Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बातों बातों में

अजीब आदमी हो, हमारे देश में कुल पागलखाना कितने हैं?

[caption id="attachment_2808" align="alignleft" width="150"]अजय झा[/caption]: गोनू झा कहिन (एक) : एक शाम गोनू झा गाँव के तालाब के किनारे बड़ी चिंता में मग्न बैठे थे और किसी से बात ही नहीं कर रहे थे. कोई उनके पास जाता तो वो सामने ज़मीन पर बना हुआ नक्शा दिखा देते और फिर अपनी चिंता में मग्न हो जाते. आखिर गाँव के मुखिया ने ही सवाल पूछ लिया कि वो किस चीज की चिंता में इतने घुले जा रहे हैं. गोनू झा का जवाब था “मैं एक नए जेल का नक्शा और रूप रेखा बना रहा हूँ जो आगरा पागल खाना के बिल्‍कुल करीब हो और वहां पर हर किस्म की सुविधा हो.” मगर परेशानी ये है कि इतनी ज़ल्दी सब कैसे होगा? मुखिया जी चौंक गए. बोले “अरे श्रीमान, आप क्यों परेशां है. ये काम तो सरकार का है?”

अजय झा

: गोनू झा कहिन (एक) : एक शाम गोनू झा गाँव के तालाब के किनारे बड़ी चिंता में मग्न बैठे थे और किसी से बात ही नहीं कर रहे थे. कोई उनके पास जाता तो वो सामने ज़मीन पर बना हुआ नक्शा दिखा देते और फिर अपनी चिंता में मग्न हो जाते. आखिर गाँव के मुखिया ने ही सवाल पूछ लिया कि वो किस चीज की चिंता में इतने घुले जा रहे हैं. गोनू झा का जवाब था “मैं एक नए जेल का नक्शा और रूप रेखा बना रहा हूँ जो आगरा पागल खाना के बिल्‍कुल करीब हो और वहां पर हर किस्म की सुविधा हो.” मगर परेशानी ये है कि इतनी ज़ल्दी सब कैसे होगा? मुखिया जी चौंक गए. बोले “अरे श्रीमान, आप क्यों परेशां है. ये काम तो सरकार का है?”

गोनू झा खीझ गए और कहा “अजीब आदमी हो तुम. हमारे देश में कुल पागल खाना कितने हैं? एक तरफ मायावती अमेरिकी सरकार से गुहार लगाये जा रही है कि विकीलीक्स के संपादक को हमारे यहाँ भेज दो. उसपर से ये बुढ़वा अन्ना हजारे, हर आये दिन किनी न किसी को पागलखाने भेजने देने की धमकी दिए जा रहा है. अब वो, हर हफ्ते कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह को वहां भेजने की बात कर रहा है. अगर ऐसा ही हाल रहा हो पता नहीं, कौन कितनी ज़ल्दी किस पागल खाने पहुँच जाये. रांची का कांके वैसे ही खस्ता हाल में है.येद्वादा में पखवारे तक पानी नहीं मिलता है. आगरा में यमुना भी सूखने लगी हैं. ये अन्ना पता नहीं किसके सर पर अब चना पीसना शुरू कर देगा?

पता नहीं क्या हो गया है राले गाँव सीधी के लोगों को? जिसको चाहे महात्मा बना दिया और पूरे देश को फिर से राम राज्य का सपना दिखा दिया!! अब वहां के पुण्य आत्माओं को कौन समझाए कि “एक बूँद में कभी समंदर नहीं मिलता और एक तिनके से पानी नहीं खौलता.” अन्ना जी महाराज ने जो लोक पाल के नाम पर पूरे देश में आग लगा दी वो तो अलग बात है. मगर सच्चाई ये है कि आज तक सरकार ने उनकी 6 शर्तों में से एक भी नहीं मानी और पूरी दुनिया के सामने अन्ना और उनके अनुआई छाती पीट कर कहने लगे कि स्वाधीनता की दूसरी लड़ाई भी हमने जीत ली. मगर भइया, हम का ये तो बताओ कि हासिल हुआ क्या? लोक पाल पर जंग ज्यों की त्यों जारी है मगर अन्ना के समर्थकों पर अजीब सा नशा तारी है.

हमारे देश के लोग भी धन्य हैं. पता नहीं कब क्या कर जाएँ. एक गाँव के लोगों ने अन्ना हजारे को वैसे ही महात्मा बना दिया जैसे कभी तम्बू और शामियाने का कारोबार करने वाले और पूरे देश को शनि महाराज के प्रकोप से डराने वाले दाती महाराज खुद को महामंडलेश्वरर बनवा बैठे या फिर बंगलौर के एक बाबा स्वामी नित्यानंद अपने महिला भक्तों के साथ “नित्य-आनंद” लाभ करते हुए अपने आप को शंकराचार्य ही घोषित कर बैठे. अन्ना हजारे पर महात्मा गाँधी का प्रभाव भले ही हो, मगर अन्ना की तुलना महात्मा गाँधी से करना एक भोंडापन के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. महात्मा का किरदार और महात्मा का जीवन चरित्र अन्ना हजारे की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा और सारगर्भित है. अन्ना और महात्मा गाँधी के बीच तुलनात्मक अध्यन के लिए कम से कम पचास बिंदु गिनाये जा सकते हैं, यहाँ पर तीन ही काफी हैं.

एक, महात्मा गाँधी ने जिस ध्येय के पीछे सत्याग्रह का प्रयोग किया, उसमे कामयाबी ले कर ही छोड़ा. चाहे वो बिहार के चंपारण या गुजरात का नमक सत्याग्रह हो. मगर अन्ना की उप्लाब्धि उस मायने में नगण्य है. अन्ना का लोकपाल जोकपाल और भोंकपाल के रास्ते अब तक नोकपाल बन कर ही रह गया है. प्रधानमंत्री तो उसकी परिधि से पहले ही बाहर हो गए, न्याय पालिका ने भी कन्नी काट ली और अब सीबीआई और सीवीसी भी उसी रास्ते पर चल निकला है. आगे क्या होगा ये तो राम जाने मगर अन्ना और उनके लोगों ने तो अपनी पीठ पहले ही ठोंक ली कि विजय पताका तो अपने हाथ में आ ही गयी.

दो, महात्मा ने कभी अपने संकल्प और अपनी पद्धति में बदलाव नहीं किया, मगर अन्ना हजारे कभी दार्शनिक तो कभी सेनापति और कभी मसखरे भी दिखाई दे जाते हैं. महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा के रास्ते पर कभी लाठी उठाने की बात नहीं की और हमेशा एक गाल के बदले दूसरे गाल सामने कर देने की बात की थी, मगर अन्ना अहज़रे अपनी लड़ाई में कभी संघ के साथ सम्बन्ध और समावेश का राग रेल देते हैं तो कभी अपनी लड़ाई के रास्ते में शिवाजी का शस्त्र वाला नुस्खा भी पेल देते हैं.

तीन, महात्मा गाँधी अकेले ही ब्रिटिश हुकूमत पर हमेशा भारी पड़े थे और बाकी सब नेता उनके सामने काफी छोटे दीखते थे. चाहे वो नेहरु हों या फिर सुभाष चन्द्र बोस- कोई महात्मा की बराबरी करने की हिम्मत नहीं कर सका, मगर अन्ना अपने पंज प्यारे के बिना कुछ भी नहीं हैं और कभी कभी तो ये भी लगने लगता है कि अन्ना इन्हीं पंज प्यारे के हाथों में एक खिलौना बनकर रह गए है. विगत तीन हफ्ते में अन्ना मीडिया वालों के लिए मुअम्मा से बनते नज़र आ रहे हैं क्यों कि वो हर विषय पर, हर बात पर बोलते हैं. भले ही उनकी बात तर्क संगत हो न हो.

इसी क्रम में वो कभी बाल ठाकरे से पंगा ले लेते हैं तो कभी कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह पर बरस पड़ते हैं. हैरानी की बात ये है कि अन्ना और दिग्विजय सिंह में तो पिछले तीन दशकों से चोली-दामन का साथ रह है. शायद अन्ना ये बात भूल जाते है या फिर याद ही नहीं करना चाहते कि दिग्विजय सिंह के शासन काल में वो मध्य प्रदेश सरकार में ग्रामीण विकास से सम्बंधित मामलों में सलाहकार की भी भूमिका निभा चुके हैं और भोपाल की हर एक पतली गली से भी वो वाकिफ हैं. दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह भी उनके नाड़े की लम्बाई तक जानते हैं. पता नहीं, क्या वजह थी कि मध्य प्रदेश के ग्रामीण विकास की उखली में सर डालने के बाद विगत बरसों में अन्ना हजारे दिग्विजय सिंह की नज़र में मूसल से सिमट कर सिलबट्टा बन कर रह गए. अब आलम यह है कि मौका मिलते की दोनों एक दूसरे पर अपने उदगार का इज़हार ऐसे करते हैं जैसे :-

अबरू तो कहती है पियो जामे-मोहब्बत
और चश्म ये कहे की नालो-नामे मोहब्बत
सीने से लगाते ही पसीने में वो डूबे
आगोश मेरी बन गयी हम्मामे-मोहब्बत.

कभी अन्ना दिग्विजय सिंह को पागलखाने भेजने की सलाह देते हैं तो कभी दिग्विजय सिंह अन्ना की धोती उठाकर उनकी चड्डी का केसरिया रंग ज़माने को दिखा देते हैं. जनता मज़ा लेती है. मगर दर असल दाल भात में मुसल चंद बन गए संघ के सर संचालक मोहन भागवत जिन्होंने अपनी सफ़ेद मूंछ पर ताव देकर भरी सभा में कह डाला कि अन्ना के आन्दोलन में तो संघ का भी हाथ था. दिग्विजय सिंह के लिए यही मौका था और वो भी अन्ना को सस्ते में लपेट ले गए. लगता हैं कि आने वाले दिनों में अन्ना की अन्नागिरी कही हलकी सी मसखरी न बन जाये क्यों की अब आम जनता भी समझने लगी है कि अन्ना और उनकी टीम अपनी लोक पाल की बांसुरी से एक चरवाहा या गड़ेरिया की तरह भेड़ों को एक जगह इकठ्ठा भले ही कर ले, मगर उसके पास मल्कियत बदलने की न ही हिम्मत है न ही बागवत का लावा खौलाने वाली ताकत.

भला हो फेस बुक और ट्विटर का जिसके ज़रिये एक महीने पहले अन्ना की आतिशबाजी ने सरकार की तो ऐसी की तैसी कर ही दी, मगर सही मायने में मामला तो वहीँ का वही ही अटका है. भले ही आज सूचना तंत्र ज्यादा तेज़ और प्रभावशाली हो गया हो. भले ही अंतरजाल से सूचना बिजली की तेज़ी के पूरे दिनिया में फैल जाए, मगर मल्कियत को बदलने के लिए अन्ना के पैतरे के साथ साथ और बहुत कुछ चाहिए, भले ही अन्ना ने उत्तर प्रदेश में अपनी लोकप्रियता और प्रतिष्ठा दांव पर लगा दिया हो. भले ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी के खिलाफ मतदाताओं से वोट देने की अपील कर दी हो, मगर जनता जनार्दन सच का सामना हमेशा अपने ही तरीके से करती आई है. भले उसमें अन्ना की आतिशबाजी और राजनीतिक पार्टियों की तिकड़म और तिलस्म शामिल हो या न हो. और हमारे मीडिया और सहाफी बंधुओं का तो क्या कहना! चुनाव का समय तो धंधे का समय है. वैसे भी माले-मुफ्त दिले-बरम की लीक पर चलने वालों को  ऐसा मौका हर दी थोड़े ही मिलता है. सहाफत का माजी और मुस्तकबिल गया तेल लेने/ जो  लोग अपने चैनल के चंदू खाने में रूतबा, तेवर और कलेवर की जंग में हर दिन लहू-लुहान होते हैं, उनके लिया ऐसा चुनावी मौसम हवा खोरी का बेहतरीन मौका होता है.

लेखक अजय झा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ये हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, आजतक, डीडी न्‍यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्‍ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...