: शाहन के शाह : नाम जपो, हरिनाम जपो, सत्तनाम जपो/ साधु जपो, कबीर जपो और इंसान जपो। किसी भी इंसान में यह गुण उसे कहां से कहां नहीं पहुंचा सकते। लेकिन ईश्वर में अगाध श्रद्धा रखने वाले व्यक्तियों के इस समूह को शासक समाज कहां सहन कर सकता है। वह तो अपने से कमतर लोगों को अपने चरण चांपते, उपासना करते यानी भांट-भाड़गिरी करते ही देखने में अपने अहं की तुष्टि मानता है। इससे इनकार की सजा होती है और सजा कुछ भी हो सकती है। सजा का प्रकार तो शासक ही तय करता है ना। तो साध सम्प्रदाय के साथ भी यही हुआ। जिधर से भी यह निकलते, पीटे जाते। खासकर अंग्रेजी हुकूमत के अलम्बरदार और सैनिक इनसे बहुत चिढ़ते थे। कारण यह कि अपने सम्प्रदाय के अनुसार यह किसी अन्य को उपास्य मानते ही नहीं थे।
जिसकी आस्था सर्वव्यापी में हो, जो कबीर को अपना प्रणेता मानता हो, जो खुद को राम-लक्ष्मण, कृष्ण-बलराम, नानक और आत्मा के उदय का दास मानता हो, वह किसी और के सामने सिर कैसे झुकाये। सो किसी अन्य को प्रणाम करने या उसकी हुजूरी में हाजिर होने का सवाल ही कैसे उठे। इस कहानी को आगे बढ़ाने के पहले इसके इतिहास पर तो एक नजर डाल लेना जरूरी होगा। तो सबसे पहले इस सम्प्रदाय का नाम। उत्तर भारत और राजस्थान के कुछ हिस्सों में छितराया हुआ सा पसरा है साध-सम्प्रदाय। इस सम्प्रदाय के इतिहास को लेकर इतिहासकारों में खूब विवाद रहा है। लेकिन हैरत की बात है कि यह विवाद भी तब शुरू हुआ जब अंग्रेज इतिहासकार और जिज्ञासुओं ने इस सम्प्रदाय के बारे में खोज-खोज कर आंखें खोल देने वाले तथ्य निकाले।
तय हुआ कि यह समुदाय दरअसल और कोई नहीं, बाकायदा एक प्रशिक्षित और अनोखा साध-सम्प्रदाय है। कब, किसने और कैसे इस सम्प्रदाय का आविर्भाव हुआ, इस बारे में अगर कोई तथ्य है भी तो वह है केवल बाद के बरसों में उपजा विवाद। कौन जाने, कि इसी विवाद के चलते ही इस सम्प्रदाय को हेय समझा जाने लगा। कुछ भी हो, संत वीरभान इस सम्प्रदाय के सर्वमान्य व्यक्ति हैं। इन्होंने निर्वाण ज्ञान की उपासना पर जोर दिया और यह भी कि यह बाकायदा विवाहित थे। हालांकि कुछ अंग्रेजों के अनुसार इनका जीवन 1500 ईस्वी के करीब है, लेकिन इसके बावजूद इसे रैदास या रामानंद का शिष्य नहीं माना जा सकता। बावजूद इसके कि इनकी लेखनी में कबीर वगैरह बहुतायत में हैं। हो सकता है कि यह कबीर उनकी भावनाओं में हों, साक्षात नहीं। उन्हें ऊदादास का शिष्य जरूर बताया जाता है, लेकिन मान्यता यह है कि यह ज्ञान के उदय को प्रणाम कर उसका दासत्व ग्रहण करने के चलते ही यह नाम उनसे जुड़ा होगा।
जाहिर है कि यह उदय व्यक्ति में व्यक्तित्व के विकास को लेकर ही जुड़ा होगा। यानी यह प्रकृति के उपासक हैं और मानव मात्र को प्रेम का प्रतीक मानते हैं। वीरभान ने गुरूग्रंथ साहिब जैसा ही वानी ग्रंथ लिखा जिसमें उनके गुरूओं के उपदेश भी हैं। भाषा हिंदी जरूर है, लेकिन उसमें फारसी और अरबी के भी शब्द हैं जो जाहिर है तब खूब प्रचलित रहे होंगे। जन सामान्य से यह सम्प्रदाय कितना जुड़ा हुआ रहा था, इसका उदाहरण इसका एक ग्रंथ है जिसका नाम ही नसीहत की पुडिया है। कुछ भी हो, इतना तो तय है कि इस सम्प्रदाय के साहित्य को संजोने-विकसित करने में गोरख, गोविंद, गरीब, कबीर, दंड, शामदेवी, राजाबाई, शामदेवी, गोपींचंद, दुर्गादास और जरजोधन के अलावा और भी कई साधु-गुरु लोगों का बड़ा सहयोग रहा है। लेकिन इन सबने एकसुर से सर्वाधिक उपासना अगर किसी की व्यक्ति की है तो वह हैं कबीर। यह सम्प्रदाय कबीर को परमात्मा का संदेशवाहक मानते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मुसलमान मोहम्मद साहब को या ईसाई लोग ईसा मसीह को।
इस पंथ ने लोगों को आत्मविश्वास सिखाया। उन्हें बताया कि चाटुकारिता के लाभ से भी अलग एक ऐसा अलौकिक आनंद है जो आत्मगौरव में समाहित है। पशु और मानव के बीच का विभेद केवल व्यवहार ही है, वरना मनुष्य भी पशुवत ही है। इस सम्प्रदाय के अनुसार कबीर ही भगवान के इकलौते सलाहकार हैं और इस तरह भगवान के ओहदे पर हैं। यह सम्प्रदाय मानता है कि भगवान निराकार है, एक है और सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान होने के साथ ही केवल साध-सम्प्रदाय ही नहीं, बल्कि मानव-मात्र के प्रति समग्र रूप से दयावान भी है। ऐसे में जब वह इकलौता सर्वशक्तिमान तत्व हमारे साथ है, फिर किसी और के सामने नत-मस्तक होने की आखिर जरूरत ही क्या है।
कहने की जरूरत नहीं कि इस तत्वज्ञान ने इस साध-सम्प्रदाय को इतना आत्म-सम्मानित बना दिया कि वे तब की प्रचलित चापलूसी और दंडवत आचरण से कोसों दूर निकल गये। जिनका ईश्वर एक है, उन्हें भय किस बात का। यह सम्प्रदाय भय-हीन है। ईश्वर के बाद यदि किसी और पर विश्वास करता है तो केवल अपने-आप पर ही। इस सम्प्रदाय का साफ तौर पर शुरू से ही मानना रहा है कि भगवान के बाद केवल गुरु के अलावा यह सिर न किसी के सामने झुका है और न कभी झुकेगा। जीवन का मकसद सत्संग, संयम और योग है। नामजाप तो सर्वोच्च है ही।
लेकिन चूंकि उनका यह व्यवहार तब के समाज में मान्य नहीं रहा होगा, इसलिए शासक वर्ग ने उन्हें न केवल खारिज कर दिया, बल्कि हेय और अपमानजनक भी करार दे दिया। यह स्वाभाविक ही है कि पहले इस्लाम और फिर ईसाइयत के क्रूर शासनकालों में इनकी हालत बद से बदतर ही होती चली गयी। सत्ता अपने अलावा किसी और की सत्ता को कहां सहन कर पाती है। सत्ता के कारिंदे भी खुद को सत्ता का ही रूप मानते हुए हर एक को अपने सामने चरणावनत देखना चाहते रहे होंगे। इसीलिए इन पर कालांतर में संकटों की गाज गिरने लगी। हालत यह हो गयी कि सरकारी कर्मचारी इन लोगों को देखते ही अपने सरकारी दंड का इस्तेमाल इन्हें पीट कर अपने सत्ता का अहसास लोगों में कराने लगे। लेकिन अपने धैर्य, साहस और सहनशीलता के चलते इस समुदाय ने हर बार अपने गुरू वीरभान का स्मरण किया और हर जुल्म को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकारा, मगर सिद्धांत हर्गिज न छोड़े।
जाहिर है कि इसकी चर्चा आग की तरह फैलने लगी और संवत 1906 में फर्रुखाबाद के कलेक्टर ने इनकी प्रताड़ना रोकने के लिए बाकायदा इन्हें प्रमाण पत्र जारी करना पड़ा। लेकिन इससे भी कहां काम चलता। कितनों को मिल पाता यह सार्टीफिकेट। यानी अमानवीय उत्पीड़न नहीं थमा। लेकिन फिर भी इस समुदाय ने हौसला नहीं खोया और वीरभान के नाम पर ही सुमेरचंद और सिंगारचंद नामक तब के साध-मुखियाओं ने सत्याग्रह कर वीरभान के निर्देशों का उल्लंघन न करने का प्रण किया। पूरी बिरतानिया हुकूमत हिल उठी और आखिरकार संवत 1952 में अंग्रेजी राजदूत ने यह मामला अपने हाथों में लिया और इन मुखियाओं को सीधे महारानी विक्टोरिया से मिलवा दिया। इसके साथ ही इस सम्प्रदाय के कष्टों का हमेशा-हमेशा के लिए अंत हो गया। और इसके लिए अगर प्रेरणास्रोत की बात की जाए तो जाहिर है कि वह अमर-संस्कार वीरभान के ही तो थे।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

