भ्रष्ट सरकार की जड़ों में मट्ठा भरने वाले और उसे आकाश से रसातल में लाने वाले अन्ना हजारे एक पखवाड़े तक अख़बारों और चैनलों की ‘हेडिंग’ बने रहे. अन्ना रोज अख़बारों के कई-कई पन्ने देशभक्ति के रंग में रंगवाते और चैनलों पर घंटों जनतंत्र की शक्ति दिखाते दिखे. पुंछ से कन्याकुमारी और तिनसुकिया (असम) से पोरबंदर तक सभी प्रमुख शहरों में लगी ‘अन्नामयीं होर्डिंगें’ युवाओं में जोशोखरोश पैदा करती रहीं. तो पानी को मम बोलने वाले बच्चे से लेकर बोलने को तरसने वाले बुजुर्ग तक की जुबान पर ‘अन्ना हजारे’ और सिर पर ‘मैं अन्ना हूँ’ की टोपी छाई रही. पूरे देश में लाखों मोमबत्तियों ने देशहित में क़ुरबानी दी. वहीं दक्षिणपंथियों, चरमपंथियों और सेकुलरों ने सुर में सुर मिलाये.
लेकिन जनलोक बिल पर सरकार के झुकते ही अन्ना अख़बारों की ‘हेडिंग’ से लुढ़क कर आम ख़बरों में सिमट गए. अन्ना हजारे की जगह रोजमर्रा की बड़ी ख़बरों ने ले ली. २४ घंटे अन्ना को देश का दूसरा गाँधी बताने वाले चैनल भी हजारे को छोड़कर ‘भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र’ की कहानियों पर लौट आये हैं. फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर जहाँ अन्ना के आंदोलन से रिलेटेड मैटर या फोटो ही लेटेस्ट अपडेट माना जाता था, वह अब दुबारा ‘चाय की चुस्कियां लेने की बातें’ लिखी जाने लगी हैं. मोबाइल से रैलियों और जुलूसों की सूचना देने वाले फिर से प्यार-मुहब्बत के मैसेज भेजने में जुट गए हैं.
जनलोक बिल लागू होने तक अन्ना के आंदोलन में पूरा समर्थन और सहयोग देने की बात करने वाले संस्थानों, संस्थाओं और संगठनों ने भी अन्ना के बैनर छोड़कर अपने संघ व एसोसिएशन के झंडे उठा लिए हैं. शिक्षकों, व्यापारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के मुंह से ‘अन्ना तुम संघर्ष करो, हम…’ के बजाय ‘हमारी मांगे पूरी करों’ के नारे निकल रहे हैं. शहरों के मुख्य मार्गों से लेकर गली-कूचों में लगी होर्डिंगों में अन्ना हजारे की जगह खूबसूरत लड़कियों ने ले ली. ‘भ्रष्टाचार मिटाओ, देश बचाओ’ के पर्चे बाँटने वाले कंपनियों की प्रचार सामग्री बाँट रहे हैं.
सांस से ज्यादा अन्ना का नाम लेने वाले नाजुक होंठों पर सब्जियों और कपड़ों में ‘छूट’ पाने के लिए झिकझिक दिखने लगी है. मैं अन्ना हूँ की टोपी पहनकर खुद को अन्ना बताने वाले ‘हजारों अन्ना’ भी अपनी रोजमर्रा की समस्याओं में ऐसे घुल मिल गए हैं जैसे दूध में पानी. जो शहरी युवा तिरंगा हाथों में लिए मोटरसाइकलों पर फर्राटा भर रहे थे, वो अब ‘बॉडीगार्ड’ का टिकट लेने के लाइनों में जूझ रहे हैं. जिन मुंहों से ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे निकल रहे थे, उनसे अब अंग्रेजी गानों की धुनें बरस रही हैं. जो गांववाले सरकारी लोकपाल की बातें करते नहीं थकते थे वे अब दुबारा ‘लेखपाल’ की बातें कर रहे हैं. मां-बाप की ट्रेनिंग पर अन्ना के नाम के हुंकारे भरने वाले बच्चे खेल कूद में व्यस्त हैं.
लेखक अम्बुज श्याम कुमार पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

