दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां लोकतंत्र की मर्यादा और लोक हक सब कुछ दांव पर लगा है। किसी भी लोकतन्त्र के लिए इस से बुरा किया होगा कि लोक के द्वारा चुनी गई सरकार सर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार में डूबी हो, जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो और विपक्ष सत्ता पाने के दिव्य स्वप्न देखने में व्यस्त रहे। विपक्ष सरकार के जनविरोधी नीतियों पर घेर कर जवाब तलब करने की बजाय सरकार की दुर्दशा का जश्न मना रही है, क्योंकि उनको लगता है कि इसके बाद सत्ता उनके हाथ आने वाली है और परम आनंदित विपक्ष विरोध के नाम पर मीडिया के सामने महज शब्द वीरता दिखा रहा है। एक समय था जब विपक्ष सरकार के घोटाले को उजागर करता था और उसके बाद अखबारों की सुर्खियाँ बनती थी, लेकिन आज विपक्ष का काम मीडिया आरटीआई कार्यकर्ता व समाज सेवी संस्था करती है।
विपक्ष तो भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद मीडिया के सामने आकर अपने शब्द वीर होने का महज परिचय देती है और इस्तीफ़ा इस्तीफ़ा सरकार भ्रष्ट है का नारा रट्टू तोते कि तरह दुहरा कर अपनी जिम्मेदारी पूर्ण कर लेता है। ये सच है के अन्ना देश के निर्वाचित नेता नहीं हैं, यह भी सच है के अन्ना के साथ खड़े आधे से ज्यादा लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, यह भी सच है के जन लोकपाल सभी समस्या का हल नहीं और इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि देश का प्रधानमंत्री व सर्वोच्च न्यालय के न्यायधीश को लोकपाल के दायरे में ले आने से लोकपाल का प्रमुख अपने पद का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता। लेकिन मौजूदा हालत में आखिर कोई दूसरा रास्ता है भी क्या? शायद नहीं, शायद हां या हम सोचना ही नहीं चाहते।
क्या हमने कभी सोचा है कि सरकार या राजनेता, चाहे वह विपक्ष का हो या पक्ष का, क्यों राजनीति को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है। और जब हम पांच साल में इन नेताओं को सत्ता से बाहर कर सकते हैं ऐसे में ये इतने भ्रष्ट कैसे हो गए। शायद नहीं, क्योंकि हम सिर्फ भीड़ का हिस्सा बन कर अपने को ईमानदार लोगों में शुमार करना चाहते हैं, ईमानदार बनना नहीं चाहते। क्या दहेज रिश्वत नहीं, दहेज लेने वाला और देने वाला दोनों जहां तक मैं जानता हूँ न तो सरकार का मंत्री होता है, न ही सरकारी कर्मचारी वह आम जनता होता है। तो दूसरो पे उंगली उठाने से पहले जरा सोचने का दायरा बढ़ा कर सोचे कि कितनी बेटियों को दहेज कि खातिर सजाए मौत मिली? कौन जिम्मेदार है? कानून तो है लेकिन क्या हम मानते हैं? अब यदि कोई ईमानदार आधिकारी कार्रवाई करना भी चाहेगा तो अनशन, प्रभाव, रैली के दम पर तबादला या बर्खास्तगी? इन सब के लिए कौन जिम्मेदार है?
कानून बन जाने से या सत्ता बदल जाने से कुछ नहीं बदलेगा। जब तक व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता। क्योंकि जो सत्ता में हैं या सरकारी अधिकारी है, वे अन्यत्र ग्रह से नहीं आए हैं, वे हम आपके बीच के लोग ही हैं, बस उनका ज़मीर मर चुका है। अहम सवाल है कि जन लोकपाल के दायरे में एनजीओ क्यों नहीं? ‘मैं भ्रष्टाचार खत्म करने के अन्ना के मुहिम में तब तक साथ हूँ जब तक लोकतंत्र की मर्यादा और संसद की गरिमा बरकरार है। क्योंकि लोकतंत्र है तभी हम अपनी आवाज़ उठा रहे हैं नहीं तो तानाशाहों के देश का हाल किसी से छुपा नहीं है।’
लेखक अब्दुल राशिद सिंगरौली के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

