अन्ना के साथ आज पूरा देश खड़ा है। यह हूजूम पूरे जोश में है। धूप में, पानी में भींगते, सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, नेट पर, देश भर के मीडिया में लबालब- ठसाठस भरे। इससे यह तो जरूर उजागर होता है कि अवाम भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इससे हर हाल में छुटकारा पाना चाहती है। भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए ही आज अन्ना और सिविल सोसाइटी के साथ देशवासी एक सशक्त लोकपाल के लिए आंदोलन कर रहे हैं। मीडिया भी लगातार सजीव प्रसारण में चैबीसो घंटे लगी हुई हैं। शायद देश में इसके अलावा और कुछ घटित नहीं हो रहा है! मैं इस उद्देश्य से पूरा इत्तेफाक रखते हुए और अण्णा की गिरफ्तारी व सरकार का उनके प्रति रवैये का पुरजोर विरोध करते हुए भी कई सवाल उठाना चाहती हूं (इस खतरे के साथ भी कि आज इस पर कोई सवाल उठा देना मात्र भी देशद्रोह की श्रेणी में जा रहा है)!
सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर यह आंदोलन किस लिए है यह रैली की भीड़ में चलने वाले भी नहीं जानते। किस तरह का लोकपाल सिविल सोसाइटी चाहती है और उससे कैसे भ्रष्टाचार तुरत समाप्त हो जाएगा? क्या अन्ना यानी सिविल सोसाइटी का लोकपाल जादू की छड़ी होगी? क्या हमारे देश में मौजूदा कानून या संवैधानिक प्रावधान प्रभावी नहीं हैं? लेकिन राजा, कनिमोई, जैसे देश के राजनेता, आज सिविल सोसाइटी के लोकपाल से पहले ही, महीनों से जेल में हैं। अभी- अभी कल ही जस्टिस सौमित्र सेन को राज्य सभा में महाभियोग की कार्यवाही के तहत दोषी ठहराया गया है, जो अब लोकसभा में कार्यवाही के लिए भेजा जाएगा। यह तो ताजा उदाहरण हैं। ऐसी ढेरों कार्रवाईयां हैं जो बताती हैं कि हमारे देश में मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। चाहे किसी दल की सत्ता केंद्र में हो इनका उपयोग करने के लिए इच्छाशक्ति का होना ही केवल जरूरी है।
एक सवाल यह भी है ऐसी क्या व्यवस्था हो सकती है कि आनेवाला लोकपाल ही भ्रष्टाचार से ग्रसित नहीं हो जाएगा? आखिर सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले लोकपाल विधेयक और सिविल सोसाइटी द्वारा तैयार किए गए या फिर कि संसद में किसी भी सांसद द्वारा तैयार, प्रस्तुत इस संबंध में कोई विधेयक ( जिसे किसी भी सांसद को प्रस्तुत करने का संवैधानिक हक है।) किस तरह से अलग होंगे? आखिर वे प्रस्तुत किए जाने के बाद इसी संसद में सांसदों, फिर चाहे वे पक्ष के हो या विपक्ष के, की बहस-परख के बाद, कमियों को दूर कर ही तो पारित किए जाएंगे। सबसे बड़ा सवाल है कि जो जनता आज इस आंदोलन में पूरे जोश के साथ है कैसे उनमें से कइयों (ढेरों) की भ्रष्ट मानसिकता को दूर किया जा सकता है? और अगर ये सभी भ्रष्ट नहीं हैं तो फिर देश से भ्रष्टाचार तो यों ही दूर हो जाएगा। भ्रष्टाचार से तात्पर्य केवल रिश्वत- कमीशन लेना ही नहीं बल्कि देना भी है। अपने काम को जल्द करवाने के लिए नियम विरूद्ध जाना, पैसे देना, बिना सही तथ्यों के पूरा करवाना, आदि आदि भी है।
सवाल मीडिया पर भी उठ रहें है। वह जिस तरह से आंदोलन की कवरेज कर रहा है, ऐसा लगता है पूरा देश, अरबों जनता इसके साथ है। क्या सचमुच ऐसा है? मीडिया बताए कि साथ ही क्या देश दुनिया में और कुछ नहीं हो रहा? क्या अण्णा के आंदोलन की कवरेज सिर्फ उनके लिए टीआरपी का मुद्दा भर है? आज देश भर में अण्णा के आंदोलन से आह्लादित नागरिक शायद यही सोच रहे हैं कि आंदोलन के समर्थन मात्र से भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। शायद अण्णा कोई जादू करने वाले हों। आंदोलन कर सशक्त लोकपाल बना देने भर से ही भ्रष्टाचार नहीं दूर हो सकता, वह तो मजबूत इच्छाशक्ति से ही दूर किया जा सकता है। चाहे वह इच्छाशक्ति सत्ता में बैठे लोगों की हो या विपक्ष की या फिर आम जनता की!
लेखिका लीना ई पत्रिका मीडियामोरचा की संपादक हैं.

