वह वास्तव में सत्य का प्रकाश था। नाम का ही नहीं, बल्कि समाज के उलाहनों से अलग खुद को बनाने वाला सत्यकाम। पिता का पता नहीं, लेकिन मां के प्रति मन में कोई घृणा-भाव नहीं। बल्कि अपने अज्ञात पितृत्व के प्रश्न को अतीत के अंधकार में दफ्न करके उसने अपनी मां के नाम को ही गोत्र बना लिया। और यह तब हुआ जब शायद समाज उसकी हालत कुबूल करने को तैयार नहीं था। लेकिन उसने अकेले ही अपनी निष्ठा, समर्पण, अदम्य इच्छाशक्ति और जुझारूपन से वह इबारत लिखी, जो महिला सशक्तिकरण के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में है। उसने साबित कर दिया कि अतीत का गुण क्षयमान और नश्वर होता, जबकि वर्तमान में हुए प्रयास ही मनुष्यत्व तय करते हैं।
यह किशोर था सत्यकाम, जिसे हम सत्यकाम जाबाल के नाम से जानते हैं। जाबाला नाम था सत्यकाम की मां का। बेहद गरीब व परम्परागत परिवार की अविवाहित जाबाला अपने जीवन-यापन के लिए एक अमीर परिवार में घरेलू नौकरानी थी। इस तथ्य को लेकर इतिहास में खासा अंधेरा है कि उसका परिवार, नगर क्या था, या किस परिवार में वह परिचारिका थी। सेवाकाल में ही वह गर्भवती हो गयी। लेकिन आज की युवतियों या महिलाओं की तरह उसने इस दायित्व से मुंह नहीं मोड़ा और न अपने गर्भस्थ शिशु को जिन्दगी से दूर करने की कोई कोशिश ही। शिशु के जन्म के बाद उसे वर्तमान से दूर कर अपने भविष्य को निष्पाप बनाने का भी प्रयास नहीं किया।
हां, कुंवारी मां बनने पर तीखे सामाजिक उलाहनों के बावजूद उसे न तो इस बच्चे से कोई चिढ़ थी और न पश्चाताप। उसे बच्चा मिला और इसका उसे संतोष और आत्मगौरव था। उसे तो उस बच्चे के पिता के प्रति भी कोई विद्वेष नहीं रहा, इसीलिए उसने उसका नाम रखा- सत्यकाम। यह उसकी आत्मगौरव की अनुभूति ही रही होगी। समय बीता रहा, तो बच्चे के साथियों ने उसके पितृत्व को लेकर सवालात खड़े किये- तेरा पिता कौन है। लाडले की जिज्ञासाओं का सामना जाबाला को करना पड़ा। जाबाला ने धैर्य नहीं खोया। उसे सत्यकाम की जिज्ञासाओं का जवाब देने के लिए तैयार थी। बेहिचक कह दिया- मुझे न तो तुम्हारे गोत्र का पता है और न ही तुम्हारे पिता का। तुम बस मेरे पुत्र हो। उम्र छोटी जरूर थी, मगर सत्यकाम समझ गया। लेकिन गोत्र का सवाल तो मौजूद था ही। उपनयन संस्कार की उम्र हो ही चुकी थी और बिना गोत्र जाने कौन यह संस्कार कराता। सवाल मुश्किल तो था, लेकिन सत्यकाम के लिए नहीं। उसने इसका भी समाधान खोज लिया। किसी भी बच्चे का गोत्र तो वही होता है जो उसके जन्मदाता से उस तक पहुंचता है। अब चूंकि उसे जन्म तो उसकी माता जबाला ने ही दिया था, इसलिए उसका गोत्र भी जबाल ही होगा। यानी सत्यकाम जाबाल।
बस हो गया काम। उपनयन संस्कार के लिए सत्यकाम ने हारिद्रुमत गौतम के आश्रम की ओर का रूख किया। परिचय की सामान्य परम्परा के चलते आचार्य गौतम के इस सवाल के पूछने पर उसने बेहिचक अपनी मां की कही बात सारी बात ज्यों की ज्यों बयान कर दी। उसने साफ कहा कि उसकी मां जाबाला से हुआ है और मां को उसके पिता का नाम याद नहीं। आचार्य इस बात पर स्तब्ध नहीं थे कि उन्होंने ऐसी सीधी-खरी बातें कभी सुनी न थीं, लेकिन सचाई दिल दहला गयी। तुर्रा यह कि यह बात उस बच्चे ने इतनी सहजता और पूरे आत्मविश्वास के साथ कही थी जिसकी उम्र अभी महज 7 साल की ही थी। सत्यकाम की सचाई निष्पाप और स्पष्ट थी। वे समझ गये कि बालक में सत्य-ब्रह्म है। गुरु ने भी कहा कि वत्स! ब्राह्मण ही ऐसा सत्यवादी हो सकता है। लेकिन आचार्य गौतम उसके धैर्य और निष्ठा की परीक्षा लेना चाहते थे। उपनयन संस्कार करा तो दिया, लेकिन आदेश भी दिया कि आश्रम की 100 दुर्बल गायों को जंगल में चराये। शर्त कि वापस तब लौटना, जब इनकी संख्या एक हजार हो जाए। गुरू की आज्ञा सर्वोपरि, सत्यकाम जाबाल गुरू को प्रणाम कर कृषकाय गायों को हांक ले गया। बहुत लम्बा समय उसने जंगल में गायों की सुरक्षा में लगाया, बेहद कष्टों के बीच उसने जंगल का जीवन बिताया। हिंसक जानवरों से गौवों और खुद की रक्षा के अलावा उसे जीवन-यापन के लिए भी उसे दुष्कर हालात मिले। किंवदंतियों के अनुसार एक दिन साक्षात शंकर ने एक वृषभ का रूप धरा, कहा- एक हजार गायें हो चुकी हैं। अब वापस आश्रम लौट जाओ।
जंगल में सत्यकाम ने आग से ‘अनंतवान’, साथी हंस से ‘ज्योतिष्मान’ और मद्गु से ‘आयतनवान’ नामक चतुष्कल पदों की जानकारी के साथ ही मर्म भी समझा। जाहिर है, ज्ञान से उसके चेहरे को तेज से दमका दिया। आश्रम में पहुंचने पर गौतम को वह ब्रह्मज्ञानी जान पड़ा। महर्षि गौतम ने उसे महान ऋषियों की रचनाओं और उपदेशों की व्याख्या समझाकर उसके तेज को और भी दैदीप्यमान कर दिया। आचार्य ने सत्काम को ब्रह्म की कलाओं के चार-चार पदों को समझाया। यह कलाएं थीं-
प्रकाशवान- पूर्वदिक्कला, पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला, उत्तर दिक्कला।
अनंतवान- पृथ्वीकला, अंतरिक्षकला, द्युलोककला, समुद्रकला।
ज्योतिष्मान- सूर्यककला, चंद्रककला, विद्युतकला, अग्निकला।
आयतनवान- प्राणकला, चक्षुकला, श्रोत्रकला, मनकला।
सत्काम जाबाल की यह कहानी या जीवनी, जो भी हो, कम से कम उसकी गुरूभक्ति, ज्ञान-पिपासा, जीवन के अर्थ प्रकृति से खोजने की नैसर्गिक प्रवृत्ति का दर्शन तो कराती ही है। और इनमें भी सर्वोच्च भूमिका तो उसकी माता जबाला ने निभायी जिसने नि:संकोच खुद को अपने बच्चे ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत के समक्ष सत्यता के सवाल पर निरावृत्त कर दिया। यह असम्भव सा काम कर डालने वाली जबाला ही तो थी जिसने अपने बच्चे को महानतम ज्ञानी के तौर पर प्रस्तुत कर दिया। और कौन जाने कि सत्यकाम जाबाल के इस प्रयास के कारण ही भविष्य में महिलाओं की हालत में इतना सुधार आया हो, कि अब कोई महिला अपने बच्चे को आसानी से उसके पितृ-नाम से वंचित नहीं कर सकती। हां, इतना जरूर है कि तथाकथित बड़े और सम्पन्न घरों में काम करने वाली महिलाओं की हालत की हकीकत, सत्यकाम जाबाल के जीवन में आसानी से देखी-समझी जा सकती है। समय के साथ जीवन-मूल्यों का विकास तो हुआ, लेकिन ऐसी सचाई का सामना करने की क्षमता का लगातार ह्रास अब शायद पूरी तरह ही हो चुका है। मगर यह हकीकत है कि जबाला, सत्यकाम और आचार्य गौतम आज भी समाज में ईमानदारी और सत्य-प्रकाश सदा प्रज्ज्वलित कर सकते हैं। और यही साहसिक ईमानदारी ही तो है नृवंश के विकास की पहली शर्त।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

