भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है। इसीलिए तो हमारे राजनेता भ्रष्टाचार से बच निकलने में ही भलाई समझते हैं और पिछले 64 साल से इससे बचते ही नहीं चले आ रहे हैं बल्कि उससे दोस्ती का रिश्ता बनाकर उसे फलने और खुद के फूलने का मौका निकालते रहे हैं। दोनों में कितना भाईचारा। इस के सूत्र से बंधकर सब-के-सब मौसेरे भाई। आखिर भ्रष्टाचार का विरोध किस मुंह से करें। पूरे चौसठ साल की पक्की दोस्ती। अभी-अभी एक अंग्रजीदां बबुआ ने तो पूरे बारह दिन लगाए भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने और मुंह खोलने में। रोज़ रियाज़ करके भी बेचारे अपना पाठ जब याद नहीं कर पाए तो जिसने लिखा था उसीके पन्ने को उठाकर पढ़ गए। क्या पढ़ा इसका उन्हें तो क्या पूरे देश को कोई मतलब समझ में नहीं आया। हां इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को पढ़ते-पढ़ते कहीं बबुआ चक्कर ना खा जाएं इसलिए मदद के लिए उनके बलसखाओं की मंडली-तो- मंडली खुद बहनिया भी मोर्चे पर तैनात रहीं।
बारह दिन भूखे रहकर भ्रष्टाचार को धोबी पछाड़ दांव से औंधा कर अन्ना खुद तो अस्पताल चले गए मगर अपनी नर्सरी पोयम पढ़कर अंग्रेजी बाबा कहां चले गए और किस हालत में हैं, किसी को कुछ नहीं पता। भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है। अन्नाजी को ऐसा जुलम कतई नहीं करना चाहिए था। खुद का क्या। न आगे नाथ ना पीछे पगहा। कब्र में पैर लटकाने के बजाय रामलीला मैदान में आकर लेट गए। मगर अंग्रेजी बाबा को तो अभी बड़ी गद्दी पर बैठना है। अगर अभी से ही भ्रष्टाचार से पंगा ले लिया तो फिर तो पहुंच गए अपने टारगेट पर। क्या जरूरत थी, उससे पंगा लेने की। लालूप्रसादजी यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलेते हैं तो यह उन्हें शोभा देता है। जेपी के आंदोलन से निकले हैं। तपे हुए आंदोलनकारी हैं। उनके बोलने से संसद की गरिमा बढ़ती है। मगर अंग्रेजी बाबा के बोलने से न तो संसद की सेहत पर फर्क पड़ता है और न भ्रष्टाचार की सेहत पर। अलबत्ता खुद की सेहत खराब हो जाने का जोखिम और बढ़ जाता है। क्या जरूरत थी जान पर खेलने की। मम्मी की तबीयत पहले से ही खराब चल रही है। आगे देश भी चलाना है। इत्ता लड़कपन ठीक नहीं। क्या पड़ी थी भ्रष्टाचार-जैसे टिटपुंजिया मुद्दे पर बोलने की।
मालूम है कि भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है। इत्ते सारे ईमानदार लोग एक साथ बोल रहे थे अगर एक नहीं बोलता तो क्या फर्क पड़ जाता। बस, यही तो बाल हठ है- कि सब लोकपाल-लोकपाल खेल रहे हैं। तो हम भी खेलेंगे। बालहठ से कौन उलझे। बालक की जिद को सीरियसली लेते हुए उन्हें सबसे पहले बोलने का मौका दिया गया कि पहले अंग्रेजी बाबा बोल लें फिर सब बड़े लोग बोलेंगे। शून्यकाल में अपना अर्थशून्य आयटम पेश कर के बाबा खुश हो गए। वो खुश हुए तो उनकी मित्रमंडली भी खुश हुई। भाषण सुनकर बारह दिन के भूखे अन्ना के चेहरे पर भी हंसी आ गई। संसद में अंग्रेजी बाबा का और रामलीला मौदान में घूंघट काढ़कर किरण बेदी आंटी का दोनों के ही आयटम को जनता ने खूब पसंद किया। लोग खूब हंसे। सभी को हंसता देखकर भ्रष्टाचार से लड़ने में कमजोरी बहुत आ जाती है, को भी हंसी आ गई। बोफोर्सवंशी, हवालाकांडी, चाराकांड के चतुर सुजान और संसद में नोट देकर सरकार बचानेवाले सभी श्रेष्ठ आर्यजनों ने अन्ना की तमन्ना को ध्वनिमत से धन्य करते हुए लोकतंत्र की कितबिया में इतिहास का एक और फूल रख दिया सूख जाने के लिए।
चुनाव की आंधी में इस फूल की पंखुरियां कितनी दूर तक जाएंगी यह अन्ना और अन्ना की चौकन्ना टीम ही जाने। मगर अन्ना को इतना जरूर ध्यान रखना होगा कि अनशन और सत्याग्रह-जैसी ओछी हरकतें करके आइंदा यदि संसद की एक इंच गरिमा भी उन्होंने कम करने की हरकत की तो कसम लालू की कि उन्हें कतई माफ नहीं किया जाएगा। क्योंकि संसद संसद है कोई भेड़ बकरी जनता नहीं। जनता को क्या हक है कि वो जनसेवकों के काम में दखल दे।
व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

