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अब वक्‍त है बदलने का : थोड़ा वो बदलें, थोड़ा हम बदलें

मौजूदा दौर में हमारा देश जबरदस्त राजनैतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है. तमाम घोटालों और राजनेताओं की कुत्सित स्वार्थपरता ने लोक का भरोसा तंत्र पर से डिगा दिया है. पहले रामदेव और अब अन्ना हजारे ने देश में रक्तबीज की तरह बढ़ रहे भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए जनांदोलन को हथियार बनाया, मीडिया के कुछ घराने भी ‘आँखे-खोल,भ्रष्टाचार पर हल्ला बोल’ नारे के साथ अन्ना को हर पल कवर करते हुए टीआरपी बटोर रहे हैं. जनता भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना के साथ हैं और राजनेताओं और नौकरशाहों को शाश्वत भ्रष्टाचारी मानकर इन्हें कानून की जंजीरों में जकड़ने पर आमादा है. देश में पहला ऐसा मौका है जब स्वतंत्रता दिवस के दिन भी इतने तिरंगे नहीं लहराए, जितने इसके बाद लहरा रहे हैं.

मौजूदा दौर में हमारा देश जबरदस्त राजनैतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है. तमाम घोटालों और राजनेताओं की कुत्सित स्वार्थपरता ने लोक का भरोसा तंत्र पर से डिगा दिया है. पहले रामदेव और अब अन्ना हजारे ने देश में रक्तबीज की तरह बढ़ रहे भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए जनांदोलन को हथियार बनाया, मीडिया के कुछ घराने भी ‘आँखे-खोल,भ्रष्टाचार पर हल्ला बोल’ नारे के साथ अन्ना को हर पल कवर करते हुए टीआरपी बटोर रहे हैं. जनता भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना के साथ हैं और राजनेताओं और नौकरशाहों को शाश्वत भ्रष्टाचारी मानकर इन्हें कानून की जंजीरों में जकड़ने पर आमादा है. देश में पहला ऐसा मौका है जब स्वतंत्रता दिवस के दिन भी इतने तिरंगे नहीं लहराए, जितने इसके बाद लहरा रहे हैं.

जनता के रोम-रोम से देशभक्ति टपक रही है, लेकिन इस आपा-धापी और शोर-गुल में एक प्रश्न सहसा उठ खड़ा हुआ है कि भ्रष्टाचार क्या है? और कौन है भ्रष्टाचारी? क्या महज़ नेताओं और नौकशाहों को भ्रष्ट मानकर हम इनके लिए कानून बना दें तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा? और वो भ्रष्टाचार जो आज समाज के हर तबके में महामारी के रूप में फ़ैल चुका है उसका क्या? जिस अन्ना हजारे को आज हम देश की निर्वाचित सरकार और संसद से भी ज्यादा विश्वसनीय मान रहे हैं उस ‘किशन बाबूराव हजारे ‘को अन्ना हजारे बनाने में उनके चरित्र बल और ईमानदारी की महती भूमिका रही है. अन्ना हजारे के लिए देश के हर शहर  में तख्तियां और मशाल लिए आक्रोशित भीड़ में से कितने ऐसे कितने हैं,  जिन्होंने कभी-भी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार को प्रश्रय न दिया हो?

हमने अपने बचपन में एक कहानी सुनी थी, एक बच्चे के बेहद गुड़ खाने की आदत को छुड़ाने के लिए उसकी माँ उसे एक संन्यासी के पास ले गयी, सन्यासी ने समस्या सुनने के बाद बच्चे को एक माह बाद आने को कहा. एक माह बाद जब माँ बच्चे को लेकर आयी तो संन्यासी ने बच्चे से महज़ इतना ही कहा कि ‘बेटा, ज्यादा गुड़ खाना अच्छी बात नहीं है, अब मत खाना’. बात का असर हुआ और बच्चे ने गुड़ खाना बंद कर दिया. माँ को आश्चर्य हुआ, उसने संन्यासी से पूछा, ‘सिर्फ चार शब्द बोलने के लिए एक महीने बाद बुलाया, क्यों?’  सन्यासी ने कहा ,’माँ, मैं स्वयं बहुत ज्यादा गुड़ खाता था, इस एक माह में मैंने स्वयं गुड़  का परित्याग किया तब जाकर इस बच्चे से यह बात कहने लायक हुआ हूँ.

कबीर ने भी कहा है- ‘कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंकै आपना, सो चलै हमारे साथ. गुरु गोविन्द सिंह और महात्मा बुद्ध ने भी अपने धर्म के प्रचार और अन्याय के प्रतिकार के लिए समूची भीड़ को ही अपना शिष्य नहीं बना लिया बल्कि उसमे से पांच कर्मठ, तेजस्वी, इमानदार और समर्पित युवकों को ही चुना और और दूर-दूर तक अपनी धर्म-ध्वजा फहराई. गाँधी ने भी पहले व्यक्ति-निर्माण फिर समाज-निर्माण और तत्पश्चात देश-निर्माण की नसीहत दी है. अन्ना भी युवाओं में शुद्ध आचार-विचार, निष्कलंक जीवन और त्याग की भावना के हिमायती हैं. तो क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झांककर देखने की कोशिश की? रोज मर्रा की जिन्दगी में प्रायः हमारा सामना भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से होता रहता है, कितने लोग हैं जो इसे शिष्टाचार मानकर इसके आगे आत्म-समर्पण कर देता हैं, कितने हैं जो इस भ्रष्ट व्यवस्था के स्वयं पोषक हैं और कितने ऐसे भी हैं जो ऐसी परिस्थिति का विरोध न कर पाने के सामर्थ्य का रोना रोते हैं.

आँखों-देखी कहता हूँ, मैंने अन्ना के आन्दोलन का असर अपने शहर में भी देखा और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतरे लोगो को भी. यकीनन, इस में तमाम बुद्धिजीवी और समाज-सेवी दिखे लेकिन एक बड़ी जमात उन लोगों की भी थी,  जिन्हें हम आये दिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे देखते हैं, इस में मिड-डे मिल का राशन डकार जाने वाला सभासद भी दिखा, छात्रों को उनके हाल पर छोड़कर आन्दोलन कर रहे शिक्षक भी दिखे, रिश्वत और भ्रष्टाचार की कमाई से साधन-संपन्न हो चुके रईश भी दिखे, मुव्क्विलों को उनके हाल पर छोड़कर न्यायिक कार्य से विरत अधिवक्ताओं का जत्था भी दिखा,  समाज-सेवा के नाम पर मिलने वाले अनुदानों को डकार जाने वाली संस्थाएं भी दिखी. अब चूँकि ये अन्ना के साथ हैं इसलिए किसकी हिम्मत है कि इन्हें भ्रष्टाचारी कहे? इसलिए हे अन्ना, आपसे ही प्रार्थना है कि देश में जो एक इमानदार माहौल आपने बनाया है उस में लोकतंत्र की इकाई यानि जनता में भी व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार के विरोध का बीज डालें. और हे जनता, आपसे निवेदन है कि भ्रष्टाचार कर महल-अट्टालिकाएं खड़ी करने वालों का सामाजिक बहिष्कार करें न कि उनके दरबारी बनें. क्योंकि, जब तक इस देश में भ्रष्टाचारियों को सम्मान मिलता रहेगा, एक अन्ना नहीं सौ मिलकर भी भ्रष्टाचार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, इसलिए कुछ वे बदलें जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे,  अन्ना के निशाने पर हैं और कुछ वे भी बदलें जो अन्ना के साथ हैं क्योंकि.. अब वक्त है बदलने का.

लेखक यशवीर सिंह पत्रकार हैं. अमर उजाला, सहारा समय, वॉयस ऑफ इंडिया और ईटीवी को अपने सेवाएं देने के बाद स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं.

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