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अन्‍ना का आंदोलन : मकसद, मसीहा और जन का मिथक (एक)

मेरे कई मित्रों और परिचितों के सन्देश इस बीच मुझे मिले हैं जो इस बात से असहज महसूस कर रहें हैं कि मैंने और मेरे जैसे कई लोगों ने न केवल अन्ना हजारे के आन्दोलन से दूरी बनाये रखी, उसका समर्थन नहीं किया बल्कि उसका वैचारिक स्तर पर विरोध भी किया.. 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आन्दोलन के दिनों में भी हमारे आरक्षण का समर्थन करने पर ढेरों मित्र हैरान होते थे और उन में से अनेकों तो हमारे दुश्मन बन गए थे.. उन्हें इस बात से भारी परेशानी होती थी कि एक ऐसा छोटा सा समूह जिन में अधिकांश आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते, आरक्षण के पक्ष में दलीलें कैसे दे सकता है.. हमारे असहज मित्रों की दृष्टि में अन्ना के आन्दोलन के कई मायने हैं.. अन्ना का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है और उनके सुझाये जन लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह ख़तम न भी हुआ तो जैसा अन्ना का कहना है कि इस से भ्रष्टाचार में 90% कमी आ जाएगी..

मेरे कई मित्रों और परिचितों के सन्देश इस बीच मुझे मिले हैं जो इस बात से असहज महसूस कर रहें हैं कि मैंने और मेरे जैसे कई लोगों ने न केवल अन्ना हजारे के आन्दोलन से दूरी बनाये रखी, उसका समर्थन नहीं किया बल्कि उसका वैचारिक स्तर पर विरोध भी किया.. 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद आरक्षण विरोधी आन्दोलन के दिनों में भी हमारे आरक्षण का समर्थन करने पर ढेरों मित्र हैरान होते थे और उन में से अनेकों तो हमारे दुश्मन बन गए थे.. उन्हें इस बात से भारी परेशानी होती थी कि एक ऐसा छोटा सा समूह जिन में अधिकांश आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते, आरक्षण के पक्ष में दलीलें कैसे दे सकता है.. हमारे असहज मित्रों की दृष्टि में अन्ना के आन्दोलन के कई मायने हैं.. अन्ना का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ है और उनके सुझाये जन लोकपाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह ख़तम न भी हुआ तो जैसा अन्ना का कहना है कि इस से भ्रष्टाचार में 90% कमी आ जाएगी..

कई दूसरे मित्र जिन्हें इस बात में संशय है वे मानते हैं कि यह सरकार और संसद कि संप्रभुता के बर-अक्स लोक की, जन की संप्रभुता की पुनर्स्थापना का उत्सव है.. दूसरे शब्दों में यह नीति निर्धारण और विधायन की प्रक्रिया में जन भावनाओं को सम्मिलित किये जाने की आकांक्षा का प्रस्फुटन है.. कई लोग इसे लोगों द्वारा उठाई गयी जनप्रतिनिधियों से जनता के प्रति जवाबदेही की मांग के रूप में ले रहे हैं.. पर इनके अलावा बड़ी तादात में ऐसे लोग हैं जो पिछले 6-8 माह में सावधानी पूर्वक गढ़े गए अन्ना के आभामंडल और एक के बाद एक सामने आये घोटालों के सम्मिलित प्रभाव में इस परिघटना को सर्वकालिक निदान के रूप में ले रहें हैं.. इन्ही मिली जुली भावनाओं के साथ अन्ना हजारे के आन्दोलन की तुलना स्वाधीनता संघर्ष से करते हुए कुछ अति उत्साही महानुभावों ने इसे आजादी की दूसरी लड़ाई ही घोषित कर दिया है और कुछ अन्य इसे तहरीर स्क्वायर का भारतीय संस्करण मान रहे हैं..

मकसद : अन्ना के आन्दोलन का घोषित लक्ष्य भ्रष्टाचार की समाप्ति है.. यह लक्ष्य कुछ उसी तरह अस्पष्ट और सामान्य है जैसे चोरी को समाप्त करने का लक्ष्य या कभी झूठ न बोलने का लक्ष्य..और इसी गुण की वजह से इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता.. अगर घोषणाओं को ही मंशा का प्रतिबिम्ब मान लिया जाय तो राजनेताओं और नौकरशाही समेत कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध न हो..जाहिर है कि घोषित लक्ष्य की गंभीरता की पड़ताल के लिए लक्ष्य प्राप्ति हेतु सुझाये गए तंत्र की संभाव्यता और लक्ष्य से उसकी तार्किक सम्बद्धता की छानबीन करनी होगी.. ठीक इसी बिंदु पर टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल ड्राफ्ट पर चर्चा ज़रूरी हो जाती है जिस पर अब तक बहुत कुछ कहा सुना जा चुका है.. इनमे सबसे पहले शुरुआती ड्राफ्ट में लोकपाल हेतु प्रस्तावित सेलेक्सन कमिटी पर विचार किया जाना चाहिए जिसमें अब यद्यपि टीम अन्ना द्वारा वापस लेकर सुधार कर लिया गया है फिर भी यह प्रस्ताव उनकी छिपी आकांक्षाओं पर थोड़ा बहुत प्रकाश डाल सकता है.. शुरुआती प्रस्ताव के अनुसार जहाँ इस कमिटी में मात्र एक चुना हुआ प्रतिनिधि रखा जाना था वहीँ नोबेल और मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त लोगों की संख्या चार होनी थी.. इसी तरह उच्चतम न्यायालय सहित पूरी न्यायपालिका को लोकपाल के क्षेत्राधिकार में लाने का मामला था.. चूंकि ये अब प्रस्ताव में से हटा लिया गए हैं सो संदेह का लाभ देते हुए माना जा सकता है कि ये प्रावधान टीम अन्ना ने मोल भाव के लिए ही रखे थे..

लेकिन उन तीन प्रावधानों पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है जिन्हें अन्ना ने आखिर तक नहीं छोड़ा और जिन पर ढीला ढाला ही सही एक प्रस्ताव संसद द्वारा पास किये जाने के बाद ही उन्होंने अनशन तोड़ा.. इनमे सबसे महत्वपूर्ण निचले स्तर तक की नौकरशाही को लोकपाल के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत लाने का मामला है.. प्रथम श्रेणी के अधिकारियों समेत सारे जनप्रतिनिधियों और राजनैतिक कार्यपालकों को लोकपाल के दायरे में लाने से शायद ही किसी को ऐतराज हो और कमोबेश सभी प्रस्तावों में उन्हें लोकपाल के दायरे में रखा भी गया था.. इनकी संख्या 60,000 के आसपास है..पर जैसे ही निचले स्तर के कर्मचारियों को इन में शामिल किया जाता है यह संख्या 2.5 करोड़ के आस पास पहुँच जाती है..एक आकलन के अनुसार इन पर नियंत्रण रखने के लिए 50,000 से अधिक कार्मिकों की एक नौकरशाही लोकपाल के अधीन बनानी पड़ेगी.. अगर प्रस्तावित लोकपाल की चयन समिति 9 या 11 सदस्यों वाला एक बेदाग़, सत्ता-धन किसी भी लालसा से मुक्त और सन्यासत्व के भाव से युक्त एक अलौकिक लोकपाल चुनने में सफल भी हो जाय तो भी इस भारी भरकम नौकरशाही को ईमानदार बनाने का उसके पास क्या नुस्खा होगा?? लोकपाल के इन्स्पेक्टर्स, विवेचक, अभियोक्ता, सम्प्रेक्षक, लिपिक, अफसर, कर्मचारी बनाने के लिए फ़रिश्ते कहाँ से लाये जायेंगे? एक क्षण के लिए मान लें कि अलौकिक लोकपाल अपनी नौकरशाही पर ऐसा नियंत्रण स्थापित कर लेगा जिस से उन में किसी को भ्रष्ट होने की हिम्मत नहीं पड़ेगी..पर यही तर्क बाकी नौकरशाही पर भी लागू करें तो प्रथम श्रेणी के अफसरों को ईमानदार बना लेने से ही पूरे सरकारी तंत्र पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा.. सुनते हैं कि सत्ता भ्रष्ट करती है और परम सत्ता परम भ्रष्ट.. इस लिहाज़ से नगण्य जवाबदेही और अत्यधिक सत्ता संपन्न लोकपाल परम भ्रष्टाचार का रास्ता ही खोलेगा..

दूसरा मुद्दा केंद्र से लेकर राज्य तक को लोकपाल के अधीन लाने को लेकर था, जिसे सुधार कर अब एक ही कानून के जरिये केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की बात की जा रही है…इस तरह की व्यवस्था के उदाहरण चुनाव आयोग और सीएजी के संगठन में ढूंढे जा सकते हैं.. पर ये दोनों संगठन संवैधानिक प्रावधानों में निहित व्यवस्था की देन हैं और राज्य का कोई स्वतंत्र पाया न होकर विधायिका के प्रति जवाबदेह हैं.. टीम अन्ना की कल्पना का लोकपाल विधायिका के प्रति जवाबदेह तो कतई नहीं होने वाला है.. न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति से लोकपाल की तुलना ही नहीं है और अन्ना की सिविल सोसायटी जिस तरह से न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से चिंतित दिखती है वैसे में उसे इस बात का ज़रा भी इल्हाम नहीं होता कि उनका लोकपाल उससे भी ज्यादा भ्रष्ट हो सकता है.. अन्ना विकेंद्रीकरण और ग्राम स्वराज की बात करते हैं परन्तु उनकी टीम को यह सुझाव देते समय बिलकुल याद नहीं रहता की संघीय ढाँचे के अंतर्गत राज्यों को भी थोड़ी ही सही, एक स्वायत्तता हासिल है जिसे उनका प्रस्ताव एक केंद्रीकृत नौकरशाही के जरिये कम ही करेगा.. कल्पना करें कि अन्ना के आदर्श गाँव के चुने हुए मुखिया को लोकपाल की नौकरशाही का जिले या ब्लाक स्तर का एक अदना सा मुलाजिम जूते की नोंक पर रखे.. तो क्या हम यह मान लें कि गाँव की बातें और विकेंद्रीकरण का जाप महज़ एक दिखावा है..

तीसरा मुद्दा शिकायतों के निराकरण से जुड़ा है, जिसके लिए अलग से केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर व्यवस्था करने की ज़रुरत है.. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने दो दिन पहले याद दिलाया था कि उनके प्रदेश में नागरिक चार्टर की व्यवस्था पहले से लागू है.. अब उस व्यवस्था का परिणाम भी लोगों के सामने है.. जाहिर है कि उसमे सुधार की भारी ज़रुरत है लेकिन इस बहाने से राज्यों और उनके साथ साथ पंचायतों की नाम के लिए मिली हुयी स्वायत्तता को छीन लेने का उपक्रम इतना अबोध भी नहीं हो सकता..

क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि अन्ना और उनकी टीम को इन बातों का ज़रा भी अहसास नहीं है और भ्रष्टाचार समाप्त करने की अपनी सदिच्छा से प्रेरित होकर पिछले कई महीनों से वे बालहठ का प्रदर्शन करते चले आ रहे हैं.. अन्ना को संदेह का लाभ दिया जा सकता है लेकिन उनकी टीम के अति विद्वान सदस्यों के बारे में भी क्या ऐसी धारणा बनायीं जा सकती है.. यही हमारे सामने यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है.. टीम अन्ना इतनी भोली नहीं हो सकती कि उसे इस बात में ज़रा भी शंका न हो कि जिस ढांचे को स्थापित करने के लिए वे इतनी हाय तौबा मचा रहे हैं उसका परिणाम उल्टा भी आ सकता है.. फिर इस आन्दोलन के पीछे क्या पवित्र मकसद हो सकता है?? इस बात की जानकारी हासिल करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है और इसके लिए हमें इस आन्दोलन की संचालक शक्तियों, इसमें शामिल तत्वों और इसके संभावित लाभार्थियों के चरित्र और उनके अपने हितों-कामनाओं की पड़ताल करनी पड़ेगी..

यह आम जानकारी है कि बीस साल पहले आर्थिक सुधारों के नाम पर उदारीकरण और बाजारवाद की जो मुहिम चलाई गयी थी उसके सूत्रधार हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री ही थे.. राज्य की भूमिका को कम करते हुए बाज़ार और निजी क्षेत्र का फैलाव उसका मुख्य लक्षण है.. बाज़ार की प्रतिस्पर्धी दक्षता की लाख तारीफ की जाय पर उस में और जंगल में मामूली फर्क ही होता है.. जंगल में अगर ताकत ही सच्चाई है, जिसकी लाठी उसकी भैंस ही अंतिम सत्य है तो बाज़ार में धन ही असली शक्ति है.. लेकिन सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित एक लोकतान्त्रिक राज्य दिखावे के लिए ही सही अपने नागरिकों के साथ बराबरी का बर्ताव करने के लिए बाध्य होता है.. और अगर यह राज्य पक्षधरता को अपनी नीति बनाता है तो उसे आर्थिक-सामाजिक रूप से दुर्बल का ही पक्ष लेना पड़ता है.. इसमें लाख खामियां हो सकती हैं.. कोई एस्कॉर्ट्स या मेदान्ता जैसा निजी अस्पताल कितना भी दक्ष और अच्छा क्यों न हो, वह घटिया से घटिया और भ्रष्ट से भ्रष्ट सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के फर्श पर बैठ कर अपनी बारी का इन्तजार कर रहे मरीज के लिए किसी काम का नहीं..

और ठीक यही तथ्य राज्य की भूमिका को सिकोड़ने की प्रभु वर्गीय कोशिशों के लिए एक मुसीबत बनकर खड़ा हो जाता है.. आर्थिक शब्दावलियाँ कुछ भी हो सकती हैं..चाहे राजकोषीय घाटे को कम करने की वकालत की जाय, सब्सिडी के बढ़ते बोझ का रोना रोया जाय, बाज़ार में तरलता के प्रवाह को कम करने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती की बात की जाय या भुगतान असंतुलन को दूर करने के लिए निर्यातोन्मुख ज़ोन बनाने का तर्क गढ़ा जाय, सारी बातें राज्य की भूमिका को कमतर करते जाने और बाज़ार के सर्वग्रासी बन जाने की ही तरफदार हैं..पर जब लोकतान्त्रिक राज्य अपने नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया करने की अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से कदम खींचेगा तो जनता के बहुसंख्यक हिस्सों के गुस्से का खामियाजा उसे भुगतना ही पड़ेगा.. राज्य द्वारा छोड़ी गयी जिम्मेदारियों को पूरा करने का दिखावा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोषों और दानदाताओं का नुस्खा गैर-सरकारी संगठनों को उस खाली जगह में फिट कर देने का है.. मुनाफे वाली जमीन के लिए तो कार्पोरेसंस पहले से ही तैयार बैठे हैं.. जरा गौर कीजिये, करोड़ों बच्चों को प्राथमिक स्कूल और अध्यापक उपलब्ध करने की बजाय विश्व बैंक के पैसे से सर्व सिक्षा अभियान चलाया जाता है.. गरीब गुरबे फ़िक्र न करें, सरकार नहीं तो एनजीओ तो हैं ही सारी दिक्कतों को दूर करने के लिए..

उदारीकरण हो सके इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार पर्याप्त रूप से बदनाम हो जाय.. पिछले बीस सालों में सरकारी उपक्रमों-विभागों को एक एक कर बदनाम किया गया.. बी एस एन एल पिछड़ रहा है तो इसलिए नहीं कि वह अक्षम है.. उसके लिए उपकरण खरीदने से लेकर 3जी सेवाएँ शुरू करने तक जो खेल खेला गया, अब बहुतों की जानकारी में है.. फिर भी मोबाइल सेवा आज इस देश में इतनी सस्ती है तो उसका श्रेय इसी उपक्रम को जाता है.. सरकारी उपक्रमों को बदनाम करने के दौर से अब देश आगे आ गया है.. अब पूरे राज्य को ही बदनाम कर दिया जाय.. उसका रास्ता राजनीतिज्ञों और उनके बाद सरकार फिर संसद को बदनाम करने से निकलता है.. इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे राजनेताओं में से बहुतायत ने खुद ही इसका इंतजाम कर दिया है.. बाजारवादी कट्टरपंथियों और सिविल सोसाइटी के नाम पर इकठ्ठा हुए बिचौलियों के लिए इससे बढ़िया मौका और क्या हो सकता है.. आखिर सरकार और राज्य एक मजबूरी है जिसके गठन में सैद्धांतिक तौर पर ही सही हर आदमी की बराबर की भागीदारी है.. कम्पनियाँ, निगम और शेयर बाज़ार तो शेयर (धन) के आधार पर चलते हैं.. कितना अच्छा होता कि अर्थशास्त्र राजनीति पर भारी रहता.. कितना अच्छा है कि ऐसा होता दिख रहा है..

जरा अन्ना की सिविल सोसाइटी की भ्रष्टाचार की परिभाषा पर गौर फरमाइए.. यह परिभाषा वही है जैसी कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में दी गयी है.. इसमें केवल जनप्रतिनिधि और सरकारी मुलाजिम आते हैं.. इसके तहत न तो कार्पोरेट्स आते हैं न ही एनजीओ, मीडिया और हर्षद मेहता, तेलगी जैसे दलाल.. वाहियात सरकारी ड्राफ्ट में इन में से कुछ को भी लोकपाल के दायरे में लाने की हिमायत की गयी थी पर टीम अन्ना उस पर बिफर गयी.. इन्हें भ्रष्टाचार की परिभाषा से बाहर रखने का क्या तर्क हो सकता है?? लोकपाल का दायरा ज्यादा बढ़ा देने से वह प्रभावहीन हो जाएगा.. पर निचले दर्जे के कर्मचारियों को उसके दायरे में लाने से वह प्रभावहीन नहीं होगा?? एक तबके की ऐसी मासूम समझ भी है कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार रुक जाने से निजी क्षेत्र, मीडिया आदि में स्वतः उस पर अंकुश लग जाएगा.. वे नीति निर्धारण और नियमन को आपस में गड्ड-मड्ड कर दे रहे हैं.. उन्हें इस बात का बिलकुल अंदाज़ नहीं है कि यदि कल मीडिया में विदेशी निवेश कि सीमा को बढ़ाकर इस क्षेत्र में पूर्ण विदेशी स्वामित्व स्थापित कर दिया जाता है तो बिना किसी किस्म के भ्रष्टाचार के ऊपर बैठे एक छोटे से तबके को छोड़कर खुद को मीडिया का पक्का मुलाजिम समझने वाले कितने ही कलम और कैमरे के सिपाही कुछ ज्यादा दिहाड़ी वाले स्ट्रिंगर्स में तब्दील हो जायेंगे.. ऐसे में मीडिया को अपने कंधों पर ढोने वाले उन मौजूदा स्ट्रिंगर्स के सपनों की बात करना भी बेमानी है, जो एक दिन पक्के पत्रकार-उपसंपादक बन जाने की आस में एक अकुशल श्रमिक से भी कम भुगतान पर अपना खून पसीना एक किये रहते हैं.. या बिना किसी भ्रष्टाचार के भी अगर खुदरा क्षेत्र में भारी भरकम विदेशी निगमों को न्योता देने की नीति परवान चढ़ गयी तो छोटे-बड़े करोड़ों खुदरा व्यापारियों की स्थायी बदहाली का रास्ता खुल कर ही रहेगा.. मेधा पाटकर और निवेदिता मेनन को इनके उद्देश्य पवित्र दिखते हों तो दिखें, मेरी छोटी बुद्धि को नहीं दिखते.. उम्मीद है कि वे मुझे माफ़ करेंगी.. उम्मीद है कि टीम अन्ना के सदस्य भी मुझे माफ़ करेंगे कि मै अभी भी सरकार का चाकर हूँ और वे सरकार की चाकरी से ऊपर उठ कर फोर्ड फाउन्डेशन और डच एम्बैसी की शेष-शैया में बैठे हैं..

जारी…

लेखक सनत कुमार सिंह सरकारी अधिकारी हैं.

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