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गौ-रक्षकों के बढ़ते हौसलों से क्यों पड़े मोदी की पेशानी पर बल?

युवा हिंदुओं में हिन्दू धर्म के आधारभूत मूल्यों और भावनाओं की पुनर्स्थापना के लिए वर्ष 1952 में आरएसएस के सरसंघ चालक गुरु यमयस गोलवरकर : be readily prepared to sacrifice our all for the honour and glory of the motherland. — such a point of honour in our national life is none els but MOTHER COW , the living symbol of the Mother Earth – that deserves to be the sole object of devotion and worship.

युवा हिंदुओं में हिन्दू धर्म के आधारभूत मूल्यों और भावनाओं की पुनर्स्थापना के लिए वर्ष 1952 में आरएसएस के सरसंघ चालक गुरु यमयस गोलवरकर : be readily prepared to sacrifice our all for the honour and glory of the motherland. — such a point of honour in our national life is none els but MOTHER COW , the living symbol of the Mother Earth – that deserves to be the sole object of devotion and worship.

 

भावार्थ : “मातृभूमि के सम्मान और गौरव के लिए सदैव अपना सर्वस्य न्योछावर करने को हमेशा तत्पर रहो । राष्ट्र के सम्मान और गौरव का जीता जागता प्रतीक इस पृथ्वी पर यदि कोई है तो वह सिर्फ और सिर्फ गौ-माता ही है । हिंदुओं के लिए वही एकमात्र पूजा और समर्पण का लक्ष्य होना चाहिए”

ऐसा कौन सा मुद्दा हो सकता है, जो हिंदुओं को हमेशा संगठित होने और रहने के लिए निरंतर प्रेरित करता रह सकता है? जब तक गुरु जी ने उसे ढूंढ नहीं लिया, वह उनके चिंतन में निरंतर बना रहा। उपरोक्त उसी मुद्दे का भावार्थ है।

पंजाब और उ0प्र0 में आसन्न चुनाव के मद्दे नजर दलितों और मुसलमानों को रिझाने, गले लगाने और उनसे वोटिंग मशीन का बटन दबवाने की लालसा पर फिरता पानी देख आखिरकार मजबूर मोदी को मुँह खोलना पड़ा है। वो भी 24 घंटों में एक बार नहीं दो बार (नोयडा-हैदराबाद)। इस एक वर्ष में गौ-रक्षकों की प्रताणना का शिकार ये दोनों ही सर्वाधिक हुए हैं। आज देश में चुनाव चाहे कहीं हों, चुनावों में बीजेपी की उम्मीदों को परवान चढ़ाने की हैसियत यदि सबसे बड़ी किसी की है तो वह नरेंद्र मोदी की ही है।

गौ-भक्तों और गौ-भक्त होने का ढोंग करने की आड़ में असमाजिक कार्यों में लिप्त तत्वों की पहचान करने की जिम्मेदारी राज्यों के हवाले कर, उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने का सन्देश मोदी ने पूरे राष्ट्र को जरूर दे दिया है।

ऐसा करके फिलहाल सबसे बड़ा संकट, मोदी ने विश्व हिन्दू परिषद के सामने खड़ा कर दिया है क्योंकि गौ-रक्षकों के उत्साह के अतिरेक को सबसे बड़ा सम्बल तो उन्हीं से मिलता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रकों में लाद कर रातों रात कट्टीघरों को भेजी जाने वाली गायों की सूसड़ कसाईयों की आपसी व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता के चलते, तथाकथित गौ-रक्षकों को मिलती रहती है। पुलिस का पूरा अमला इस तथ्य से वाकिफ़ है। वो भी इन गौ-रक्षकों से मिल कर गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गरम होने का जुगाड़ करते रहते हैं।

किसी तरह जुगाड़ सेट न होने पर इन्ही गायों को ट्रकों से उतार गौशालाओं में पहुंचाने के इंतजाम कर ये गौ-रक्षक अपना पल्ला झाड चलते बनते हैं। फिर चाहे गौशालाओं में इन गायों के रहने खाने इलाज के पर्याप्त इंतजाम हो न हों। जयपुर राजस्थान की हिंगोरिया गौशाला में थोक में गायों के तड़फ तड़फ कर मरने की खबर ने पूरे देश के सामने इन गौशालाओं में गायें कितनी सुरक्षित हैं, इसकी पोल तो खोल ही दी है।

नरेंद्र मोदी ने गौ-भक्तों के सामने भले ही विषम मजबूरियों के चलते रखा हो, एक बड़ा पवित्र लक्ष्य रखा है। और वो है गायों को प्लास्टिक खा के मरने से बचाओ। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक खा के मरने वाली गायों की संख्या, काट के मार दी जाने वाली गायों की संख्या से कहीं ज्यादा होती है।

यहाँ यह स्मरणीय है कि भारत विश्व में मांस निर्यातक देशों में अग्रणीय देश है। विगत दो वर्षो में देश के कट्टीघरों के आधुनिकीकरण के परिणाम स्वरूप मांस निर्यात व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुयी है। कहीं न कहीं कट्टीघरों के मालिक जिनमे अधिकाँश मुसलमान नहीं हैं, भी इन तथाकथित गौ-रक्षकों के हुड़दंग से परेशान हैं। प्लास्टिक खाने वाली गायों का मांस विदेशों में स्वास्थ के लिए घोर हानिकारक माना जाता है और वे ऐसे मांस को स्वीकार नहीं करते। ये समस्या का दूसरा पहलू है।

यानी मोदी की चिंताओं के पीछे राजनैतिक कारण तो है ही पर इकलौता यही कारण नहीं है, मांस निर्यात व्यवसाय की उन्नति को लगा ग्रहण भी है।

लेखक विनय ओसवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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