो ही गए थे। फिर तब तक ज़माना और लोग न इतने बेशर्म हो पाए थे न एहसान फ़रामोश! गिरधारी राय को उन के साथी अफ़सरों ने भी भाव दिया और राजनीतिकों ने भी। पर शायद गिरधारी राय के नसीब में सफलता नहीं थी। राजनीति में भी वह लगातार झटका खाते रहे। ज़िला लेबिल के कांग्रेस कमेटी में भी उन को जगह नहीं मिल पाई। वह लोगों को खिला पिला कर खादी का सिल्क, मटका या कटिया सिल्क का कुर्ता जाकेट पहन कर यानी नेता जी वाले वेश भूषा भर की ही नेतागिरी तक रह पाए। हालां कि टोपी भी वह बड़े सलीके़े से कलफ़ लगी हुई लगाते थे पर बात में वह वज़न नहीं रख पाते थे। विचारों से भी दरिद्र थे सो भाषण या बातचीत के स्तर पर भी वह कट जाते थे। तीन तिकड़म भी पारिवारिक स्तर पर ही कर पाते। धैर्य बिलकुल नहीं था और बात-बात पर जिज्ञासा भाव में मुंह बा देते। सो वेशभूषा का भी असर उतर जाता। हार मान कर वह ग्राम प्रधानी के चुनाव में कूदे। यह कहते हुए कि ग्रास रूट से शुरू राजनीति ज़्यादा प्रभावी होती है। पर यहां भी उन के हिस्से हार आई। पिता का रसूख़ भी काम नहीं आया। गिरधारी राय से अब अपनी हार पर हार हज़म नहीं हो रही थी।

उधर मुनक्का राय का तख़ता अब रामबली राय से अलग हो गया था। अब वह जूनियर नहीं सीनियर वकील हो चले थे। चकबंदी का ज़माना था। मुक़दमों की बाढ़ थी। इतनी कि वकील कम पड़ रहे थे। मुनक्का राय पर जैसे पैसे की बरसात हो रही थी। मूसलाधार। गिरधारी राय मन मसोस कर रह जाते। यह सोच कर कि उन्हीं के बाप के पैसे से पढ़ा यह मुनक्का मलाई काट रहा है, नाम-नामा दोनों कमा रहा है और उन की हालत धोबी के कुत्ते सरीखी हो गई है। न घर के रह गए हैं वह, न घाट के। अवसाद के इन्हीं कमज़ोर क्षणों में उन्हों ने तय किया कि वह भले खुद वकील नहीं बन पाए तो क्या अब अपने बेटे को ज़रूर वकील बनाएंगे। ताकि उन के बाप के तख़ते का वारिस कम से कम यह मुनक्का राय तो न ही बने। रामबली राय के बेटे गिरधारी राय की यह दमित कुंठा हंसते-खेलते परिवार के दरकने की बुनियाद का पहला बीज, पहला पत्थर बना।

गिरधारी राय के बच्चे हालां कि अभी छोटे थे पर छोटा भाई अब बड़ा हो गया था। इंटरमीडिएट का इम्तहान भले ही नहीं पास कर पाया वह पर पिता के रसूख़ के बल पर उस की शादी एक अच्छे परिवार में तय हो गई। तब के दिनों की शादी में बारात तीन दिन की हुआ करती थी। रामबली राय के छोटे बेटे गंगा राय की शादी भी तीन दिन वाली थी। मरजाद के दिन की बारात का दृश्य गांव के पुराने लागों की आंख और मन में आज भी जस का तस बसा हुआ है। लोग जब-तब आज भी उस का ज़िक्र चला बैठते हैं। बारात का तंबू काफ़ी बड़ा था। आम का बड़ा और घना बाग़ीचा था। तंबू के पश्चिम की ओर बीचो-बीच कालीन पर मसनद लगाए रामबली राय बैठे थे। सामने संदूक़ बग़ैरह सजे थे जैसा कि उन दिनों बारात में चलन था। रामबली राय दुल्हे के साथ ऐसे अकड़ कर बैठे थे जैसे अकबर अपना दरबार लगाए बैठे हों। और जब घर के मुखिया किसी शहंशाह की तरह पेश आ रहे थे तो राजकुमार लोग भला कैसे पीछे रहते?

गिरधारी राय ने तंबू का दक्षिणी सिरा पकड़ा और मुनक्का राय ने उत्तरी सिरा। दोनों नहा धो कर मूंगा सिल्क का कुरता पहन कर अपने-अपने तख़त पर मसनद लगा-लगा कर विराजमान हो गए। दोनों के साथ आस-पास चारपाइयां बिछा कर उन के दरबारी भी बैठ गए। अब बारात से कोई रिश्तेदार विदा मांगने जाता था या फिर आता तो रामबली राय का पैर छू कर बारी-बारी इन दोनों के पास भी अभिवादन के लिए जाता। अगर कोई पहले गिरधारी राय के पास आता तो वह बैठे-बैठे लेकिन सिर झुका कर हाथ जोड़ कर पूछते, ‘अच्छा तो जा रहे हैं? प्रणाम!’  और जो जाने वाला रामबली राय के बाद पहले मुनक्का राय के पास पहले चला जाता फिर गिरधारी राय के पास आता तो उन के पास आता तो उन की भौंहें तन जातीं। बोलने का सुर बदल जाता। बल्कि तीखा हो जाता। बड़ी लापरवाही से कहते, ‘जा रहे हैं? प्रणाम!’  और यह प्रणाम वह ऐसे बोलते जैसे जाने वाले को उन्हों ने प्रणाम नहीं किया हो जूता मारा हो। ठीक यही दृश्य मुनक्का राय की तरफ भी घटता। उन की तरफ जो कोई पहले आता तो वह प्रणाम ऐसे विनम्र हो कर करते जैसे प्रणाम नहीं फूलों की बरसात कर रहे हों। और जो कोई गिरधारी राय की तरफ से हो कर आता तो प्रणाम ऐसे करते जैसे भाला मार रहे हों। लेकिन यह दृश्य ज़्यादा देर नहीं चला।

कुछ मुंहलगे लोग मुनक्का राय के पास इकट्ठे हो गए। और उन से मुग़ले आज़म के डायलाग्स सुनाने का अनुरोध करने लगे। थोड़े ना नुकुर के साथ उन्हों ने डायलाग्स सुनाने शुरू कर दिए। कभी वह सलीम बन जाते तो कभी अकबर तो कभी अनारकली के हिस्से के ब्यौरे बताने लगते। और फिर ‘सलीम तुझे मरने नहीं देगा और अनारकली हम तुम्हें जीने नहीं देंगे।’  सुनाने लगते पर जल्दी ही उन्हों ने डायलागबाज़ी बंद कर दी। फिर तरह-तरह की चर्चाएं और क़यास शुरू हो गए मुनक्का राय को ले कर।

मुनक्का राय की कई बातें जो कभी उन के हिस्से का अवगुण थीं, अब उन के गुण बन उस शेर को फलितार्थ कर रही थीं कि, ‘जिन के आंगन में अमीरी का शजर लगता है/उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है।’  मुनक्का राय अब यहां मुनक्का बाबू हो चले थे। लोग बतिया रहे थे कि अइसे ही थोड़े, मुनक्का बाबू जब छोटे थे, मिडिल में पढ़ते थे तबै से रात-रात भर घर से भागे रहते थे, नौटंकी देखने ख़ातिर। और जब शहर में पढ़ते थे तो भले एक क्लास में दू साल-तीन साल लग जाता था लेकिन पिक्चर तो वह फर्स्ट डे-फर्स्ट शो ही देखते थे। और ई मुग़ले आज़म तो लगातार तीन महीने बिना नागा रोज देखे थे। रिकार्ड था भइया। वइसे थोड़े आज भी उन को एक-एक डायलाग याद हैं। एक बार तो भइया इन का साला शहर गया अपनी बीवी का इलाज करवाने। डाक्टर-वाक्टर को दिखाया। दवा लाने की बात हुई तो मुनक्का बाबू को पैसा दिया यह सोच कर कि पढ़े लिखे हैं, दुकानदार घपला नहीं करेगा। भेजा मुनक्का बाबू को दवा लेने। पर मुनक्का बाबू तो पैसा लिए और चले गए मुग़ले आज़म देखने। अइसा नशा था मुनक्का बाबू को मुग़ले आज़म का। साला इंतज़ार ही करता रह गया। बीवी की दवा का। खैनी ठोंक कर।

मुनक्का बाबू की मुग़ले आज़म गाथा की तंद्रा तब टूटी जब एक टीन एजर लड़के ने टोका। और मुनक्का बाबू से पूछा कि, ‘ऐसा क्या था मुग़ले आज़म में जो तीन महीने लगातार देखने जाते रहे?’  पहले तो उन्हों ने उस टीन एज लड़के की बात पर ध्यान नहीं दिया। पर उसने जब दो से तीन बार यही सवाल दुहराया तो वह खिन्न हो गए। पर बोले धीरे से, ‘अरे मूर्ख सिर्फ़ देखने नहीं, समझने जाता था उस के डायलाग्स! हिंदी में तो थे नहीं। उर्दू और फ़ारसी में डायलाग्स थे।’  उन्हों ने बैठे-बैठे बैठने की दिशा बदली, हवा ख़ारिज किया और ताली पीटते हुए बोले, ‘तो डायलाग्स समझने जाता था। और फिर जब डायलाग्स समझ में आने लगे तो उस की मुहब्बत का जो जादू था, जो नशा था और जो मुहब्बत का इंक़लाब था उस में, वह मज़ा देने लगा।’  कहते हुए वह ऊपर आम के पेड़ को निहारने लगे। फिर मुग़ले आज़म का ही एक गाना धीरे से बुदबुदाए, ‘पायल के ग़मों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं।’

इधर मुनक्का बाबू के कैंप में मुग़ले आज़म और मुहब्बत की दास्तान ख़त्म भी नहीं हुई थी कि गिरधारी राय के कैंप में तू-तड़ाक शुरू हो गया। लगा कि मारपीट हो जाएगी। गिरधारी राय फुल वैल्यूम में आग बबूला थे, ‘बताइए इस दो कौड़ी के आदमी की औक़ात है कि हम को झूठा कहे!’

‘झूठ?’  वह आदमी चिल्लाया, ‘सरासर झूठ बोल रहे हैं आप। जिस को सफ़ेद झूठ कहते हैं।’

‘देखिए फिर-फिर… फिर हम को झूठा कह रहा है।’  गिरधारी राय अब लगभग उस व्यक्ति को पीट देना चाहते थे। वह व्यक्ति किसी डिग्री कालेज में लेक्चरर था। और कन्या पक्ष की ओर से था। बरात में बस यों ही औपचारिक रूप से पूछताछ करने आया था कि, ‘बारातियों को कोई दिक्क़त-विक्क़त तो नहीं है?’  फिर बैठ गया गपियाने के लिए। मिल गए गिरधारी राय। पहले तो सब कुछ औपचारिक रहा। पर जब गिरधारी राय ने देखा कि यह डिग्री कालेज का मास्टर उन के ऊपर कुछ ज़्यादा ही रौब गांठ रहा है। तो उन्हों ने बड़ी विनम्रता से उसे बताया कि वह भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए हैं। बात की रौ में पहले उन्हों ने झोंका कि, ‘वह भी एल.एल.बी हैं।’

‘तो वकालत कहां करते हैं?’  उस ने पूछा।

‘वकालत?’  गिरधारी राय ने बताया कि, ‘समय कहां है वकालत के लिए?’

‘क्यों तब और क्या करते हैं?’  लेक्चरर की उत्सुकुता बढ़ी।

‘घर की ज़िम्मेदारियां हैं। राजनीति की व्यस्तता है।’  फिर इसी रौ में उन्हों ने झोंक दिया कि, ‘पी.सी.सी. के भी मेंबर हैं वह।’

‘पी.सी.सी.?’

‘प्रदेश कांग्रेस कमेटी।’  गिरधारी राय ने उसे रौब में लिया, ‘इतना भी नहीं जानते मास्टर साहब!’

‘मैं मास्टर नहीं हूं किसी प्राइमरी स्कूल का, डिग्री कालेज का लेक्चरर हूं।’  हर्ट होते हुए वह बोला।

‘हां-हां, वही-वही। जो भी हो।’  गिरधारी राय ने उसे बातचीत के निचले पायदान पर ही रखा।

‘पर बैठे ठाले पी.सी.सी. का मेंबर होना तो इतना आसान नहीं है राय साहब!’  उस ने अपनी राजनीतिक समझ और सूचना की तफ़सील में जाते हुए कहा।

‘क्यों नहीं आसान है?’  गिरधारी राय बोले, ‘आप को पता है हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता मेरे क्लासफे़लो रहे हैं?’

‘अब राय साहब आप ज़रा ज़्यादा बोल रहे हैं।’

‘क्या?’  गिरधारी राय बमके।

‘आप सरासर झूठ बोल रहे हैं।’  वह लेक्चरर भी भड़क गया।

‘तुम्हारी यह हिम्मत कि मुझे झूठा बता रहे हो?’

‘मैं बता नहीं रहा हूं।’  वह और भड़का, ‘आप सरासर झूठ बोल रहे हैं और बदतमीज़ी भी कर रहे हैं।’

‘अब तुम चुप रहो और जाओ यहां से।’  गिरधारी राय चीख़े। भीड़ इकट्ठी हो गई इस चीख़ से। सारे बाराती इकट्ठे हो गए। कुछ कन्या पक्ष के लोग आ बटुरे। मामला बढ़ता देख बारात में आए एक वकील खरे साहब ने बीच बचाव किया। गिरधारी राय और उस लेक्चरर के बीच की दूरी बढ़ाई और धीरे से पूछा उस लेक्चरर से कि, ‘आखि़र बात क्या है?’

‘बात यह है कि यह दो कौड़ी का मास्टर मुझे झूठा बता रहा है।’  गिरधारी राय बीच में ही कूद पड़े।

‘अब आप बताइए कि क्यों इन को झूठा कह रहे हैं?’  हाथ जोड़ कर खरे साहब ने उन लेक्चरर साहब से पूछा।

‘बताइए यह कह रहे हैं कि हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी दोनों इन के क्लासफे़लो रहे हैं।’

‘ठीक कह रहा हूं।’  गिरधारी राय किचकिचाए।

‘क्या इन सब की तरह आप हम को भी जाहिल समझ रहे हैं?’  लेक्चरर डपटा, ‘यह संभव ही नहीं है। दोनों की उम्र का फ़ासला आप को मालूम भी है? कम से कम दस साल का गैप है। और यह कह रहे हैं कि दोनों इन के क्लसाफ़ेलो रहे हैं, यह भला कैसे संभव है?’

‘मैं समझ गया, मैं समझ गया।’  खरे साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर उस लेक्चरर से कहा, ‘देखिए आप की दुविधा भी सही है, और इन का कहना भी सही है।’

‘मतलब?’  लेक्चरर अचकचाया, ‘दोनों ही कैसे सही हो सकते हैं?’

‘हैं न?’ खरे साहब ने हाथ जोड़े हुए कहा, ‘देखिए गिरधारी राय जी जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गए तो बहुगुणा जी इन के क्लासफे़लो थे। बहुगुणा जी पढ़ कर चले गए। पर गिरधारी राय जी पढ़ते रहे। पढ़ते रहे। पढ़ते ही रहे कि नारायण दत्त तिवारी जी पढ़ने आ गए। तब नारायण दत्त तिवारी भी इन के क्लासफे़लो हो गए!’

‘फिर नारायण दत्त तिवारी पढ़ कर चले गए। और यह पढ़ते रहे।’  लेक्चरर ने बात पूरी करते हुए मुंह गोल कर मुसकुराते हुए कहा, ‘तो यह बात है!’

‘तब?’ खरे साहब ने जैसे समाधान का क़िला जीतते हुए कहा, ‘मतलब यह कि गिरधारी राय जी झूठ नहीं बोल रहे हैं।’  फिर वह ज़रा रुके और अंगरेज़ी में उस से पूछा, ‘इज़ इट क्लीयर?’

‘एब्सल्यूटली क्लीयर!’  लेक्चरर मुसकुराते हुए बोला, ‘इन के सच पर तो कोई चाहे रिसर्च पेपर तैयार कर सकता है।’

‘मतलब गिरधारी चाचा फ़ुल फ़ेलियर हैं!’  एक टीन एजर लड़का छुट से बोला।

‘भाग सारे यहां से!’  खरे साहब ने लड़के को झिड़का।

बाद में मुनक्का बाबू ने इस पूरे प्रसंग का फुल मज़ा लिया। और गिरधारी राय ने बहुत सूंघा कि कहीं इस सब के पीछे मुनक्का की साज़िश तो नहीं थी? क्यों कि उन को लग रहा था कि इस पूरे प्रसंग में उन का अपमान हो गया है। बाद के दिनों में उन्हों ने मुनक्का बाबू और उन के परिवार को कई पारिवारिक खु़राफ़ातों से तंग किया। फिर तो उन की खु़राफ़ातें गांव के स्तर पर भी शुरू हो गईं। गांव हर बार बाढ़ में डूब जाता था। बांध बनाने की योजना बनी, बजट आया। पर बांध नहीं बना। जिस-जिस के खेत बांध में पड़ते थे उन्हों ने उन में से कुछ लोगों को ऐसे कनविंस किया कि तुम्हारा खेत तो बांध में जाएगा ही, गांव में भी विनाश आ जाएगा। तीन चार मुक़दमे हो गए। बहुत बाद में गांव वालों को गिरधारी राय की खु़राफ़ात और साज़िश दिखी तो उन को समझाया-बुझाया। सब कुछ सुन समझ कर गिरधारी राय बोले, ‘दो शर्तों पर बांध बन सकता है। एक तो हमें प्रधान बनवाओ निर्विरोध, दूसरे बांध का पेटी ठेकेदार मैं ही होऊंगा कोई और नहीं।’

गांव वालों ने उन की दोनों शर्तें नामंज़ूर कर दीं। उलटे कुछ लड़कों ने उन्हें एक रात रास्ते में घेर लिया। उन के साथ बदतमीज़ी से पेश आए और धमकाया कि, ‘अपना शैतानी दिमाग़ अपने पास रखिए, नहीं ले चल कर नदी में मार कर गाड़ देंगे। पंचनामे के लिए भी लाश नहीं मिलेगी।’

गिरधारी राय डर गए। गांव छोड़ बांसगांव रहने लगे। बांसगांव में उन का परिवार भी था और मुनक्का राय भी। अब वह मुनक्का राय से खटर-पटर करने लगे। पिता ने समझाया भी गिरधारी राय को कि, ‘मुनक्का को परेशान मत करो।’

पर गिरधारी राय कहां मानने वाले थे। मुनक्का परेशान हो गए। रामबली राय के पास गए फ़रियाद ले कर और कहा कि, ‘मैं अब अपने रहने का अलग इंतज़ाम करना चाहता हूं। आप की इजाज़त चाहता हूं।’

‘देखो मुनक्का तख़ता तो तुम्हारा मैं ने पहले ही अलग कर दिया था यह सोच कर कि अब तुम लायक़ वकील हो गए। कब तक मेरे जूनियर बन कर मुझे ढोओगे?’ वह बोले, ‘पर अभी इतने लायक़ नहीं हो गए हो कि घर से भी अलग कर दूं। कम से कम जब तक हम दोनों भाई ज़िंदा हैं तब तक तो अलग होने की कभी सोचना नहीं। सोचो कि लोग क्या कहेंगे? हां, रही बात गिरधारी से तुम्हारी मतभिन्नता की तो उस का भी मैं कुछ सोचता हूं। और फिर तुम जानते ही हो कि ख़ाली दिमाग शैतान का घर है।’

मुनक्का मन मसोस कर रह गए। लेकिन बीच का रास्ता उन्हों ने यह निकाला कि शाम को कचहरी के बाद ज़्यादातर दिनों में गांव जाने लगे। फिर तो धीरे-धीरे वह गांव से ही आने-जाने लगे। आने-जाने की दिक्क़त अलग थी, मुवक्किलों की अलग। प्रैक्टिस गड़बड़ाने लगी। इसी बीच एक नई तहसील बन गई गोला। रामबली राय ने मुनक्का को बुलवाया और कहा कि, ‘देख रहा हूं तुम्हारी दिक्क़त यहां बढ़ती जा रही है। तुम गोला क्यों नहीं चले जाते?’

मुनक्का बांसगांव नहीं छोड़ना चाहते थे। पर अब चूंकि रामबली राय का संकेतों भरा आदेश था तो वे बेमन से गोला चले गए। लेकिन गोला में उन की प्रैक्टिस ठीक से नहीं चली। बच्चे बड़े हो रहे थे और ख़र्च भी। दो ढाई साल में ही वह फिर से बांसगांव लौट आए। रामबली राय भी अब वृद्ध हो रहे थे। पर मुनक्का की प्रैक्टिस शुरू हो गई। उन्हीं दिनों मुनमुन पैदा हुई।

मुनमुन जैसे लक्ष्मी बन कर आई मुनक्का और उन के परिवार के लिए। गृहस्थी की गाड़ी चल क्या दौड़ पड़ी। गिरधारी राय के लिए यह सब कुछ बहुत ही अप्रिय था। ख़ास कर इस लिए भी कि वह भले वकील नहीं बन पाए पर सोचे थे कि बच्चों को वकील बना कर इस की भरपाई करेंगे। ताकि पिता की वकालत की विरासत मुनक्का के हाथ न चली जाए। लेकिन उन का बड़ा बेटा शहर में चाचा गंगा राय के सानिध्य में घनघोर पियक्क्ड़ और औरतबाज़ निकल गया। उस के लिए बी.ए. पास करना ही मुश्किल हो गया। गिरधारी राय में झूठ बोलने, दिखावा करने और तमाम खुराफात और साज़िश करने की बीमारी भले थी पर शराब-औरत वग़ैरह की अय्याशी में वे कभी नहीं पड़े। न वह, न मुनक्का राय।

जो हो बड़े बेटे ने गिरधारी राय का सपना तोड़ दिया था। अब उन्हें दूसरे नंबर के बेटे से उम्मीद बढ़ी। वह पढ़ने लिखने में बहुत तेज़ नहीं, औसत ही था। दो चार बार फे़ल होने के बावजूद उस ने एल.एल.बी. कंपलीट किया। गिरधारी राय की खु़शी का ठिकाना नहीं था। पर गिरधारी राय का यह दूसरा बेटा तहसील में नहीं, ज़िला अदालत मेें प्रैक्टिस करना चाहता था। रामबली राय भी यही चाहते थे। उन्हों ने तर्क भी दिया कि, ‘तेली का बेटा तेली ही बने आज के दौर में ज़रूरी नहीं है।’  और कि, ‘तहसील में अब कुछ नहीं रखा है।’  वह ज़िला अदालत या हाई कोर्ट भेजना चाहते थे नाती को प्रैक्टिस के लिए। पर रामबली राय की नहीं चली, नाती की नहीं चली। गिरधारी राय की ज़िद चली।

गिरधारी राय की ज़िंदगी में यह उन की पहली फ़तह थी। अपने दूसरे नंबर के बेटे से उन्हों ने मुनक्का राय को शह दे दी थी। पर मुनक्का राय इस से बेख़बर थे। प्रैक्टिस उन की चटकी हुई थी, यह सब देखने सुनने की उन को फ़ुर्सत कहां थी? उन्हों ने तो फ़राख़दिली दिखाते हुए भतीजे का कचहरी में वेलकम किया और कहा कि, ‘चलो कचहरी में हमारे परिवार की ताक़त और बढ़ गई। दो से अब हम तीन हो गए।’

‘लेकिन तीन टिकट महाविकट!’  एक वकील ने चुटकी ली।

‘शुभ-शुभ बोलिए वकील साहब!’  मुनक्का राय ने आंख तरेर कर कहा तो वह वकील सटपटा गया। पर गिरधारी राय का यह लड़का ओम जिसे घर में सब लोग ओमई कहते थे बड़ी तेज़ी से मुनक्का राय की घेरेबंदी में लग गया। वह वकालत के पेंच कसना कम सीखता, मुनक्का राय को कहां-कहां और कैसे-कैसे मात दिया जा सकता है, इस के पेंच ज़्यादा ढंूढता। पहले दौर में उस ने मुनक्का राय के कुछ होशियार जूनियर तोड़े। फिर मुंशी तोड़ा। पर इन को ओमई ने तोड़ा मुनक्का राय को इस की भनक नहीं लगी। मुनक्का राय तो अपनी प्रैक्टिस, बच्चों की अच्छी पढ़ाई और सुखी पारिवारिक जीवन में मस्त थे। उधर रामबली राय का स्वास्थ्य बिलकुल साथ नहीं दे रहा था। आखें भी लाचार हो गई थीं। दिखाई कम देता था। अब ज़्यादातर मामलों में वह नाती को राय दे कर मुक़दमे निपटाते। कभी कोई बहुत ख़ास मुक़दमा होता तभी वह कोर्ट जाते। कोर्ट में उन का खड़ा हो जाना ही मुक़दमा जीतने की गारंटी हो जाता। लोग उन्हें चलती फिरती कोर्ट कहते। ओमई उन की इस गुडविल को जितना एक्सप्लाइट कर सकता था, करता।

मुनक्का राय की ज़मीन अब उन के नीचे से खिसक रही थी। उन के पुराने मुक़दमे भी अब ओमई के पास जा रहे थे, नए मुक़दमों की आवग कम हो गई थी। मुनक्का राय का बड़ा बेटा रमेश तब एम.एस.सी. की पढ़ाई कर रहा था और सिविल सर्विस की तैयारी भी। पर मुनक्का राय ने उस से कहा कि, ‘अब तुम एल.एल.बी. करो।’

‘पर मैं तो सर्विसेज़ की तैयारी कर रहा हूं।’

‘सर्विसेज़ छोड़ो।’  मुनक्का राय ने स्पष्ट आदेश दे दिया, ‘जो मैं कहा रहा हूं, वह करो।’

‘पर बाबू जी…….!’

‘कुछ नहीं!’  मुनक्का राय बोले, ‘बाप मैं हूं कि तुम?’

‘पर बाबू जी यह एम.एस.सी. तो कंपलीट कर लूं?’

‘हां, यह कर लो!’

जारी….

लेखक दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. उनके अन्‍य लेख तथा कहानियों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंग पर क्लिक करते जाएं।

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