Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मीडिया मंथन

मीडिया संस्‍थानों को पत्रकार नहीं लेबर चाहिए

हाल ही में अमर उजाला ने ट्रेनी पत्रकारों की भर्ती हेतु एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें उसने 23 साल तक के ऐसे नवयुवकों और युवतियों से आवेदन मांगे हैं, जो किसी भी विषय से केवल स्‍नातक हों और पत्रकारिता में आने का जज्‍बा रखते हों। पत्रकारिता में डिग्री डिप्‍लोमा वालों को आवेदन करने के लिए साफ मना कर दिया गया। पत्रकारिता प्रशिक्षण को लेकर यह बेरुखी सिर्फ अमर उजाला ही नहीं बल्कि कई बड़े अखबारों के संपादक दिखा चुके हैं। हालांकि यह पहला मामला है जब किसी अखबार ने खुले तौर पर पत्रकारिता प्रशिक्षण देने वाले संस्‍थानों को चुनौती दी है।

हाल ही में अमर उजाला ने ट्रेनी पत्रकारों की भर्ती हेतु एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें उसने 23 साल तक के ऐसे नवयुवकों और युवतियों से आवेदन मांगे हैं, जो किसी भी विषय से केवल स्‍नातक हों और पत्रकारिता में आने का जज्‍बा रखते हों। पत्रकारिता में डिग्री डिप्‍लोमा वालों को आवेदन करने के लिए साफ मना कर दिया गया। पत्रकारिता प्रशिक्षण को लेकर यह बेरुखी सिर्फ अमर उजाला ही नहीं बल्कि कई बड़े अखबारों के संपादक दिखा चुके हैं। हालांकि यह पहला मामला है जब किसी अखबार ने खुले तौर पर पत्रकारिता प्रशिक्षण देने वाले संस्‍थानों को चुनौती दी है।

पत्रकारिता की शिक्षा लेने वाले छात्रों के बारे में अक्‍सर यह कहा जाता है कि वे उनके मानक के अनुरूप नहीं है। लेकिन वास्‍तविकता यह है कि आज समाचार पत्रों को कम से कम कीमत पर ऐसे लोगों की जरूरत है, जो उनके अखबार के पन्‍ने भरने के लिए सामग्री उपलब्‍ध करा सकें। ट्रेनी के तौर पर भर्ती किए जाने वाले इन पत्रकारों को तीन से पांच हजार रुपए मासिक सैलरी पर रखा जाएगा, जो कि एक लेबर की मासिक आमदनी से भी कम होगी। मीडिया छात्रों के प्रति मीडिया संस्‍थानों के सौतेले व्‍यवहार की वजह इन संस्‍थानों में उच्‍च पदों पर कार्यरत ऐसे लोग हैं, जिनके पास ना तो कोई डिग्री है और ना ही ज्ञान। उनके पास अगर कुछ है तो वह है उनका अनुभव और मालिकों के प्रति चाटुकारिता।

मीडिया संस्‍थानों से पढ़कर निकलने वाले काबिल छात्रों के सामने वह खुद को बौना पाते हैं। इसके अलावा इन मीडिया संस्‍थानों में दी जाने वाली सैलरी एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम है। जागरण जैसा देश का बड़ा अखबार ट्रेनी पत्रकारों को 3 से 5 हजार, रिपोर्टर को 7 से 10 हजार और सब एडिटर को 8 से 12 हजार रुपए मासिक की सैलरी देता है। क्‍या यह छात्रों और उनकी प्रतिभा के साथ किया जाने वाला भद्दा मजाक नहीं है। आज जहां तकनीकी कोर्स करने वाले छात्रों को लाखों के सैलरी पैकेज मिल रहे हैं, वहीं पत्रकारिता में अपना भविष्‍य तलाशने वाले छात्रों को ना सिर्फ दर दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं बल्कि आर्थिक तंगी का‍ शिकार भी होना पड़ रहा है। इन मीडिया संस्‍थानों में पत्रकारों के लिए कोई नियम कायदे कानून नहीं है। कॉरपोरेट का चोला ओड़ने वाले इन संस्‍थानों मे पत्रकारों की स्थिति किसी फैक्‍ट्री में काम करने वाले मजदूर जैसी है।

मीडिया संस्‍थानों से निकलने वाले छात्र अपने हक को लेकर काफी जागरूक हैं, जिसे ये मीडिया संस्‍थान पचा नहीं पा रहे हैं। मानक के अनुरूप वेतन और अपने हक के लिए आवाज उठाना इन्‍हें गवारा नहीं है। यही वजह है कि ये उनसे अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं। ये जो पौध तैयार करना चाह रहे हैं उसे अपने हक और अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं होगी। क्‍योंकि विज्ञान और कॉमर्स स्‍नातक पाठ्यक्रम में यह चीजें शामिल नहीं हैं। वह सिर्फ एक लेबर होंगे, जो इनके आदेशों को पालन करेंगे। इन मीडिया संस्‍थानों के बारे में एक बात और इन्‍हें  मैनेजर और मार्केटिंग डिपार्टमेंट में तो एमबीए डिग्री वाले चाहिए लेकिन संपादकीय विभागों में गवार चाहिए, जो केवल हिंदी या अंग्रेजी लिखना जानते हों, क्‍योंकि मार्केटिंग वाले इनके लिए  विज्ञापन और पैसा लाते हैं, जबकि संपादकीय की इनके लिए कोई अहमियत नहीं है। इससे यह भी जाहिर होता है मीडिया की शाख दिन पर दिन ये मीडिया संस्‍थान खुद ही गिराते जा रहे हैं।

लेखक इंद्रेश यादव पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...