देख लीजिए क्या हालत हो गयी है हिंदुस्तान की
अब चोर भी देने लगे हैं दुहाई संविधान की
रजनीति कैसे बदल देती है कीमत इंसान की
लगाकर मुखोटे रोज नए आ रहे है सामने
मगर कैसे बदले आत्मा जो की है बेईमान की
अंतिम सफर के लिए बस चार काँधे है बहुत
चाहते है कुछ कुर्सी में लेटकर यात्रा करे शमशान की
झूठ का पर्दा कितना भी चढ़ा लो सच्चाई पर
बदलने लगी है रुख हवा जमीं और आसमान की
अब तो वक्त को ही करने दो इस कुश्ती का फैसला
याद रखो जीत हमेशा नहीं होती है पहलवान की
इस कविता को कवि प्रकाश कुकरेती ने लिखा है.

