वर्तमान में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा है। अन्ना के इस आंदोलन का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो कहा नहीं जा सकता है, लेकिन इस आंदोलन के कई राजनैतिक अर्थ लगाए जा सकते हैं। अन्ना एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अन्ना ने अपने आंदोलन को किसी भी पार्टी को ध्यान में रखकर शुरू नहीं किया है। यह आंदोलन जितना सत्ताधारी कॉंग्रेस के विरोध में है उतना ही भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों के लिए भी है। वास्तव में यह आंदोलन वर्तमान व्यवस्था के विरोध में है।
जहॉं केन्द्र सहित कईं राज्यों में कॉंग्रेस नीत सरकार है तो कईं राज्यों में भाजपा व अन्य दलों की सरकारें हैं, इसलिए अन्ना का यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन किसी एक दल के लिए नहीं वरन सम्पूर्ण राजनैतिक दलों के विरोध में होता नजर आ रहा है। यही कारण है कि अन्ना ने अपने मंच को किसी भी राजनैतिक पार्टी से साझा नहीं किया है। इसलिए इस आंदोलन की आड़ लेकर अगर भारतीय जनता पार्टी या अन्य दल कॉंग्रेस पर कटाक्ष करें या प्रधानमंत्री से इस्तीफे की बात करें तो इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है और न हीं कॉंग्रेस के किसी ऐसे प्रयास को सही ठहराया जा सकता है, जिस में वह किसी विरोधी दल को इस आंदोलन को जोड़े। हालात यह है कि एनडीए की बैठकें हो रही है, सरकार के मंत्री बैठके कर रहे हैं, यूपीए की बैठक हो सकती है, परन्तु किसी के समझ नहीं आ रहा कि क्या रास्ता निकाला जाए, क्योंकि जो परिस्थतियॉं वर्तमान में बनी है इसकी कल्पना न तो सरकार ने की थी और न ही किसी विपक्षी दल ने। शायद ही किसी ने सोचा हो कि अन्ना हजारे को इतना जनसमर्थन मिल जाएगा। यह पहली बार है कि सूट बूट टाई पहनने वाला या जिन्स व टीशर्ट पहनने वाला भारतीय सड़कों पर उतरा है, इस वर्ग ने झंडा उठाया है, नारे लगा रहा है। इन स्थितियों ने राजनैतिक पार्टियों के दिमाग में यह बात पैदा कर दी है कि जिन लोगों को जोड़ने का प्रयास यह पार्टियां वर्षों से कर रही हैं वह स्वतः कैसे इस आंदोलन से जुड़ गया।
इस आंदोलन ने भारतीय राजनैतिक चिंतकों व राजनेतओं को यह सोचने को मजबूर जरूर किया है कि भारतीय राजनीति अब इस हद तक आ़ चुकी है कि आम आदमी इस राजनैतिक परिस्थितियों से परेशान हो गया है। अगर हम सत्ता की बात करें तो चाहे वह कोई दल हो पिछले 64 सालों में कोई भी समाधान सामने नहीं ला पाया है कि आम जन को यह लगे कि यह लोकतंत्र में जीवन यापन कर रहा है। इसी तरह विपक्ष की बात करें तो आजादी के कुछ दशकों को छोड़ कर भारत में विपक्ष भी काफी कमजोर रहा है। अगर विपक्ष में दम होता तो जो आंदोलन आज अन्ना हजारे ने किया है वह आंदोलन आज भाजपा के हाथों में होता। वास्तव में यह विपक्ष की ही कमजोरी कही जाएगी कि जो मुद्दे और बातें आमजन के हित में विपक्ष को करनी चाहिए थी, वह सिविल सोसायटी द्वारा की जा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह विपक्ष का काम है कि वह सत्ता पर अंकुश रखे और सत्ता रूपी मदमस्त हाथी को नियंत्रित करता रहे और इसलिए हमारे संविधान में अल्पमत को संरक्षण दिया गया है, लेकिन वर्तमान भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य कहा जाएगा कि यहॉं संसद में विपक्ष काफी कमजोर है।
भारतीय जनता पार्टी जहॉं अपने अंदरूनी झगड़ों से ही निपट नहीं पा रही है वहीं लेफ्ट बंगाल के चुनाव की हार से अभी तक उबर नहीं पाया है। तीसरे मार्चे को तो अब इस देश की जनता लगभग नकार ही चुकी है। ऐसी परिस्थिति में मुख्य विपक्षी दल होने के नाते भाजपा पर यह भार ज्यादा है कि वह यूपीए की सरकार पर नियंत्रण रखे और अगर सरकार नियंत्रित न हो तो लोकतांत्रिक तरीकों से आमजन के बीच आंदोलन करें, धरने दे, प्रदर्शन करें। परन्तु पिछली परिस्थितियों पर गौर करें तो पेट्रोल के दाम बढ़े, महॅंगाई बढ़ी, भ्रष्टाचार बढ़ा, इस देश में बड़े बड़े घोटाले हुए लेकिन विपक्षी दल कोई बड़ा कदम न उठा सका सिर्फ अपने अपने व्यक्तव्य जारी कर और छोटे छोटे प्रदर्शन कर अपने दायित्वो की इतिश्री कर ली। आज अगर समय रहते विपक्षी दलों ने सत्ता के विरोध में मोर्चा खोल लिया होता तो अन्ना हजारे के आंदोलन को इतना समर्थन न मिलता।
यहॉं मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि इस देश का आम जन अब कोई विकल्प चाहता है। वह कॉंग्रेस व भाजपा सहित अपने अपने दलों से ऊब गया है, ऐसा लगता है। अगर इस देश को अन्ना हजारे जैसा निष्पक्ष और सही लगने वाला आम आदमी नेतृत्व करने को मिले तो आम आदमी आज उसके साथ होने को तैयार है। अगर ऐसा न होता तो पूरे देश अन्ना के साथ इस तरह सड़कों पर न आता। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार इस देश में आज अचानक ही पैदा हो गया है। समय समय पर सरकारों ने इसके उपाय भी किए हैं लेकिन बड़े बड़े घोटालों व वर्तमान राजनैततिक व सामाजिक परिस्थितियों ने आम जन के मन से इस देश के नेताओं के प्रति विश्वास खत्म कर दिया है। आम जन को इस बार ऐसा लगा है कि वास्तव मे एक व्यक्ति है, जो हमारे बीच से है, जो हमारा है, जो हमारी खुद की आवाज में हमारी भाषा में बात करता है और बस यही एक कारण है कि लोगों को अन्ना पर विश्वास हो गया कि यह आदमी हमारा नेता बनने के लायक है और लोग हो लिए साथ। ऐसी स्थितियों में सारे राजनैतिक दलों को अपनी अपनी स्थितियों पर पुनः सोचना चाहिए और उन्हें आमजन के बीच जाना चाहिए उनकी भाषा और स्थितियों को समझना चाहिए।
आने वाले आम चुनावों पर इस आंदोलन का काफी असर होगा ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं। वर्तमान में ऐसा लग रहा है कि इस आंदोलन से कॉंग्रेस को काफी नुकसान होगा परन्तु यह भी सत्य है भाजपा सहित कोई भी विपक्षी दल इस आंदोलन का फायदा नहीं उठा पाएगा। ऐसी स्थिति में अन्ना हजारे व इनकी टीम की यह जिम्मेदारी है कि वह आमजन के बीच जाए क्योंकि इस देश का आमजन अन्ना की तरफ मुंह किए खड़ा है कि शायद कोई रास्ता बता दें। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर वहीं दल है, वही जन हैं, वही सत्ता और वही विपक्ष है, बस इतना हो सकता है कि बैठने के स्थान बदल जाए।
लेखक श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’ पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

