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भ्रष्टाचार की लहरों को अब क्यों नहीं गिन रहे हैं केजरीवाल जी?

कमलेश पांडे, नई दिल्ली

यह अजीब संयोग नहीं तो और क्या है कि जिन भ्रष्टाचार की लहरों को गिन-गिना कर आयकर अधिकारी अरविन्द केजरीवाल पहले समाज सेवा में और फिर देश की राजनीति में आये और अकस्मात् दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश के मुख़्यमंत्री बन गए, उसी भ्रष्टाचार का आईना जब उनको और उनके अपेक्षाकृत ‘ईमानदार’ समर्थकों को केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अथक प्रयास किये जाने के बाद दिखाया जाने लगा तो अब ‘टीम केजरीवाल’ या तो अगली-बगली झांक रही है या फिर अनर्गल दलील देती दिखाई दे रही है।

कमलेश पांडे, नई दिल्ली

यह अजीब संयोग नहीं तो और क्या है कि जिन भ्रष्टाचार की लहरों को गिन-गिना कर आयकर अधिकारी अरविन्द केजरीवाल पहले समाज सेवा में और फिर देश की राजनीति में आये और अकस्मात् दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश के मुख़्यमंत्री बन गए, उसी भ्रष्टाचार का आईना जब उनको और उनके अपेक्षाकृत ‘ईमानदार’ समर्थकों को केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अथक प्रयास किये जाने के बाद दिखाया जाने लगा तो अब ‘टीम केजरीवाल’ या तो अगली-बगली झांक रही है या फिर अनर्गल दलील देती दिखाई दे रही है।
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ श्री केजरीवाल के अत्यन्त करीबी और भरोसेमंद अधिकारी और दिल्ली सरकार के मुख्य/प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार की गिरफ्तारी के बारे में और उससे पहले भी टीम केजरीवाल के बीच से चरणबद्ध तरीके से गिरफ्तार किये गए उन कई विधायकों के बारे में, और इन गिरफ्तारियों के बाद भी दिल्ली में जारी उस बौद्धिक काहिली बारे में, उसकी तथाकथित खामोशी से पसरे सन्नाटे के बारे में, जिसके जनोन्मुखी शंखनाद पर कभी हजारों-लाखों लोग खुद को न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे।

वाकई मुझे समझ में नहीं आता कि टीम केजरीवाल के विषय में इतना सबकुछ खुलासा होने के बावजूद उनके सामाजिक-राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे और अन्य तथाकथित ईमानदार लोग जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में क्यों नहीं जूट रहे हैं? वो तो अच्छा हुआ कि सामाजिक कार्यकर्त्ता स्वामी अग्निवेश, पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और पूर्व थल सेनाध्य्क्ष जनरल वी के सिंह सरीखे कई लोगों ने समय रहते ही टीम मिस्टर केजरीवाल को पहचान लिया और समय रहते ही सामाजिक-राजनीतिक तलाक ले लिया, वर्ना आज की परिस्थितियों में वे कहीं के नहीं बचते!

यही नहीं, अब यह बात स्वतः ही समझ में आने लगी है कि आखिरकार सुप्रसिद्ध अधिवक्ता प्रशांत भूषण और राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव आदि की बेचैनी और बगावत की असली वजह क्या रही होगी? ये फेहरिश्त बहुत लम्बी है और यह जाहिर करने को काफी है कि आखिरकार राजपथ के चौराहे पर कैसे लूट गया लोकपाल बिल! वह लोकपाल बिल जिसने यूपीए सरकार की राजनीतिक चूलें हिलाकर रख दिया। सच कहें तो पूर्व पीएम मनमोहन जी के दस साल और पूर्व  सीएम शीला जी के पंद्रह के सारे किए-कराये पर इन्हीं भ्रष्टाचार के आरोपों ने पानी फेर दिया।

संभव है श्री केजरीवाल अपने राजनीतिक कोपभवन में खुद को भी कोश रहे हों और यह सोच रहे हों कि- हे राजेंद्र! तुमने ये ‘क्या’ किया? अब मुझे ‘माफ़’ करो! तुम बेनकाब हो चुके हो। काश! यह सब तुमने पहले  ही मुझसे साझा कर लिया होता, तो आज ऐसी नौबत नहीं आती। इसका भी कोई तोड़ मैं निकाल लेता! खैर, अपने देश में एक कहावत प्रचलित है कि राजनीति की काली कोठरी से बेदाग़ बचकर निकलना मुश्किल है और केजरीवाल भी इससे नहीं बच पाये! यही वजह है कि अब वह भ्रष्टाचार की लहरों को गिनने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं? क्योंकि खुद की टीम के कई चेहरे भी कुछ ऐसे ही छींटे से जो सन गए हैं!

यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है जिसने उनके अब तक के बने-बनाए सारे राजनीतिक खेल को बिगाड़ दिया। अब वो लाख चिल्लाएं कि मोदी सरकार उनको काम करने ही नहीं दे रही है, लेकिन लोग अब सहसा विश्वास नहीं करेंगे? मेरा मानना है कि केजरीवाल को प्रचार में बने रहना आता है। इसलिए कभी वो उपराजयपाल नजीब जंग से टकराते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री मोदी से! जबतक वो अकेले चले, मंजिल भी मिली और मकसद भी पूरे हुए। लेकिन जैसे ही नितीश से सांठ-गांठ की और लालू से गले मिले, लोगों को ये भांपते देर नहीं लगा, कि केजरीवाल भी वही नाचीज हैं, कोई राजनीतिक फरिश्ता नहीं।

अब आप खुद ही सोचिये न कि जिस शख्स ने अपने कड़े तेवर और तर्कों के बल भारतीय राजनीति की  कई सारी बनी-बनाई परम्पराओं और चले-चलाए कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया, वह आज अपने ही शागिर्दों की करतूतों से कितना परेशान होगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि आम आदमी पार्टी के आलाकमान और दिल्ली के मुख़्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक चुनौतियाँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं।

सूत्र बताते हैं कि उनके बेहद करीबी और दिल्ली के उपमुखयमंत्री मनीष सिशोदिया भी अब यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आख़िरकार इतनी सारी विडंबनापूर्ण परिस्थितियों के भंवर अपनी पार्टी को कैसे बाहर निकला जाय? उन्हें भले ही यह लगता हो कि मीडिया माध्यमों में विज्ञापन देकर दिल्ली की अपेक्षाकृत प्रबुद्ध जनता को बरगलाया और उसके अंधसमर्थन को बचाए/बनाए रखा जा सकता है, लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि ये पब्लिक है, सब जानती है! 

Kamlesh Pande
[email protected]

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