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समाज-सरोकार

हिंदुत्‍व को सबसे बड़ा खतरा छद्महिंदुत्‍ववादियों से है

निरंकुश अल्पसंख्यक आर्यों के बेतुके और अहंकारपूर्ण तर्कों के अलावा भारत में सर्वाधिक स्वीकार्य मत के अनुसार सिन्धु नदी के किनारे आदिकाल से रहने वाले भारतीयों को आर्यों ने सबसे पहले हिन्दू सम्बोधन दिया था.  इसलिये इस निर्विवाद तथ्य की सत्यता पर सन्देह किये बिना हम भारतीयों ने इस बात को स्वीकार लिया है कि आर्य विदेशी नस्ल है.  इतिहासविदों द्वारा बार-बार प्रमाणिक तथ्यों से यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि आर्यों ने कालान्तर में अपनी कूटनीति और अपने बौद्धिक व्यभिचार, दुराचार, अपचार, अत्याचार और दुष्टताओं के जरिये मूल भारतीयों के धर्म (जिसे अब हिन्दू धर्म कहा जाता है) पर जबरन कब्जा कर लिया और स्वयं हिन्दू धर्म के सर्वेसर्वा बन बैठे.  इसके बाद इन्होंने जो नीतियां बनाई उन्हीं को उन्होंने हिन्दू धर्म कहना शुरू कर दिया और अपने इस थोपे गये हिन्दू धर्म को स्वीकार नहीं करने वालों के लिये नर्क के दण्ड की सजा निर्धारित कर दी.

निरंकुश अल्पसंख्यक आर्यों के बेतुके और अहंकारपूर्ण तर्कों के अलावा भारत में सर्वाधिक स्वीकार्य मत के अनुसार सिन्धु नदी के किनारे आदिकाल से रहने वाले भारतीयों को आर्यों ने सबसे पहले हिन्दू सम्बोधन दिया था.  इसलिये इस निर्विवाद तथ्य की सत्यता पर सन्देह किये बिना हम भारतीयों ने इस बात को स्वीकार लिया है कि आर्य विदेशी नस्ल है.  इतिहासविदों द्वारा बार-बार प्रमाणिक तथ्यों से यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि आर्यों ने कालान्तर में अपनी कूटनीति और अपने बौद्धिक व्यभिचार, दुराचार, अपचार, अत्याचार और दुष्टताओं के जरिये मूल भारतीयों के धर्म (जिसे अब हिन्दू धर्म कहा जाता है) पर जबरन कब्जा कर लिया और स्वयं हिन्दू धर्म के सर्वेसर्वा बन बैठे.  इसके बाद इन्होंने जो नीतियां बनाई उन्हीं को उन्होंने हिन्दू धर्म कहना शुरू कर दिया और अपने इस थोपे गये हिन्दू धर्म को स्वीकार नहीं करने वालों के लिये नर्क के दण्ड की सजा निर्धारित कर दी.

आर्यों के सर्वेसर्वा ब्राह्मणों ने स्वयं को ब्रह्मा के मुख से पैदा करवाकर, क्षत्रियों को ब्रह्मा की भुजाओं से, वैश्यों को ब्रह्मा की जंघाओं से और शूद्रों को ब्रह्मा के पैरों से पैदा करवा कर समाज को चार वर्गों (वर्णों) में हमेशा के लिये विभाजित कर दिया. समाजशास्त्रियों का स्पष्ट मत है कि इन वर्णों की सीमाओं को लांघने वाले लोगों को उनके अपने वर्ण या अन्य किसी वर्ण द्वारा नहीं अपनाये जाने और अपने वर्ण से बहिष्कृत कर दिये जाने के कारण ही कालान्तर में जातियों का उदय हुआ.  ब्राह्मण वर्ण के अलावा अन्य वर्णों के जिन लोगों ने आर्यों द्वारा जबरन थोपे गये वर्ण की सीमाओं को लांघना शुरू कर दिया, उनसे निपटने के लिये क्रूर आर्यों ने अपने कथित धर्म ग्रंथों में धर्म की चासनी लपेटकर ऐसे-ऐसे अमानवीय नियमों तथा प्रावधानों का उल्लेख किया कि आर्यों की आज्ञा का पालन नहीं करने वालों को पशुवत जीवन जीने को विवश होना पड़ा. आर्यों के इसी धर्म को ब्राह्मण धर्म या मनुवाद कहा जाता है.

हजारों वर्षों तक इस व्यवस्था के लागू रहने पर इस देश के हिन्दुओं ने आर्यों के इस अत्याचारी धर्म को ही हिन्दू धर्म और अपनी नियति मान लिया. आज आर्यों के बचे-खुचे अवशेष अपनी अनीतियों के दुष्परिणामस्वरूप इस देश पर थोपे गये इस कुधर्म को ही हिन्दू धर्म का नाम देकर मौलिक हिन्दुत्व को शर्मसार कर रहे हैं और तालिबानी प्रवृत्ति को बढावा दे रहे हैं. आर्यों द्वारा काबिज हिन्दू धर्म में सती प्रथा, छुआछूत, जातिगत भेदभाव, शूद्रों को शिक्षा से वंचित करना, बाल विवाह करना, शूद्रों को सार्वजनिक जलाशयों एवं कुओं से पानी नहीं भरने देना, शूद्रों को देव मन्दिरों में प्रवेश नहीं करने देना, विधवा स्त्री को पुनर्विवाह नहीं करने देना, स्त्री को शिक्षा एवं समानता से वंचित करना आदि कुकर्म धर्मानुसार माने जाते रहे हैं. इन सबके विरुद्ध अनेक महापुरूषों ने संघर्ष किया है जो आज भी जारी है. इस मानवीय संघर्ष को दबाने के लिये क्रूर और अमानवीय आर्य मानसिकता के बचे-खुचे लोग अपने चेहरे और चरित्र बदल-बदलकर और नये-नये लोकलुभावन मुखौटे लगाकर अभी भी जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं. अपने पूर्वजों के पापों और कुकर्मों की आलोचना करने वालों को हिन्दू धर्म एवं राष्ट्र के विरुद्ध कार्य करने वाला, विदेशों का ऐजेण्ट आदि घोषित करके देश में तालिबानी विचारधारा को पैदा कर रहे हैं.

कोई इन्हें कैसे समझाये कि अब इनके संस्कृत में रचित शास्त्रों को आँख बन्द करके पढ़ने वाली पीढ़ी का अवसान हो चुका है. आज की पीढ़ी विवेक और तर्क पर विश्‍वास करती है. आज अन्धश्रद्धा के स्थान पर बौद्धिकता को प्राथमिकता दी जाने लगी है.  आज लोगों के स्वतन्त्र चिन्तन में स्वाभिमान एवं वैज्ञानिक आधार की मौलिकता है. सच्चाई जानने के बाद क्रूर आर्यों के अवशेषों के अत्याचारों के कारण अनेक मूल भारतीय अपने आपको हिन्दू मानने तक को तैयार नहीं हैं.  रामकृष्ण मिशन वालों ने तो इस बात के लिये सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी है,  क्योंकि हिन्दू धर्म पर काबिज लोगों ने हिन्दत्व को घुटन रूपी कैदखानों में बदलने में कोई कोर सर नहीं छोड़ी है.  इसी के चलते अनेक हिन्दू धर्म परिवर्तन करने को विवश हैं. जिस में इन्हें विदेशी शक्तियों का हाथ नजर आता है,  लेकिन अपने कुकर्म जरा भी नहीं दिखते.  इस बात में कोई दो राय नहीं कि हिन्दुओं की इस दशा का इस्लाम एवं ईसाई धर्म के अनुयाइयों ने पूरा-पूरा लाभ उठाया. हिन्दुओं के लिये सर्वस्वीकार्य माने जाने वाले धर्मग्रंथ गीता तक को इन्होंने नहीं बख्शा. जिसमें भगवान कृष्ण के मुख से कहलवाया गया है कि-

” मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्यु: पापयोनय:.
स्त्रियो वैश्यास्तथा शमद्रास्तेअपि यांति परां गतिम्..”

इस श्‍लोक का हिन्दी अनुवाद हिन्दुओं में आदरणीय माने जाने वाले विद्वान आदिशंकर ने आठवीं शताब्दी में इस प्रकार किया है-

”पापयोनि, पापमय है योनि जन्म जिनका अर्थात् पापी जन्मवाले. वे कौन हैं? इसका उत्तर है-स्त्रियॉं, वैश्य और शूद्र”

आज के समय में उपलब्ध गीतानुवाद में इस श्‍लोक का अर्थ इस प्रकार से लिखा गया है.

” हे पार्थ, मेरा आश्रय लेने से पापों से उपजे ये लोग अर्थात्-स्त्रियॉं, वैश्य और शूद्र भी परमगति को प्राप्त होते हैं.”

इसी कुप्रवृत्ति के मतिमन्द हिन्दुत्व के ठेकेदारों की सरकारें ”गीता”  को स्कूल पाठ्यक्रम में अनिवार्य करके किस वर्ग को खुश करके, हिन्दुत्व का कितना भला कर रहे हैं, ये बात सहज समझी जा सकती है.  इससे गीता जैसे पवित्र ग्रंथ को अकारण ही विवाद का विषय बनाया जा रहा है.  जिसके लिये और कोई नहीं, केवल ढोंगी और छद्म हिन्दूवादी जिम्मेदार हैं. इसके साथ-साथ इन अहंकारी लोगों की ओर से लोकलुभावन शिविरों में आमन्त्रित करके हिन्दुओं को कुमार्ग पर ले जाने के लगातार प्रयास किये जा रहे हैं.  यह तो हिन्दू धर्म पर काबिज लोगों का चरित्र है, दूसरी ओर देश के सभी इलाकों में आतंकवाद का दैत्य लगातार सिर उठा रहा है.  जिसका एकमात्र लक्ष्य हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के अनुयाइयों को तहस-नहस करना है.  भारत की भूमि से हिन्दुत्व को नेस्तनाबूत कर देना इन आतंकियों का लक्ष्य है.  इसका एकजुट होकर मुकाबला करने के बजाय हिन्दू धर्म के कथित ठेकेदारों ने अपनी कुबद्धि का दुरूपयोग करके हिन्दू आतंकी दस्ते तैयार करना शुरू कर दिया है.  जिससे सारे संसार में हिन्दुत्व और हिन्दू शर्मसार हो रहे हैं.  छद्मधर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ने वाले राजनैतिक दल इस बहाने अपनी राजनैतिक रोटियॉं सेंक रहे हैं.

ऐसे हालात में आदिम और पुरातनपंथी सोच को त्यागकर सभी हिन्दुओं पर और विशेषकर हिन्दू धर्म पर हजारों वर्षों से काबिज हिन्दुत्व के कथित ठेकेदारों को आज के परिप्रेक्ष्य में सच्चाई को जानने और समझने की जरूरत है.  जिन लोगों ने हिन्दू धर्म या हिन्दुत्व को अपनी क्षुद्र और संकीर्ण मानसिकता के चलते राजनीति की चाशनी में लपेट लिया है, वे हिन्दू धर्म के सबसे बड़े और असली दुश्मन हैं.  ये लोग हिन्दुओं को जगाने या आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जागरूक नागरिक बनाने के बजाय संकीर्ण, उग्र और आतंकी बनाने पर उतारू हैं. इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान में सारे संसार में ब्राह्मणों एवं उनके अनुयाइयों द्वारा हजारों सालों से शोधित, पोषित, अनुदेशित और संचालित धर्म को ही अलिखित रूप में हिन्दू धर्म मान लिया गया है. ऐसे में हिन्दू धर्मस्थलों और हिन्दूवादी संस्थाओं पर काबिज या पदस्थ लोगों का यह पवित्र धार्मिक कर्त्तव्य है कि वे इस बात को समझें कि आज के समय में वे लम्बे समय तक दोहरा अपना चरित्र नहीं गढ़ सकते अर्थात एक और तो वे आपने पूर्वजों के धार्मिक अत्याचारों को न्यायसंगत ठहराने के लिये विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराकर अमानवीय, असमतावादी और भेदभावों से भरे पड़े धार्मिक ग्रंथों को पावन एवं पवित्र ठहराने के लिये कुतर्क गढ़ते रहें और दूसरी ओर दिखावे के लिये धर्मनिरपेक्षता, मानवता, समानता जैसे पवित्र लोकतान्त्रित मूल्यों के प्रति अपने आपको समर्पित दिखाने का नाटक भी करते रहें. ऐसे दुर्बुद्धि और चालाक लोगों को यह बात आज नहीं तो कल स्वीकार करनी ही होगी कि इक्कीसवीं शताब्दी में धार्मिक भेदभाव, जातिपांत, छुआछूत, जन्मजात उच्च कुलीनता जैसे अमानवीय, अवैज्ञानिक, विघटनकारी, भेदभावपूर्ण, अतार्किक और अलोकतान्त्रित बातें धर्म की आड़ में भी लम्बे समय तक नहीं चल सकती.

यदि हिन्दुओं को इस शताब्दी को अपनी अर्थात हिन्दुओं की शताब्दी बनाना है तो धर्मग्रंथों के मार्फत पोषित जन्मजातीय कुलीन अहंकार से परिपूर्ण वर्णवादी, अवैज्ञानिक, अतार्किक, संकीर्ण, शुद्र, अव्यावहारिक और साम्प्रदायिक बातों से मुक्त होकर हिन्दुओं को न मात्र भारतीय, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय लोकतान्त्रितक मूल्यों को स्वीकार करके और इन्हें अपने जीवन में अपनाते हुए आगे बढ़ना होगा. दुराग्रह और पूर्वाग्रहों को स्वेच्छा से त्यागना होगा. देश और समाज में अशान्ति एवं कानून व्यवस्था की स्थिति पैदा करने या हुड़दंग मचाने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा| कन्या भ्रूण हत्या पर वर्षभर चुप्पी साधे रहने वाले हिन्दुत्व के ठेकेदारों को हिन्दुत्व और हिन्दू संस्कृति की रक्षा के नाम पर वेलेंटाइन्स-डे पर युवक-युवतियों को तार्किक एवं आत्मीय तरीके से समझाने के बजाय अपमानित करने की प्रवृत्ति को त्यागकर, तेजी से बदलती अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रति सहज स्वीकार भाव पैदा करना होगा और उदारमना बनना होगा.

हिन्दुवाद को सत्ताप्राप्ति का साधन बनाने के बजाय जीवन में सरलता, सजगता, सुगमता, स्वभाविकता, प्राकृतिक सौन्दर्यता और वैचारिक तरलता जैसे भाव पैदा करने होंगे. हिन्दू धर्म के स्वघोषित मठाधीशों को अपने धर्म की कमियों को छिपाने या वास्तविक कमियों का दोष विदेशियों पर थोपने के बजाय उन्हें, जहॉं जैसी हैं, उसी रूप में सहजता से स्वीकारना होगा. हमें वर्तमान पीढ़ी से अपने अतीत को छुपाना नहीं है.  यह वर्तमान पीढ़ी के प्रति अपराध है.  यह सूचना छिपाने का नहीं पाने का युग है. आज के तकनीकी युग में अधिक समय तक कुछ छुपाया भी नहीं जा सकता. हमें हिन्दू धर्म की अच्छी बातों के साथ-साथ आज के सन्दर्भ में अतार्किक और अवैज्ञानिक बातों को भी उदारता से सामने लाना होगा. बेशक वे सब बातें हिन्दू समाज को फिसड्डी, अवैज्ञानिक या कुछ भी प्रमाणित करती हों, लेकिन हम उन्हें झुठलाकर सच्चे हिन्दू बनने के बजाय ढोंगी ही कहलायेंगे.

हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि आलोचना का मार्ग अप्रिय जरूर है, लेकिन यही कल्याण का सच्चा मार्ग है. इसलिये हमें अपने धर्म, धर्मग्रंथों, धर्माधीशों, ॠषियों, मुनियों, वेदों, उपनिषदों आदि सभी के अन्दर जाने का मार्ग सबके लिये खोलना होगा. हमारी वर्तमान पीढ़ी को इन सभी के अन्दर झांकर देखने और खुद निर्णय करने का अवसर प्रदान करना चाहिये. यदि आज का हिन्दू अपने धार्मिक इतिहास की अच्छाइयों के साथ-साथ हिन्दू धर्म की कमियों, कमजोरियों और बुराइयों को देखने, पढ़ने और समझने से ही वंचित कर दिया गया तो इन कमियों को ठीक कैसे किया जा सकता है? ऐसी कटु किन्तु सच्ची बातें को छुपाने या इनसे मुंह फेरने के दुष्परिणाम ही आज का हिन्दू झेल रहा है.

आज छद्महिन्दुत्वादी इन सब बातों को उजागर करने का लगातार विरोध करते रहते हैं और हिन्दुत्व के यथार्थ चेहरे को छुपाकर जनता को बनावटी तरीकों से लुभाने या भरमाने वाली बातें करते रहते हैं. इसके साथ-साथ समाज के दबे-कुचले वर्गों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध अनेक मनगढंथ एवं उकसाऊ बयानबाजी के जरिये जहर उगलते रहते हैं. जिससे समाज में शान्ति एवं सौहार्द नष्ट हो रहा है. इन सब कर्मों से ये लोग अपने आपको सच्चा हिन्दू कहलवाने और हिन्दुओं को अपनी विचारधारा का अनुयाई बनाने का ख्वाब देखते रहते हैं. मानसिक दिवालियेपन या मनुवाद के शिकार कुछ लोग ऐसे लोगों के बहकावे में आ भी जाते हैं और ये लोग इस प्रकार अपने आपका, हिन्दू धर्म का, समाज का तथा देश का उत्थान एवं विकास करने के बजाय केवल और केवल हिन्दू धर्म के साथ-साथ, देश के सर्वनाश को ही आमन्त्रित कर रहे हैं.

अपनी बात समाप्ति की ओर ले जाने से पूर्व हिन्दू धर्म के हित में हिन्दुओं के तैत्तिरीयोपनिषद की आत्मालोचन को समर्पित अमर वाणी का उल्लेख करना समीचीन समझता हूँ. इसमें ॠषि अपने शिष्य का मार्गदर्शन, साफ शब्दों में घोषणा करते हुए कहते हैं कि-

”यान्यवद्यानि कर्माणि, तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि.
यान्यस्माकं सुचरितानी, तानि त्वयोपास्यानि, नो इतनराणि..”

अर्थात् हमारे (ॠषियों के) जो कर्म निर्दोष हों, तुम्हें उन्हीं का अनुसरण करना चाहिए, दूसरे कर्मों का नहीं. हमारे जो अच्छे आचरण हों, तुम्हें उन्हीं का सेवन करना चाहिए, दूसरों का नहीं.

यहॉं पर तैत्तिरीयोपनिषद का ॠषि अपने आपको जानता है और वह दम्भी या ढोंगी भी नहीं है. उसे इस बात का ज्ञान (अहसास) है कि कुछ आचरण गलत हो सकते हैं. मानवीय कमजोरी ॠषि से भी परिस्थितिविशेष में दोषपूर्ण या गलत कार्य करवा सकती है. ॠषि इस बात को सीधे-सीधे स्वीकार कर रहे हैं कि कोई भी दूध का धुला नहीं है. ॠषि को यह सब कहने में कोई शर्म या ग्लानि का अनुभव नहीं हो रहा है. ऐसे में हमें आज हजारों वर्ष पुरानी, किन्तु आज के समय में अप्रासंगिक हो चुकी बातों को छुपाने की क्या जरूरत है? हमें सबकुछ आज की पीढ़ी को आम बोलचाल की सभी भाषाओं में अनुवाद करके बतलाना चाहिये, लेकिन अनुवाद में गली नहीं ढूंढी जावें, क्योंकि आज हिन्दुओं की सभी जातियों में तथा गैर-हिन्दुओं में भी संस्कृत को पढ़ने और समझने वालों की कमी नहीं है. अब असत्य बात, तर्क के समक्ष टिक नहीं सकती. हमें यह मानना ही होगा कि हिन्दू धर्म में और हिन्दू धर्मग्रंथों में सब कुछ है, जिसमें श्रेष्ठतम है, बहुत अच्छा है, अच्छा है और साथ ही साथ बुरा भी है, बहुत बुरा भी है तथा निकृष्टतम भी है. अपने इस मत के समर्थन में निरुक्क का एक कथन समाहित करके अपनी बात को विराम देना चाहूँगा.

निरुक्त कहते हैं कि जब ॠषि लोग दुनिया से उठने लगे, तब उनसे मनुष्यों ने पूछा कि अब हमारा ॠषि कौन होगा? इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि-

‘अब तर्क ही तुम्हारा ॠषि हुआ करेगा.’

आज हमें हिन्दुत्व के संरक्षण और संवर्द्धन के लिये कुतर्क करने और इतिहास या धर्म की अप्रासंगिक हो चुकी बातों को छुपाने या उनका नाटकीय अनुवाद करके उन्हें दबाने की नहीं, बल्कि सच्चाई को स्वीकार करके तर्क तथा वैज्ञानिक चिन्तन को अपनाने की जरूरत है.

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ चिकित्सक,  प्रेस पालिका के संपादक तथा मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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