: शाहन के शाह : कुमारिल भट्ट ने दी आदिशंकराचार्य को ऊंचाई : उनके तर्क और आस्था के अनुसार वेदांत का अध्ययन और चिंतन ही मोक्ष की प्राप्ति का सहायक तत्व है, लेकिन उसने देह-त्याग का जो तरीका अपनाया, वह किसी के भी रोंगटे खड़े कर देगा। जिस दर्शन की जड़ें खोदने के लिए उसने जिस गुरु से विद्या का अध्ययन किया था, उसके प्रति अपने अपराध के प्रायश्चित के लिए उसने आत्मदाह का फैसला किया। जरा कल्पना कीजिए कि लोगों का हुजूम हाहाकार कर रहा हो, तब के श्रेष्ठतम विद्वान उससे अपनी रचनाओं की समीक्षा का अनुरोध कर रहे हों, और वह शख्स खुद की बनायी धधकती चिता पर लेटा अपनी ही जान देने पर आमादा हो। सारे अनुरोध और आग्रह बेकार गये और आखिरकार देखते ही देखते वह शख्स भस्म हो गया।
यह थे कुमारिल भट्ट। वेदांत के उद्भट विद्वान। ज्ञान के मामले में वे किसी सूरज से कम नहीं माने जाते थे। उनका यह कृत्य कुछ लोगों को उनके तर्कों के आधार पर कथनी और करनी के बीच विरोधाभासी लग सकता है। लेकिन कुमारिल भट्ट का यह फैसला उनके अध्ययन के आधार पर बिलकुल सटीक है। अपनी ही अंतरात्मा में वे वैदिक आदर्शों और गुरू-द्रोह के अपराधी थे और उनके अनुसार उनका प्रायश्चित केवल यही था कि वे अग्नि में खुद को भस्म कर दें। यही कारण है कि अपनी भेंट के समय दोनों पैर तक झुलस चुके कुमारिल को खुद आदि शंकराचार्य तक ने नहीं रोका। जबकि यह तय था कि आचार्य शंकर का लिखा ग्रंथ तब तक विद्वत समाज में स्वीकार्य नहीं होगा, जब तक उस पर आचार्य कुमारिल भट्ट अपनी टिप्पणी न लिख दें। शंकराचार्य ने अपने पक्ष में अनुरोध किया लेकिन कुमारिल भट्ट ने मौजूदा हालत में यह काम खुद कर पाने में अपनी असमर्थता जताते हुए उन्हें एक अन्य विद्वान मंडन मिश्र के पास भेज दिया और खुद अपनी ही जलायी आग में विलीन हो गये। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि यदि आदि शंकराचार्य की भेंट कुमारिल भट्ट से न होती और कुमारिल भट्ट ने चिता में भस्म होते समय शंकराचार्य को मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती के पास न भेजा होता तो आदि आचार्य शंकर उन ऊंचाइयों तक पहुंच ही नहीं सकते थे, जहां वे बाद के बरसों से लेकर आज तक विद्यमान हैं।
आज से करीब 1500 साल पहले की यह हृदयविदारक घटना घटी आज के इलाहाबाद में झूंसी के करीब। हालांकि इसमें खूब मतभेद है कि कुमारिल भट्ट का जन्म कहां हुआ। कुछ लोगों के अनुसार वे बिहार के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे तो कुछ लोग उन्हें दक्षिण भारतीय ब्राह्मण मानते हैं। धर्म क्षेत्र में वे शंकराचार्य और वाचस्पति मिश्र के पूर्ववर्ती माने जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि भवभूत नामक विद्वान के वे गुरु थे। सन 650 के आसपास वे पैदा हुए। मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती उनकी शिष्य मंडली में थे। उनकी ज्ञान सम्पदा के बारे में यहां तक माना जाता है कि सम्राट हर्ष के अंतिम समय तक कुमारिल भट्ट का यशसूर्य पूरे आर्यावर्त को प्रकाशित कर चुका था। उन्होंने भी पारिवारिक परंपरा के तहत वे वेद-वेदांग में पारंगत हुए। आम तौर पर माना जाता है कि वेदों में सम्पूर्ण आस्था वाले कुमारिल भट्ट यह सहन नहीं कर पाते थे कि तब का बौद्ध और जैन समुदाय वेदों में मीनमेष निकाल कर उनका अपमान करे। तब तक बौद्ध और जैन मत समाज में खासा फैल चुका था। इन धर्मों को राजाश्रय भी था, जबकि वेद-वेदांग के जानकारों की संख्या लगातार तेजी से घट रही थी। नतीजा, कुमारिल ने भी बौद्ध और जैन धर्म को समझने की कोशिश की। हालांकि उनका मकसद था कि इन धर्मों के तत्वों को समझकर वेद-विरोधी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। वे छद्मनाम से बौद्ध-शाला में पहुंचे और देखते ही देखते बौद्धजगत में भी प्रसिद्ध हो गये।
कहा जाता है कि एक दिन कक्षा में ही उनके बौद्धगुरु ने वेद को लेकर कोई कठोर टिप्पणी कर दी। कुमारिल लाचार थे, सो चुपचाप रहे। लेकिन उनकी आंखों से अश्रुधारा बह चली। वहां मौजूद उनके साथी समझ गये कि कुमारिल बौद्ध नहीं, वैदिक है। एक अन्य कहानी के अनुसार इसी विहार की सातवीं मंजिल से कुमारिल को छद्मनाम से बौद्ध-छात्र बनने के अपराध में उनके साथियों ने नीचे फेंक दिया। हालांकि इस घटना में उन्हें कोई बड़ी शारीरिक चोट नहीं आयी, लेकिन वे अपनी एक आंख खो बैठे। इसके बाद से ही वे वापस अपने मूल यानी वेद-वेदांत की ओर लौट आये। बाद में कुमारिल ने अपने ही गुरु से शास्त्रार्थ में बाकी मतों को भाषा के आधार पर खारिज करते हुए अकाट्य तर्क के आधार पर वेदों को अपौरूषेय होना प्रमाणित कर दिया। नतीजा, शर्त के आधार पर गुरु को अग्नि में कूद कर प्राण त्यागने पड़े। लेकिन इस महान वेदपाठी की आत्मा लगातार उसे कचोटती रही कि उसने झूठ का सहारा लेकर किसी आश्रम में प्रवेश लिया। उसके अनुसार यह शास्त्रोक्त नहीं था, बल्कि गुरु-द्रोह भी था। इसके बाद उनके मन में आत्मग्लानि का जो भाव पनपा, वह आखिरकार आत्मदाह की परिणति तक पहुंच गया।
कुमारिल ने प्रमा यानी यथार्थ ज्ञान की समीक्षा की और उस पर विस्तार से विवेचना की। कुमारिल भट्ट के अनुसार प्रमा यानी प्रमाण उसे कहते है जिसके माध्यम से अज्ञात से प्रकाश की ओर बढ़ते समय सत्य वस्तु का ज्ञान किया जा सके। इसके तहत यह प्रमाण निर्दोष कारणों से जन्मता है और किसी अन्य तत्व से न तो उसमें बाधा आती है और न ही उसका किसी अन्य तरीके से समाधान ही किया जा सकता है। कुमारिल भट्ट के तीन प्रमुख ग्रंथ मशहूर हैं। श्लोकवार्तिक, तंत्रवार्तिक और टुप्टीका नामक यह सभी शाबर भाष्य से संबंधित हैं। आज तक इस क्षेत्र के विद्वान निर्विवाद मानते हैं कि इन ग्रंथों में आचार्य कुमारिल भट्ट की अप्रतिम व असाधारण प्रतिभा और उनकी अमरता मौजूद है।
बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को कुमारिल स्वीकार करते और अद्वैत वेदांत अथवा महायानी बौद्ध दर्शन की तरह संसार को मिथ्या नहीं बताते। उनका कहना है कि संसार तथा पदार्थों का स्वतंत्र अस्तित्व है। भाव और अभाव पर उनका गहरा चिंतन है। अनेक मसलों पर कुमारिल का बौद्धों से गहरा विरोध है। कारण यह कि वे सामान्य की सत्ता स्वीकार नहीं करते। वे तो संसार की उत्पत्ति तथा प्रलय भी नहीं मानते। उनके मतानुसार संसार में वस्तुएँ लगातार उत्पन्न तथा नष्ट होती ही रहती है। जीवों के जीने और मरने का क्रम भी चलता ही रहता है लेकिन इस संसार की न तो उत्पत्ति ही होती है और न ही इसका विनाश। वे तो ईश्वर को सृष्टि का कारण भी नहीं मानते।
कुमारिल वेदांत का अध्ययन और चिंतन मोक्षप्राप्ति में सहायक बताते हैं। वे मानते हैं कि मोक्ष की अवस्था में आत्मा का शरीर, इंद्रियां, बुद्धि और अन्य संसारिक वस्तुओं से संबंध हमेशा के लिए विलीन हो जाता है और आत्मा दुख-क्लेश आदि से पूरी तरह मुक्त हो जाती है। तब न तो सुख की कोई अनुभूति होती है और न ही कष्ट आदि की। दरअसल कोई भी अनुभूति शेष नहीं रह जाती है तब। इससे श्रेष्ठ और सम्पूर्ण स्वतंत्रता और शांति कहीं और नहीं, लेकिन इसका भी भाव नहीं रहता। यह पूर्णमुक्ति की हालत होती है। लेकिन इसका भी आभास नहीं किया जा सकता है। परन्तु मोक्ष पाने के लिए कई कर्मों का त्याग करना जरूरी है जो काम्य भी हैं और निषिद्ध भी। लेकिन कुमारिल मानते हैं कि इसके बावजूद नित्य व नैमित्तिक कर्मो से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। वे तो श्राद्ध आदि की भी अनिवार्यता बताते हैं और इसमें वैदिक प्रणाली की अनिवार्यता बताते हैं।
दरअसल, कुमारिल एक नैष्ठिक वैदिक और वेदांत ज्ञाता रहे हैं। लेकिन तब समाज में बढ़ी बौद्ध और जैन दर्शन की प्रवृत्ति का खंडन करने के लिए उन्होंने इन दर्शनों का भी अध्ययन किया। छद्मवेश में वे इन धर्मों के विहारों में पहुंचे और उसके ज्ञान तत्व को श्रेष्ठतम तौर पर समझा। अब वे वैदिक धर्म की बेहतर व्याख्या करने में सक्षम हो चुके थे कि अचानक ही उनके बौद्धगुरु ने वैदिक धर्म को निकृष्ठ बता दिया। कुमारिल बोले तो कुछ नहीं, लेकिन आंखों में आंसू आ गये। यह बात वहां मौजूद लोगों की निगाह में आ गयी। कुमारिल का विरोध शुरू हो गया और एक दिन तो उन्हें उस विहार की कई मंजिल से नींचे फेंक दिया गया। हालांकि इस घटना से कुमारिल को कोई खास क्षति नहीं हुई, लेकिन उन्हें अपनी एक आंख गंवानी पड़ गयी। कुछ भी हो, इस घटना ने कुमारिल के हृदय पर गहरा आघात लगाया। वे बैदिक धर्म की उस आस्था के आगे शर्मिंदा हो गये जिसमें गुरु से स्वयं को छिपाना घोर अपराध माना जाता था। कुमारिल ने अपना प्रायश्चित पूरा किया और खुद की बनायी चिता में स्वयं को जलाकर राख कर लिया। लेकिन कुमारिल भट्ट का नाम तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध तो हो ही गया।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

