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रातों रात कैसे बन गया नोएडा एक्‍सटेंशन वेलफेयर सोसायटी

रोहित मंगलवार को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा एक्‍टेंशन ज़मीन मामले में फैसला सुनाने के बजाय सुनवाई 17 अगस्त तक मुल्तवी कर दी तो ये साफ़ था कि अदालत पर दबाव बढ़ गया है. ये बात इससे भी साबित होती है कि आगे की सुनवाई के लिए इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर कर दिया गया. पहले ही इस मामले को दो जज सुन रहे थे. ये दबाव बिल्डर लॉबी का तो था ही लेकिन साथ ही मीडिया का भी था. मंगलवार को हाई कोर्ट के फैसले के बाद आईबीएन7 पर चल रही हेडलाइन ”75000 का भविष्य दांव पर”  उस दबाव को बयां कर रही थी. मुझे इस हेडलाइन पर आपत्ति है. जब नोएडा एक्‍सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेल्‍फेयर एसोसिएशन”  खुद कहती है कि 30000 फ्लैट मालिकों की नुमयिन्दगी कर रही है तो ये 75000 का आंकड़ा कहाँ से आया.

रोहित

रोहित मंगलवार को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा एक्‍टेंशन ज़मीन मामले में फैसला सुनाने के बजाय सुनवाई 17 अगस्त तक मुल्तवी कर दी तो ये साफ़ था कि अदालत पर दबाव बढ़ गया है. ये बात इससे भी साबित होती है कि आगे की सुनवाई के लिए इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर कर दिया गया. पहले ही इस मामले को दो जज सुन रहे थे. ये दबाव बिल्डर लॉबी का तो था ही लेकिन साथ ही मीडिया का भी था. मंगलवार को हाई कोर्ट के फैसले के बाद आईबीएन7 पर चल रही हेडलाइन ”75000 का भविष्य दांव पर”  उस दबाव को बयां कर रही थी. मुझे इस हेडलाइन पर आपत्ति है. जब नोएडा एक्‍सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेल्‍फेयर एसोसिएशन”  खुद कहती है कि 30000 फ्लैट मालिकों की नुमयिन्दगी कर रही है तो ये 75000 का आंकड़ा कहाँ से आया.

दूसरा ये कि जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि बिल्डर निवेशकों का पैसा सूद समेत वापस करेंगे तो फिर 75000 का भविष्य दांव पर कैसे हो गया. दांव पर या तो किसान हैं जिनसे उनकी ज़मीनें जबरियन छीन ली गयीं या फिर बिल्डर हैं,  जिनके दिवालिया होने की इबारत सुप्रीम कोर्ट ने लिख दी है.सारे मीडिया में इस खबर को ”आम निवेशक विरोधी”  पुट के साथ पेश किया जा रहा है. हर संस्‍थान में स्‍पेन डॉक्टर इस फिराक में लगे हैं कि कैसे जनहित का हवाला देकर अदालत पर दबाव बनाया जाये की वो अपने फैसले में संशोधन करने पर मजबूर हो जाये. पूरा मीडिया इस मामले को एक ज़बरदस्त क्राइसिस का जामा पहनाने में लगा है. इन ख़बरों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे अदालत ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया हो और वो सड़क पर आ गए हों. जबकि हकीकत ये है कि किसी भी प्रोजेक्ट में अभी घर का पजेशन नहीं हुआ है. क्‍या किसी ने ये पता लगाने की कोशिश की है कि जिन लोगों ने नोएडा एक्‍सटेंशन में घर बुक किये थे, उन में कितनों का ये पहला घर है, कितनों का दूसरा और कितनों का तीसरा.

इस फैसले से आम निवेशक को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि उसने तो मकान लोन पर लिया था, लिहाज़ा अगर मकान अधर में अटकता है तो वो लोन देना बंद कर देगा और अपने नुकसान को वहीँ सीमित कर देगा और इस नुकसान की भरपाई भी बिल्डर को करनी है. यहाँ तो नुकसान में वो बड़े- बड़े प्रोपर्टी डीलर हैं, जिन्होंने अपनी काली कमाई के करोड़ों रुपये नोएडा एक्‍सटेंशन में दांव पर लगा रखे थे. ज़रा सोचिये की बिल्डर अगर धोनी को ब्रांड अम्‍बेसडर बनाये तो समझा जा सकता है,  लेकिन नोएडा में तो प्रोपर्टी डीलर कंपनियों ने भी क्रिकेटरों को ब्रांड अम्‍बेसडर बना रखा है.  ऐसी ही एक कंपनी है इनवेस्‍टर क्‍लीनिक जिसके ब्रांड अम्‍बेसडर युवराज सिंह हैं. इनवेस्‍टर क्‍लीनिक के ऑफिस में जाकर बात करिए तो वो बताते हैं कि नोएडा और नोएडा एक्‍सटेंशन में चल रहे 76 प्रोजेक्ट्स में उनके पास फ्लाट्स उपलब्ध हैं और वो भी बाज़ार में सबसे सस्ते दामों पर. अदालत के फैसले की गाज इन प्रॉपर्टी डीलर्स और बिल्‍डर्स पर पड़ी है जो आम लोगों को औजार बनाकर उनसे विरोध प्रदर्शन करवा रहे हैं.

किसी चैनल या अख़बार में अभी तक किसी बिल्डर के खिलाफ एक शब्द भी सुनायी नहीं दिया है. अलबत्ता कुछ लोग तो अदालत को और कुछ किसानों को  विलेन बनाने में लग गए हैं. इसकी दो प्रमुख वजहें हो सकती हैं. पहली तो ये की बिल्डरों से हर संस्‍थान को अच्‍छे विज्ञापन मिलते हैं और दूसरी ये की तमाम  संपादकों ने किसी न किसी बिल्डर से भारी डिसकाउंट पर मकान ले रखा है. आखिर कास्‍टीट्यूशन क्‍लब में भ्रष्टाचार पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले हमारे संपादक  ये कहने की हिम्मत क्यों नहीं कर रहे की नोएडा एक्‍सटेंशन में एक ज़बरदस्त घोटाला हुआ है. मायावती सरकार ने करोड़ों की घूस लेकर औने-पौने दाम किसानों की ज़मीनें बिल्डरों को बेच दीं. वो भी बगैर ज़रूरी कानूनी कार्रवाई के. पहली बार मायावती सरकार एक ऐसी योजना लेकर आई जिसके तहत बिल्डर सिर्फ 10 प्रतिशत पैसा देकर ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता है और अपना प्रोजेक्ट लौंच कर आम जनता को मकान बेचना शुरू कर सकता है. बाकी पैसा वो आराम से 1-2 साल में अदा कर सकता है. पूरे नोएडा में ये बात आम चर्चा का विषय थी की मुख्यमंत्री का एक भाई नोएडा में ज़मीनों की दलाली कर रहा है. जिस किसी  बिल्डर को ज़मीन चाहिए उस भाई के पास माल पहुंचा के काम करवा सकता है. किस तरह सरकार और बिल्डरों ने मिलकर किसानों की ज़मीनें लूट लीं ये किसी संपादक को नहीं दिख रहा है.

एक और दिलचस्प पहलू इस खबर को दिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के रातों रात नोएडा एक्‍सटेंशन ऑनर्स वेलफेयर एसोसिएशन बन गयी और  एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी इसके प्रमुख भी चुन लिए गए. किसी ने इस बात पर दिमाग नहीं लगाया की रातों-रात एक संस्था किसके प्रयास से बनाई गयी और रजिस्‍टर भी हो गयी. आम निवेशकों की इस संस्था के पास अपनी पहली मीटिंग से पहले इतने पैसे कहाँ से आए की उसने प्रमुख अख़बारों में बड़े-बड़े  विज्ञापन छपवा दिए जिनकी कुल कीमत लाखों में होगी. कैसे नॉएडा के सबसे महंगे सेक्‍टर 18 के मार्केट में एक कामर्शियल इमारत में संस्था का ऑफिस खुल  गया. फैसला आने के दूसरे दिन ही बड़े डिजाइनदार बैनर छपवा कर संस्था ने नोएडा में विरोध प्रदर्शन भी कर दिया. बताया गया कि ये सब आम निवेशक हैं. क्या ये बात किसी ने नहीं सोची की आम निवेशक इतनी जल्दी इतनी तैयारी के साथ कैसे सड़क पर उतर सकते हैं,  जब तक की बिल्डर उन्हें पीछे से सहयोग नहीं कर रहे हों. मेरी जानकारी के मुताबिक इस संस्था को बिल्डर न सिर्फ पैसे दे रहे हैं बल्कि बाकी सहयोग भी कर रहे हैं. जो इस संस्था के अध्यक्ष चुने गए  हैं. श्री आरपी त्‍यागी रिटायर्ड आईपीएस, उनके भी कई बिल्डरों से अच्‍छे सम्बन्ध बताये जा रहे हैं. कुल मिला कर बिल्डर लॉबी आम निवेशक की दुहाई देकर  अदालत पर अपने आदेश को बदलने का दबाव बना रही है, लेकिन खबर के इस पहलू पर मीडिया चुप है.

एक और बात. हाल ही में बिल्डरों ने एक समिति बनाकर तय किया की बिल्डरों के क्या कोड ऑफ़ कंडक्‍ट होना चाहिए. उस समिति के अध्यक्ष पार्श्‍वनाथ बिल्‍डर्स के एमडी प्रदीप जैन थे. उस समिति ने ये कहा कि बिल्डरों को सुपर एरिया, कारपेट एरिया से 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखना चाहिए,  लेकिन नोएडा और नोएडा एक्‍सटेंशन में इसका धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है. आप किसी भी बिल्डर का ब्रोशर उठाकर देख ले, 1200 वर्ग फीट के मकान में आपको 800 -850 वर्ग फीट से ज्यादा जगह नहीं मिलती है. यानी आप 40 प्रतिशत सुपर एरिया का फालतू पैसा दे रहे हैं. ये सरासर लूट नहीं तो और क्या है. क्या किसी भी  चैनल या अख़बार में इस तरह की कोई खबर देखी गयी है. एक बिल्डर से जब मैंने इस बात पर जिरह की तो उसने कहा कि यही तो हमारी कमाई है. नोएडा एक्‍सटेंशन में जो कुछ हो रहा है वो बिलकुल ठीक है और ज़रूरी भी. इन बिल्डरों ने आपसी साठ गाँठ कर के नॉएडा और आसपास में प्रोपर्टी की कीमतों में आग लगायी है. लुभावने ब्रोशर और विज्ञापन दिखाकर आम निवेशक को काफी बेवकूफ भी बनाया है इन बिल्डरों ने. अब वक़्त आ गया है कि कुछ इनको भी सबक  मिले. मेरा ये कहना है कि अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले को जनविरोधी पेश करने की मुहिम पर मीडिया में लगाम लगनी चाहिए.

लेखक रोहित माथुर आजतक के स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट रह चुके हैं. फिलहाल आजकल मीडिया से अलग अपने जीविकोपार्जन में लगे हुए हैं.

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