ऐसा नहीं है कि हर कोई अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन कर रहा है बहुत से लोग उसका विरोध भी कर रहे हैं. मगर विरोध में कोई भी ऐसा तर्क सामने नहीं आ रहा है, जिसका समर्थन वास्तव में किया जाये. यह रहा उन तर्कों का जबाब जो आंदोलन के विरोध में दिए जा रहें हैं- पहली बात कानून बनाने का काम संसद का है और कोई भी उसको चुनौती नहीं दे सकता है:- यह तर्क सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है मगर यह सत्य नहीं है. सबसे पहली बात अगर हम संविधान को पढ़े तो उस में सबसे पहले यही लिखा है कि ‘हम भारत के लोग आज २६ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा में इस संविधान को अंगीकृत पारित एवं स्वयं को समर्पित करते हैं’ इन पंक्तियों से ही स्पष्ट है कि हमारा संविधान हमारे ( भारत की जनता ) द्वारा लिखा गया है. इसमें कहीं यह नहीं लिखा है कि हम भारत के नेता या चुने हुए जनप्रतिनिधि यह संविधान बना रहे हैं. हालाँकि इसमें यह नहीं लिखा है कि जनता ही इसमें संशोधन कर सकती है ( यह अधिकार जनप्रतिनिधियों को दिया गया है. मगर उन्हें भी हम ही चुनते हैं) अतः स्पष्ट है कि जनता सर्वोच्च है न कि जनप्रतिनिधि.
दूसरी बात संसद द्वारा बनाये किसी भी कानून को राष्ट्रपति संसद द्वारा एक बार पारित होने के बाबजूद उसे दुबारा संसद को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं, यही नहीं अगर संसद वही कानून दुबारा पारित कर दे तो राष्ट्रपति को उस पर हस्ताक्षर करने ही पड़ेंगे. मगर उसके बाद उस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है और कोर्ट उस कानून को रद्द भी कर सकता है. इसलिए यह कहना कि संसद सर्वोपरि है सही नहीं होगा. मुख्य बात यह है कि वह कानून जनता के हित में है भी या नहीं. जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए ही पोटा एवं टाडा जैसे कानूनों को रद्द करना पड़ा. क्या हम भूल गए जब सांसदों ने अपनी तनख्वाह बढ़ाई थी तो हमीं ने उनकी आलोचना की थी. (इस हिसाब से तो हमें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए थी) इसलिए यह कहना कि संसद जैसा चाहे वैसा कानून बना सकती है सिर्फ और सिर्फ एक झूठ है और कुछ नहीं.
चूँकि संसद जनहित के कानून बनाने में असफल रही है इसीलिए आज लोकपाल की बात हो रही है. नए भूमि अधिग्रहण कानून कि बात हो रही है. आज बात हो रही है कि ऐसा कानून बने जिस में जनप्रतिनिधि को ५ साल से पहले वापस बुलाया जा सके. इसीलिए आज बात हो रही कि जब चपरासी के लिए भी न्यूनतम योग्यता कि शर्त है तो फिर जनप्रतिनिधियों के लिए कोई योग्यता क्यूँ नहीं है. और आज बात हो रही है की जनप्रतिनिधियों के ऊपर कोई भी कानून लागू क्यूँ नहीं होता है, आज जिन पर दर्जनों मुकदमें हैं वही लोग जनप्रतिनिधि बने हैं क्या इसको बदलने कि जरूरत नहीं हैं?
दूसरा सवाल इस आंदोलन के पीछे आरएसएस है, अमेरिका है और इसका मकसद सरकार को गिरना है- याद कीजिये १९७४ को तब जयप्रकाश नारायण को भी दक्षिणपंथी फासीवादी और अमेरिकन एजेंट कहा गया था. कहा गया क्यूंकि इंदिरा गाँधी अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को पसंद नहीं करती इसीलिए अमेरिका ने जयप्रकाश नारायण को खड़ा किया है. २६ जून १९७५ को इंदिरा गाँधी ने तब कहा था कि मुझे पूरा यकीन है कि आप लोगों को इस बात का एहसास होगा कि जब से मैं ने गरीबों के हित में नीतियां बनानी शुरू की है तब से मेरी सरकार को गिराने के षडयंत्र रचे जा रहे हैं. और उसके बाद आपातकाल लगा दिया गया. जब भी कोई सत्ता को चुनौती देता है, सत्ता साजिश की बात करने लगती है (यह तर्क हम मिस्र, लेबनान, सीरिया से लेकर भारत तक में सुन सकते हैं.). उस वक्त भी कुछ ऐसे ही हालात थे देश भ्रष्टाचार से दुखी था. तब अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि इस सरकार के भ्रष्टाचार को धोने के लिए गंगा का पानी भी कम पड़ जायेगा. आज भी यही हालात है. फर्क इतना है कि अब भ्रष्टाचार हमारी आदत बन गया है. आज भ्रष्टाचार की रकम अरबों-खरबों में पहुँच चुकी है. ( तब यह लाखों और करोड़ों में थी ).
2G से लेकर आदर्श तक घोटाले ही घोटाले हैं, मगर अभी तक सजा किसी को भी नहीं हुई है ( राजा कलमाड़ी आदि अगर जेल में हैं भी तो इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट उनकी जमानत नहीं दे रहा है. वरना वह भी अभी तक जेल से बाहर होते. अभी तो यह भी स्पष्ट नहीं है कि उन्हें सजा मिलेगी भी या नहीं). बोफोर्स में अभी तक सच्चाई सामने नहीं आ पाई है. यही हाल चारा घोटाले से लेकर तहलका. तक और यूरिया घोटाले से लेकर कर्नाटक के खनन घोटाले तक है. इनकी सच्चाई भी कभी सामने भी आ पायेगी कहना मुश्किल है. सजा की बात तो दूर है. और इनसे भ्रष्टाचार की रकम वापस वसूल भी होगी इसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती. बार बार सुप्रीम कोर्ट की फटकार खाने के बाबजूद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट तक को उन लोगों के नाम नहीं बताएं हैं जिनके विदेशी खातों के बारे में जानकारी मिल चुकी है. इसलिए यह कहना कि कभी मौजूदा कानूनों के रहते भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्रवाई हो पायेगी, एक सपना ही होगा. हाँ तो बात जेपी की हो रही थी. बात यहीं खत्म नहीं हुई थी, जयप्रकाश नारायण की जांच के लिए भी एक आयोग बना था, मगर उसकी रिपोर्ट अभी तक सामने नहीं आ पाई है. हालाँकि संसद में १९८४ में सरकार ने कहा था कि जयप्रकाश नारायण पर लगे सारे आरोप गलत थे ( हालाँकि तब तक उनको मरे हुए कई वर्ष बीत गए थे), इसलिए इस आंदोलन को यह कह कर ख़ारिज करना की इसके पीछे आरएसएस, अमेरिका या कोई और ताकत है. एक डरी हुई भ्रष्ट सरकार का भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को बचाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है.
तीसरा सवाल कि जनलोकपाल भ्रष्ट नहीं होगा इसकी क्या गारंटी है – भाई साहब सीधी सी बात है कोई भी आदमी सुप्रीम कोर्ट में जनलोकपाल की शिकायत कर सकता है और उसको हटवा सकता है, अब आप ही बताएं इस से बढ़िया बात क्या हो सकती है और क्या चाहिए ( कोई बता सकता है भ्रष्ट नेता को कैसे हटाया जाये).
चौथा सवाल कि प्रधानमंत्री और न्यायपलिका इसके दायरे में नहीं आने चाहिए :- मेरा भी मानना है कि न्यायपालिका लोकपाल के दायरे में नहीं आनी चाहिए. ( इसके लिए अलग से लिखा जा सकता है), मगर भारत का कोई भी ऐसा कानून नहीं है, जिससे प्रधानमंत्री को बाहर रखा गया हो इसलिए यह कहना कि प्रधानमंत्री इसके दायरे में न आयें गलत होगा. दूसरी बात क्या कोई यह कह सकता है कि अभी तक के हमारे सारे के सारे प्रधानमंत्री देवदूत ही थे. पीवी नरसिम्हा राव पर तो मुकदमा भी चल चुका है. राजीव गाँधी के ऊपर भी बोफोर्स का आरोप लगा था ( जिसकी सच्चाई अभी तक सामने नहीं आ पाई है ). इंदिरा गाँधी को स्वयं न्यायालय चुनावी भ्रष्टाचार के लिए दण्डित कर चुका है ( हालाँकि तब इंदिरा जी ने न्यायालय के आदेश को नहीं माना और आपातकाल लगा दिया था). इसलिए यह कहना कि प्रधानमंत्री इसके दायरे में नहीं आने चाहिए एक धोखा मात्र है. इसलिए आंदोलन में चाहे बेशक भाग न लीजिए मगर इसको ख़ारिज करने के लिए कुतर्क न करिये.
लेखक प्रकाश कुकरेती पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

