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जले बिना रोशनी कहां

कुछ आत्मकेन्द्रित शुद्धतावादी लोग यद्यपि खुद गलत काम करने से बचते हैं लेकिन वे किसी भी गलत काम का तब तक विरोध नहीं करते जब तक वे स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। देखते हैं, महसूस भी करते हैं कि अन्याय हो रहा है, दमन हो रहा है, हक मारा जा रहा है, लेकिन उनका नहीं, इसलिए बोलने की क्या जरूरत है, ऐतराज करने की क्या आवश्यकता है। ऐसे लोग चाहे जितने सच्चे हों, जितने नैतिक हो, जितने ईमानदार हों, पर स्वार्थी होते हैं, अपने लिए जीते हैं। कुछ लोग हर ऐसी घटना में उत्पीड़क ताकतों के साथ खड़े होकर लाभ  में हिस्सा बंटाने की जुगत में जुट जाते हैं। वे उतने ही बड़े धूर्त, वंचक और अपराधी होते हैं, जितना दमनकारी या अन्यायी स्वयं। वे समाज के दुश्मन होते हैं। कुछ लोग भयवश तटस्थ या चुप रहने में ही अपना भला समझते हैं। वे कायर, डरपोक या मरे हुए लोग होते हैं। वे जब स्वयं ऐसे किसी संकट में पड़ते हैं तो मिमियाने, घिघियाने या रेंगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाते। ऐसे कीड़े-मकोड़े बड़ी संख्या में हमारे चारों ओर मिल जायेंगे।

कुछ आत्मकेन्द्रित शुद्धतावादी लोग यद्यपि खुद गलत काम करने से बचते हैं लेकिन वे किसी भी गलत काम का तब तक विरोध नहीं करते जब तक वे स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। देखते हैं, महसूस भी करते हैं कि अन्याय हो रहा है, दमन हो रहा है, हक मारा जा रहा है, लेकिन उनका नहीं, इसलिए बोलने की क्या जरूरत है, ऐतराज करने की क्या आवश्यकता है। ऐसे लोग चाहे जितने सच्चे हों, जितने नैतिक हो, जितने ईमानदार हों, पर स्वार्थी होते हैं, अपने लिए जीते हैं। कुछ लोग हर ऐसी घटना में उत्पीड़क ताकतों के साथ खड़े होकर लाभ  में हिस्सा बंटाने की जुगत में जुट जाते हैं। वे उतने ही बड़े धूर्त, वंचक और अपराधी होते हैं, जितना दमनकारी या अन्यायी स्वयं। वे समाज के दुश्मन होते हैं। कुछ लोग भयवश तटस्थ या चुप रहने में ही अपना भला समझते हैं। वे कायर, डरपोक या मरे हुए लोग होते हैं। वे जब स्वयं ऐसे किसी संकट में पड़ते हैं तो मिमियाने, घिघियाने या रेंगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाते। ऐसे कीड़े-मकोड़े बड़ी संख्या में हमारे चारों ओर मिल जायेंगे।

गिने-चुने लोग होते हैं, जो लड़ते हैं। हर समय में, हर समाज में, हर देश और काल में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो कोई भी पीड़ित हो, किसी के साथ भी  अन्याय हो रहा हो, बाहर निकल आते हैं, सड़क पर उतर आते हैं, दो-दो हाथ करने। सिर्फ उन्हें ही मनुष्य के रूप में पहचाना जाना चाहिए। उन्हें हार-जीत की परवाह नहीं होती, उन्हें कभी भय नहीं व्यापता। वे सिर्फ अपने लिए नहीं जीते। वे दूसरों के लिए जीते हैं, सबके लिए जीते हैं। उन्हें कोई जीत लुभाती नहीं, न ही कोई हार निराश करती है।

कोई अकेली जीत, समाज की सारी पीड़ाओं का अंत नहीं कर सकती। इसलिए ऐसे लोगों के पास जश्न मनाने के लिए वक्त नहीं होता। जिनकी आंखें हमेशा खुली होती हैं, जो सचमुच जगे हुए लोग होते हैं, जिनका जीवन जागरण का एक छंद भर होता है,  उन्हीं के हाथों में मनुष्यता का ध्वज होता है। यह जानते हुए भी कि हर दुख पर  विजय पाना मुश्किल है, हर पीड़ा को मुक्ति का स्वर दे पाना संभव नहीं है, जो लोग हर चेहरे को मुस्कान की धूप से सराबोर कर देने के संकल्प पर निछावर है, उनके लिए हर हार जीत का जूनून बन जाती है। लड़ाई के मैदान में जितनी संभावना जीत की होती है, उतनी ही हार की भी। मनुष्य के लिए सारा जीवन ही  एक प्रशस्त रणभूमि है, हर पल युद्ध है। केवल संग्राम ही जीवन हो तो क्या हार और क्या जीत। जिस समाज में ऐसे लोगों की कमी हो जाती है, वह अधोगति की ओर सरकने लगता है, मौकापरस्त और भ्रष्ट हो जाता है। जिस समाज में पैसा जीवन से ज्यादा मूल्यवान हो जाता है, वहां एक दूसरे पर विश्वास की कमी होने लगती है, शंकाएं रास्ते रोक कर खड़ी हो जाती हैं और धोखा, पाखंड, छल-प्रपंच, षड्यंत्र बढ़ने लगता है। मनुष्य हाशिये पर ढकेल दिया जाता है और अमानवीय तथा क्रूर ताकतें मंच पर आ खड़ी होती हैं।

जब-जब ऐसी परिस्थिति बनती है, हाशिये से ही कोई तूफान उठता है, कोई भी एक अदना आदमी अपनी पूरी हिम्मत के साथ केन्द्र की ओर बढ़ता है और फिर स्वार्थी, कायर आततायियों की भीड़ को उनका अपना भय ही चीर डालता है। प्रकृति की व्यवस्था भी द्वंद्वात्मक है। कभी ऐसा नहीं हुआ कि धरती पर केवल राक्षस रह गये हों या सब के सब बुद्धत्व को प्राप्त हो गये हों। कभी-कभार खतरनाक असंतुलन जरूर पैदा हो जाता है लेकिन वह भी देर तक नहीं रहता। प्रकृति सर्वशक्तिसंपन्न है लेकिन उसने सबको अपनी शक्ति और मेधा के अंश से संपन्न बनाया है। उसकी यह अपेक्षा भी रहती है कि हम हमेशा हर जरूरत के लिए मां से याचना न करें, अपनी मेधा का, अपनी शक्ति का भी  इस्तेमाल करें। एक सकारात्मक, सभ्य  और संस्कारित समाज की रचना में, मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने की लड़ाई में जो अपनी मेधा का जितना अधिक  इस्तेमाल करता है, प्रकृति उसे उतना ही ताकतवर बनाने का उपक्रम करती है। इसी तरह की घटनाएं किसी सिद्धार्थ को बुद्ध बनाती हैं, किसी नरेंद्र को विवेकानंद और किसी मोहनदास को महात्मा गांधी। इन्ही परिस्थितियों में कोई अदना सा सिपाही अन्ना हजारे बन जाता है।

व्यक्ति का संकल्प ही उसे रचता है, यह संकल्प उसे उसके संस्कार और सामाजिक परिस्थितियों से मिलता है, कई बार किसी बड़ी दुर्घटना या भीतर तक हिला कर रख देने वाले किसी त्रासद अनुभव के दबाव से। समकालीन समय और समाज को ऐसे लोगों की बहुत जरूरत है। ऐसे लोग ही मनुष्य को जिंदा रख सकते हैं, इन्हें ही समय नायक की तरह देखता है, यही इतिहास रचते हैं। बदलाव की आकांक्षा से लैस जनाकुलता के अलावा उत्पीड़न और जुल्म की पराकाष्ठा से उपजा आक्रोश उनका हथियार बनता है। अगर आप मनुष्य और मनुष्यता के पक्षधर हैं, अगर आप समता और समरसता के पक्षधर हैं तो आप की भी  जिम्मेदारी बनती है कि दीप न बन सकें तो भी तेल की तरह जलने को तो तैयार रहें।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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