जीवन में जो आज है ज़रूरी नहीं वह कल भी रहे. जो संगी साथी आज हैं वह कल बिछड़ भी सकते हैं. जो दौलत का अम्बार है जो साज़ो सामान है वह कल रहे न रहे कौन कह सकता है. जापान में आई सुनामी में किसका क्या बचा किसका क्या रहा कोई सोच सकता है. इसी प्रकार माता पिता, भाई बहन रिश्तेदार कब तक आप का साथ देंगे किसे मालूम है. इसी लिए हर इन्सान डरा सहमा सा रहता है कि कहीं यह सब चला न जाये. अंत तक लड़ता है अपना सब कुछ बचाने के लिए. और जब कुछ खो जाता है तो परेशान हो जाता है. वह यह नहीं सोचता कि आख़िर पीर फ़क़ीर पैग़म्बर, संत और इश्वर के दूत यह सब त्याग कैसे देते हैं. उनकी ज़रूरतें इतनी कम क्यों हैं. जीवन को चलाने के लिए कितना चाहिए.. आज तो स्थिति यह हो गयी है कि और.. और… और… और…की आवाज़ ने सब को प्रक्रति से दूर कर दिया है.
हर इन्सान अधिक से अधिक की हवस में फंस गया है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि ईश्वर की सब से बड़ी देन पानी धरती और हवा सब बाज़ार के हाथ चले गए हैं. आज पानी बोतल में बंद करके बेचा जा रहा है, हीरा मोती उगलने वाली ज़मीनें कौड़ियों के मोल ख़रीद कर सोने के भाव बेची जा रही हैं. यही स्थिति रही तो हवा भी बाज़ार से खरीद के लानी पड़ेगी और जो नए नए प्रकार के एसी आ रहे हैं वह तो हवा को शुद्ध करने का दावा कर ही रहे हैं. तो कुल मिलाके इन्सान ने प्रगति कर ली है और इस प्रगति के सफ़र में उसने अपनी निसर्ग सम्पदा को बर्बाद कर के बाज़ार के हाथों ख़ुद को मिटाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है.
अगर किसी को समझाएं भी तो आज का इन्सान नहीं समझ सकता. समझेगा कैसे आज के संत दरवेश तो जीवन ही अलग जी रहे हैं. वह पहले होता था कि गुड़ खाने को मना करने से पहले ख़ुद गुड़ खाना छोड़ते थे संत. किन्तु अब तो यह है कि तुम सब त्याग दो और मुझ पर उतार दो. इसी लिए तो बात जहाँ जानी चाहिए वहाँ तक नहीं जा पाती है. सब का अपना एक गणित है और इसी ने जीवन का गणित बिगाड़ दिया है.
मान लीजिए आज आप का सब कुछ समाप्त हो जाये तो आप क्या करेंगे. कम से कम जो ज़रूरतें हैं उन पर गुज़ारा करेंगे न.. सर छुपाने के लिए एक छत.. दो जून की रोटी और लोगों में इज़्ज़त बनी रहे ऐसा कोई कार्य… आप कमज़ोर हो रहे हैं ऐश भरे जीवन के कारण … आप चारपाई पर क्यों नहीं सो सकते.. लकड़ी का बढ़िया सा मंहगा डबल बैड ही क्यों चलेगा.. वहाँ तो गाँव में कीड़े मकोड़ों का डर था, कची ज़मीन थी इस लिए धरती पर सोने में डर था मगर यहाँ क्यों नहीं पक्के फर्श पर सो सकते हैं… आप के घर में अधिकतर सामान ग़ैर ज़रूरी है जिनकी आपको ज़रूरत नहीं है… यह आप ने अपनी महनत से हासिल किया है मगर दूसरे का घर भरने के लिए.
याद कीजिये जब आप ने शुरुआत की थी तो कम से कम में भी आप ने जीवन गुज़ारा था मगर फिर दिखावे और झूठी शान के चक्कर में आप ने अपना चैन लुटा कर रात दिन एक कर के यह सब सामान जमा किया है मगर इनका सुख आप नहीं ले पाते.. आप की रात करवटों में गुज़रती है.. ज़रा सा खटका होता है तो डर लगता है कि कहीं क़िस्तों का चेक ही फ़ैल न हो जाये… सोचिये जहाँ पसीना मुफ़्त नहीं देता कोई उसने आप को प्लास्टिक का कार्ड थमा दिया है मुफ़्त में और इसके प्रयोग पर भी इनाम देता है… बस इधर आरज़ू जागी उधर आप ने बाज़ार की झोली भर दी और फिर पिसना शुरू हो गए… इतना भी समय नहीं दिया कि आप सोच सकें अगर मैरे पास यह नहीं भी होगा तो क्या में मर जाऊंगा … फिर कहीं यह छिन न जाये इस डर ने आप को जकड़ लिया और इसी डर ने आपको आप से और परिवार से दूर कर दिया.
कभी कभी सब कुछ छिन जाने के सुख में जीने की कोशिश कीजिये…शुरू में अजीब सा लगता है मगर यह सुख है शानदार.. बहुत तजुर्बे होते हैं.. अपने पराये की पहचान होती है ..अपने बच्चों से रोज़ मुलाक़ात होती है.. वह सब कुछ मिलता है जो आप से छिन चुका है.. सब कुछ छिन जाने के बाद…गौतम यूँ ही तो नहीं सब छोड़ के गए थे…. आप को पता चलता है कि आप में अभी और लड़ने की शक्ति है.. आप को अपनी नयी शक्ति का आभास होता है और याद रखिये सब कुछ हमेशा तो नहीं रहना था.. जो आज छिना है वह कल भी छिनता ही…एक बार इस सुख का एहसास कीजए अपने आप…. इस से पहले कि कोई और आप से सब कुछ छीन कर आप को यह एहसास कराये.. कम से कम जो ज़रूरतें हैं उन को अपनाइए.. बाज़ार को खरीदने के चक्कर में बिकिये मत.. आप देखेंगे कि अधिक से अधिक की दौड़ से अच्छी कम से कम की सोच है.. यही असली सुख है…सब कुछ छिन जाने का सुख…!!
वह जो इतने लोग जमा कर लेते हैं
जाने क्या क्या रोग जमा कर लेते हैं
कैसे भूखे लोग यहाँ हैं दुनिया में
तेरा मेरा भोग जमा कर लेते हैं
उन के आंसू आहें किस ने देखे हैं
हंस हंस कर जो सोग जमा कर लेते हैं
बच्चे जैसे कंकड़ चुन कर लाते हैं
हम भी ऐसे व्योग जमा कर लेते हैं
बाहर से तो दुनिया वाले लगते हैं
दिल के अंदर जोग जमा कर लेते हैं.
लेखक तहसीन मुनव्वर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. पत्रकारिता से लेकर लेखन तक के कई आयाम नापे हैं. पत्रकार हैं, एंकर हैं, शायर हैं, लेखक हैं, टीचर हैं, कवि हैं, गीतकार हैं, कहानीकार हैं यानी कई शख्सीयतों के संगम हैं. हिंदी, उर्दू, पंजाबी सहित कई भाषाओं के जानकार हैं. विज्ञापनों और जिंगल से लेकर फिल्मों, धारावाहिकों, रेडियो तथा टीवी के लिए लेखन कर चुके हैं. कश्मीर में इन्होंने दूरदर्शन के लिए उस समय रिपोर्टिंग और एंकरिंग की जब वादी गोलियों की तड़तड़ाहट एवं बमों के धमाकों से गूंजा करती थी. कई अखबारों और मैगजीनों में इनके स्तंभ छपते हैं. इंदौर में 2008 में निदा फाजली के साथ भरोसा सम्मान से सम्मानित तहसीन ने अपनी कविताओं की किताब ‘धूप चांदनी’ में जीवन के कई रंगों को उकेरा है. उनकी कहानी की किताब ‘मासूम’ को उर्दू अकादमी ने सम्मानित किया है. इसके अलावा भी वे कई सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं. देश-विदेश में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. फिलहाल रेल मंत्रालय में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं.

