Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

समाज-सरोकार

विकास की लहर से बढ़ गया कोसी का कहर, दर्जनों गांव डूबे

‘‘बाबू जी, हम सोमालिया की दशा तो नहीं देखे हैं, लेकिन जो कुछ भी यहां हो रहा है, वह सोमालिया से भी बदतर है…।’’ यह कहना है, सुपौल-निर्मली जिले के दर्जनों गांवों के लोगों का, जो इन दिनों विस्थापन की जिंदगी बसर कर रहे हैं। इन दोनों जिले के दर्जनों गांवों के जो हालात हैं, वह सोमालिया से भी बदतर हैं। यहां दोनों जिलों को जोड़ने के लिए (नेशनल हाइवे) एनएच 57 और रेल पुल के निर्माण से बिहार में अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन तो हुआ ही है, 70 हजार से ज्यादा लोग भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी की वजह से बर्बादी के कगार पर हैं। इनका वर्तमान तो खत्म हो ही गया, भविष्य भी अधर में है। विकास के नाम पर 58 से ज्यादा गांवों को ‘जल समाधि’ दे दी गई है।

‘‘बाबू जी, हम सोमालिया की दशा तो नहीं देखे हैं, लेकिन जो कुछ भी यहां हो रहा है, वह सोमालिया से भी बदतर है…।’’ यह कहना है, सुपौल-निर्मली जिले के दर्जनों गांवों के लोगों का, जो इन दिनों विस्थापन की जिंदगी बसर कर रहे हैं। इन दोनों जिले के दर्जनों गांवों के जो हालात हैं, वह सोमालिया से भी बदतर हैं। यहां दोनों जिलों को जोड़ने के लिए (नेशनल हाइवे) एनएच 57 और रेल पुल के निर्माण से बिहार में अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन तो हुआ ही है, 70 हजार से ज्यादा लोग भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी की वजह से बर्बादी के कगार पर हैं। इनका वर्तमान तो खत्म हो ही गया, भविष्य भी अधर में है। विकास के नाम पर 58 से ज्यादा गांवों को ‘जल समाधि’ दे दी गई है।

मिथिलांचल को दो भागों में बांटने वाली कोसी नदी पर दो पुल बनकर लगभग तैयार हैं। एक पुल सड़क मार्ग के लिए, तो दूसरा रेल के लिए है। इन दोनों पुलों के बन जाने से दो भागों में बंटा मिथिलांचल न सिर्फ एक हो जाएगा, बल्कि विकास की गति भी तेज होगी, ऐसा राज्य सरकार का मानना है, लेकिन विकास के नाम पर देश में गरीब, पिछड़े और आदिवासियों को ‘बलिदान’ देने की जो परिपाटी शुरू हुई है, वह नीतीश की सरकार में भी है।

पुल बन रहा है, ठीक बात है, लेकिन उसके कारण 58 गांव पानी में समा गए हैं, उनका क्या? आज की तारीख में 70 हजार से ज्यादा लोग दर-दर भटक रहे हैं। कोसी की आड़ में इस नए सरकारी ‘श्राप’ से पीड़ित गरीब ग्रामीण पुल के तकनीकी डिजायन को जिम्मेदार मान रहे हैं। इतिहास के पन्नों में चलें, तो कोसी नदी के दोनों तरफ तटबंध का निर्माण 1953-60 के बीच हुआ। लंबे समय के बाद कोसी पर कोई नया काम हो रहा है। आपको बता दें कि कोसी नदी सबसे ज्यादा गाद, मिट्टी और बालू लाने वाली नदी है और इसीलिए यह सबसे ज्यादा अपनी धारा बदलती है। यही वजह है कि डूबने के बावजूद और तमाम तरह के कष्ट झेलने के बाद भी लोग जीते रहते हैं, लेकिन अभी जो प्रयास हो रहे हैं, उससे ‘जल प्रलय’ और विनाश की आशंका को टाला नहीं जा सकता। निर्मली और सुपौल के सरायगढ़ भप्टियाही के बीच जो पुल तैयार है, उसकी लंबाई 1.85 किमी की है। इस पुल के दोनों तरफ एफ्लक्स और सुरक्षा बांध तैयार हैं। आपको साफ कर दें कि पहले जो कोसी 14 कि.मी. की चौड़ाई में बहती थी, वह अब पुल की वजह से 1.85 कि.मी. चौड़ाई में बहेगी। केंद्र सरकार का रेल विभाग और नेशनल हाइवे विभाग का तर्क है कि सुरक्षा बांध होने की वजह से न तो पुल को खतरा है, और न ही गांवों को। लेकिन उनके इस दावे की पोल पिछले साल ही कोसी नदी के तांडव ने खोल कर रख दी। 1.85 किमी पुल से एक से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी का स्तर 3-4 मीटर ऊंचा उठ गया और 40 गांव पानी में समा गए।

‘कोई नहीं दे रहा ध्यान’

स्थापितों और पुल का विरोध करने वालों की अगुवाई राजकुमार सिंह, मो. इकबाल हुसैन और सुनील चौहान कर रहे हैं। राजकुमार सिंह कहते हैं, ‘राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, रेल मंत्रालय और जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार के बीच कोसी पुल निर्माण के संबंध में कई बैठकें हुर्इं, लेकिन किसी भी बैठक में विस्थापितों के लिए कोई चर्चा नहीं हुई। उनके पुनर्वास पर बातें नहीं हुईं। आखिर हम भी इसी देश के नागरिक हैं। हमें उजाड़ कर हमारे मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर दिया गया है।’ मो. इकबाल हुसैन कहते हैं कि इस पुल को लेकर बिहार सरकार ने भी इंजीनियर गोकुल प्रसाद की अध्यक्षता में योग्य अभियंताओं की एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में तटबंध के बीच उन गांवों की दयनीय हालत को स्वीकारते हुए कहा था कि अगर एनएच 57 पर सड़क और रेल पुल बनाए जाते हैं, तो यह तटबंध के बीच बसे लोगों के गले में ‘फंदा’ होगा। लेकिन इस सुझाव को दरकिनार कर दिया गया। जबकि बिहार सरकार के मंत्री और खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस योजना की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की मान रहे हैं। बेघर हुए लोग आंदोलन की तैयारी में हैं। आंदोलन का रंग-ढंग क्या होगा, यह तय किया जा रहा है।

‘विनाशलीला’ के लिए जिम्मेदार कौन?’

डीआरडीओ से जुड़े पूर्व वैज्ञानिक और तेजस रॉकेट के प्रणेता एमवी वर्मा इस पूरी ‘विनाशलीला’ के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार मान रहे हैं। वर्मा कहते हैं, ‘‘विस्थापन का इतना बड़ा खेल सरकार की गलत तकनीकी नीतियों से हुआ है। कोसी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों की दूरी 10 से 12 किलोमीटर की है, जबकि दोनों पुल बनाने के लिए 1.85 किमी. की दूरी बनाई गई है। इससे अपस्ट्रीम के गांवों की तबाही तो हो ही रही है, डाउन स्ट्रीम के गांवों की तबाही जब होगी, तो देश में कोहराम मच जाएगा। भविष्य में कोसी वासियों को बचाना है और आने वाली तबाही को कम करना है, तो पुल की दूरी बढ़ाकर तटबंध के समान ही 10 किमी करनी होगी।’’

‘अमीर आज भीख मांग रहे हैं’

उधर, पुल का विरोध और विस्थापितों की लड़ाई लड़ने वाले नारायण चौधरी सबसे ज्यादा बिहार सरकार को दोषी मान रहे हैं। चौधरी कहते हैं, ‘‘नीतीश सरकार विकास की बात करते हैं और विनाश कर रहे हैं। पुल से विस्थापित हजारों लोग दरिद्रता में रह रहे हैं, लेकिन सरकार के लोगों को इससे कोई मतलब नहीं। जो कल अमीर थे, आज भीख मांग रहे हैं।

कभी खुद पर, कभी हालात पर रोना आया…बिहार में सुपौल और निर्मली को जोड़ने के लिए कोसी नदी पर बन रहे सड़क और रेल पुल को लेकर बिहार के लोग फूले नहीं समा रहे हैं। इस पुल के बन जाने से न सिर्फ मिथिलांचल का संपर्क पूरे बिहार से हो जाएगा, बल्कि यातायात के साधन बढ़ने से विकास की प्रक्रिया भी तेज हो जाएगी। लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। सिक्के का दूसरा पहलू बड़ा ही भयावह है। पुल बनने से जिस संभावित विकास की डुगडुगी बजाई जा रही है, उसी विकास प्रक्रिया ने 58 गांवों के 70 हजार से ज्यादा लोगों को विस्थापित कर नरक का जीवन जीने को विवश कर दिया है। कोसी पुल की चौड़ाई बढ़ाने और विस्थापितों को न्याय दिलाने के लिए मिथिला ग्राम विकास परिषद ‘एमजीवीपी’ संघर्षरत है। एमजीवीपी के संयोजक नारायण चौधरी से दरभंगा में ‘अखिलेश अखिल’ की बातचीत के अंश़.

-इससे तो मिथिलांचल का विकास होगा, फिर विरोध क्यों?

–विरोध पुल निर्माण को लेकर नहीं है। विरोध इन पुलों के तकनीकी डिजायन को लेकर है। विकास से जुड़ा कोई भी काम जनता के लिए होता है। उस विकास का क्या मतलब जिससे जनता की जान चली जाए? जनता आफत में फंस जाए? हमारी मांग यह है कि जितनी दूरी में कोसी का दोनों तटबंध हैं, उसके अनुरूप पुल बने। लगभग 10 किलोमीटर की चौड़ाई में कोसी तटबंध है और पुल लगभग 2 किलोमीटर की चौड़ाई में तैयार हो रही है। इससे पानी का उफान बढ़ेगा और आने वाले दिनों में कोसी के इलाके में भयावह हालात पैदा होंगे।

– पुल मार्ग अभी चालू नहीं हुआ है, फिर आप कैसे कह सकते हैं कि हालात बिगड़ेंगे?

— हालात तो पिछले साल ही बिगड़ गए। इसी पुल की वजह से कोसी के अपस्ट्रीम इलाके में बसे 58 गांवों का नामों-निशां मिट गया। गांव तो उजड़े ही, उनकी खेती भी चौपट हो गई। सड़क के किनारे विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं हजारों लोग। इस पुल के तकनीकी डिजायन की वजह से अब तक 78 हजार से ज्यादा लोग कालाहांडी और सोमालिया जैसी स्थिति में जीने को अभिशप्त हो गए हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

– बेघरों के लिए सरकार क्या कर रही है?

— यह तो आप सरकार से ही पूछें। केंद्र सरकार की योजना है और बिहार सरकार की सहमति। दाने-दाने को लोग तरस रहे हैं। एक शाम खाना खाकर लोग रह रहे हैं। फिर जो लोग विस्थापित हुए हैं, उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था भी नहीं है। उनके बच्चों की पढ़ाई समाप्त हो गई है। इस पुल की वजह से 40 स्कूल भी बंद हो गए हैं। स्कूल तो गांव में ही होते हैं और अब गांव हैं ही नहीं, तो स्कूल कहां से बचेंगे!

– आपकी अगली योजना क्या है?

— हम जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम अब इस मामले को पीआईएल के जरिए उठाने जा रहे हैं। विकास के नाम पर लोगों की बर्बादी हम होने नहीं देंगे। विकास का भूत जिन लोगों के सिर पर चढ़ा है, उन्हें पता चल जाएगा कि लोगों के मौलिक अधिकार को छीनने का क्या परिणाम होता है।

…और मुश्किल गुजर-बसर!!

जिस जगह पर सड़क और रेल पुल बन रहे हैं, वहां पहुंचना फिलहाल मामूली बात नहीं है। भप्टियाही से कोसी के पूर्वी तटबंध की दूरी 20 किमी से कम नहीं है। वहां जाने के लिए पैदल या दुपहिया वाहन के अलावा कोई साधन नहीं है। कोसी में समा गए कुछ गांवों की दास्तां कुछ इस तरह है–

निर्मली ब्लाक : कोसी का यह पश्चिमी तटबंध वाला इलाका है। यहां के मौरा, जमुरा, लगुनिया, विपराही, दधिया, रहरिया, धारिया, बेला, श्रीनगर, मोती पूरी तरह अपना अस्तित्व गंवा चुके हैं। कभी ये भरे-पूरे गांव थे, अब इन गांवों की धरती कोसी के पेट में समा गई है। इधर, सुपौल का सरायगढ़ भप्टियाही ब्लॉक है। यह कोसी का पूर्वी तटबंध वाला इलाका है। 2010 में आए भयंकर बाढ़ या पुल की वजह से उठे जल-स्तर से ढोली, कटैया, बलथरबा, भुलिया, गिरधारी, गौरी पट्टी, बनानिया आरती, सीहपुर, नेहाल पट्टी, डीहसेन, इटहरी, लौकता, पलार, करहटी, कवियाटी, बिलेंदारी, धरहरा, बैसा गरिहया भप्रियाही और कल्याणपुर गांव की जल समाधि हो चुकी है।

भप्टियाही ‘चौंतीस दस’ : पूर्वी तटबंध के एप्लाक्स बांध पर हैं 30 झोपड़ियां। एक में चार-चार परिवारों की रहवासी। कभी अपने बलथरबा और मुसिला गांव में ये लोग शान से रहते थे। अब भुखमरी के शिकार हैं। राम प्रसाद राम कहते हैं कि हमें मरने के लिए छोड़ दिया गया है। सरकार कहां है, हमें मालूम नहीं। राम प्रसाद के साथ ही हमारी मुलाकात भोला सिंह, सोमानी देवी, कौशल्या देवी और जगदीश सिंह से हुई।

उजडे़ चेहरे और सूखी काया देखकर कोई भी रो पड़ेगा। जगदीश कहते हैं, ‘‘हम तो जान बचाने में लगे हैं। सरकार के लोग सामने आए, तो बचेंगे नहीं। इसी जगह पर नंग-धड़ंग बच्चों से मुलाकात हुई, एक साथ भोजन करके रहने वाले ये बच्चे भविष्य में क्या करेंगे, कुछ कहना मुश्किल है। आगे बढ़ा, तो माणिक लाल मंडल मिला। लगा, हम उन्हें कुछ देने आए हैं। उदास चेहरा बनाकर कहने लगा-‘‘हम परवाहा गांव के हैं, जो अब नहीं रहा। हमारी संस्कृति खत्म हो गई है। हमें इस विकास से क्या मतलब, नीतीश कहते हैं विकास हो रहा है, लेकिन यहां तो विनाश ही विनाश है।’’ आपको बता दें कि उजड़ने से पहले ये गांव सुखी संपन्न थे। पटुआ, धान, मक्का, गेहूं की खूब खेती होती थी, अब पानी ही पानी है। भोजन के लाले पड़े हैं। भोजन की आस में नौजवान पंजाब भाग गए हैं और बूढ़े, बच्चे भगवान भरोसे खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। यहां के सनपतहाडीह गांव के सुनील मंडल पहले जमींदार हुआ करते थे। अब भिखारी बने बैठे हैं! 300 मन धान उपजाने वाले सुनील तीन सेर अनाज के लिए तरस रहे हैं। देवयति देवी के आंसू नहीं रुक रहे। 70 एकड़ की मालिकन थी। अब भूमिहीन बच्चों को पालना मुश्किल है, बर्बादी का ऐसा मंजर हर जगह बरकरार। इंदल मंडल भी इसी गांव के हैं। पुल से विस्थापित हुए, तो पानी में डूब गए। यह 50 घरों का गांव था। अब गांव पानी में है। गांव के सारे लोग भटक चुके हैं। इंदल मंडल कहते हैं कि जीने का मन नहीं करता। यह कहते हुए, वह फफक-फफक कर रो पड़ते हैं।

क्या है भविष्य?

आ रहा पंचायत बोरहा : आरहा गांव 400 घरों का सुखी गांव था। पड़ौसी गांव भी इससे ईर्ष्या खाते थे। अब इसका नामों-निशान नहीं है। बदरी मंडल कहतें हैं कि महासेतु से हम विस्थापित हो गए हैं, लेकिन पुनर्वास का कोई जिक्र नहीं है। हम परिवार के साथ इसी नदी में समाधि लेंगे। बच्चों की भूख देखी नहीं जाती। अनिता देवी, बेचन शर्मा, योगेंद्र प्रसाद, रामआशीष, देव नारायण सभी की अपनी-अपनी कहानी है। बच्चों की शिक्षा चौपट है और महिलाओं को शौच की समस्या। भला पानी के बीच शौच कैसे? फिर सांपों का प्रकोप अलग से। पालतू जानवर पहले ही नदी की भेंट चढ़ गए हैं, जो बचे हैं, उनके लिए चारा नहीं है। विकास के नाम पर कोसी नदी पुल की क्या राजनीति होगी? यहां तो बाढ़ का विषय है। इतना तय मानिए कि जिन लोगोंं के घर-व्यापार, रोजगार और संस्कृति के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा छीन ली गई है, वे क्या भला बैठेंगे? यह सवाल ‘माओवाद’ की ओर इशारा करता है।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के निवासी हैं. पटना-दिल्ली समेत कई जगहों पर कई मीडिया हाउसों के साथ कार्यरत रहे. इन दिनों हमवतन से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग मुखिया से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. मिशनरी पत्रकारिता के पक्षधर अखिलेश अखिल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...