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बातों बातों में

भावनाओं की राजनीति वामपंथियों से ज्‍यादा भला किसने की है?

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

वैसे तो हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता लेकिन जब बात सार्वजनिक हो जाए और खासतौर से वह आधुनिक जमाने की सोशल मीडिया का हिस्‍सा बन जाए तो खड़े किए गए प्रश्‍नों का प्रति उत्‍तर देना जरूरी हो जाता है। दूसरी दृष्‍ट‍ि से देखें तो यह भारतीय परंपरा भी है कि यदि कोई पक्ष है तो उसका विपक्ष होगा और यदि विपक्ष मौजूद है तो उसे अपनी बात सही संदर्भों के साथ तार्क‍िक ढंग से अवश्‍य कहनी चाहिए। भड़ास पर आज ही किसी मोहतरमा का लेख आया है जिसमें उन्‍होंने दक्षिण पंथि‍यों को इस बात के लिए आरोपित किया है कि वे भावनाओं की राजनीति करते हैं और भावनाएं उनके लिए किसी ब्रह्मास्‍त्र से कम नहीं हैं।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

वैसे तो हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता लेकिन जब बात सार्वजनिक हो जाए और खासतौर से वह आधुनिक जमाने की सोशल मीडिया का हिस्‍सा बन जाए तो खड़े किए गए प्रश्‍नों का प्रति उत्‍तर देना जरूरी हो जाता है। दूसरी दृष्‍ट‍ि से देखें तो यह भारतीय परंपरा भी है कि यदि कोई पक्ष है तो उसका विपक्ष होगा और यदि विपक्ष मौजूद है तो उसे अपनी बात सही संदर्भों के साथ तार्क‍िक ढंग से अवश्‍य कहनी चाहिए। भड़ास पर आज ही किसी मोहतरमा का लेख आया है जिसमें उन्‍होंने दक्षिण पंथि‍यों को इस बात के लिए आरोपित किया है कि वे भावनाओं की राजनीति करते हैं और भावनाएं उनके लिए किसी ब्रह्मास्‍त्र से कम नहीं हैं।
वस्‍तुत: इन मोहतरमा को यह तो पता ही होना चाहिए कि मनुष्‍य एक अध्‍ययनशील और मननशील प्राणी है, उसका संपूर्ण जीवन विचार एवं भावनाओं के समुच्‍चय से सतत प्रवाहित है। फिर जीव जगत में ऐसा कौन है जो भावनाओं से संचालित नहीं होता। यदि भावनाएं न हों तो मनुष्‍य फिर कैसे मनुष्‍य कहला सकता है ? इसका तार्किक पक्ष यह है कि मनुष्‍य मेटेरियल यानि की पदार्थ नहीं बन सकता। भावनाएं किसी में नहीं होती तो वह पदार्थ हैं। क्‍या कम्‍प्‍युटर में भावनाएं होती हैं ? या पत्‍थर, गैस अथवा तरल पदार्थ में ? उत्‍तर होगा नहीं तो इन मोहतरमा को यह ठीक से पता होना चाहिए कि भावनाएं सभी जीवों में होती हैं। यदि भावनाएं न हों तो जीवन की शुरूआत न होती । बच्‍चे को पैदा करने का जोखिम और दर्द कोई औरत क्‍यों उठाए ? भावनाओं के पक्ष में इस प्रकार की तमाम बातें और भी कही जा सकती हैं । कुल मिलाकर जीवन विचारों के साथ भावनाओं से संचालित होता है। 

भड़ास पर यह मोहतरमा लिखती हैं कि दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां सिर्फ़ और सिर्फ़ भावनाओं की राजनीति करती हैं. ये पार्टियां जनता की भावनाओं का राजनीतिकरण करती हैं. इनका हथियार हैं भावनाओं का दोहन. ये जन आस्था, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति, संस्कार, सांस्कृतिक विरासत बचाने का दावा करती हैं, दम्भ भरती हैं और इन मुद्दों पर इनको जन समर्थन भी मिलता है पर दरअसल ये पार्टियां इन भावनात्मक मुद्दों का उपयोग अपने शुद्ध राजनैतिक फायदे के लिए करती हैं ।

अब उनसे यह क्‍यों न पूछा जाए कि यह सभी बातें वामपंथ पर लागू नहीं होती क्‍या ? क्‍या वे भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे । जिस मार्क्‍सवाद के समाजवाद का सपना दिखाकर ये वामपंथी गरीब ग्रामीणों और नवागत बौद्ध‍िकों के हाथों में नक्‍सलवाद के नाम पर हथियार अपने ही समाज और देश से विरोध करने वाली कलम थमा रहे हैं, क्‍या ये मोहतरमा इसे सही मानती हैं ? कम से कम इससे कई गुना श्रेष्‍ठ दक्षिणपंथी हैं, वे हाथों में हथियार नहीं अपनी प्राचीन सभ्‍यता और संस्‍कृति पर गर्व करना सिखाते हैं।

यदि भारत की प्राचीन परंपरा और संस्‍कृति यह ज्ञान देती है- ‘सत्यं वद। धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमद:।’ अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में आलस्य मत करो। अपने श्रेष्ठ कर्मों से कभी मन नहीं चुराना चाहिए और सृष्टि के विकास में सदा सहयोगी बनाना चाहिए। तो क्‍या यह गलत शिक्षा है ? यहां आचार्य क्‍या गलत बताते हैं- ‘मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव। अतिथि देवों भव।’ अर्थात माता को, पिता को, आचार्य को और अतिथि को देवता के समान मानकर उनके साथ व्यवहार करो।

वस्‍तुत: यह भारतीय संस्कृति की उच्चता है कि यहाँ माता-पिता और गुरु तथा अतिथि को भी देवता के समान सम्मान दिया जाता है। दान सदैव मैत्री-भाव से ही देना चाहिए तथा कर्म, आचरण और दोष आदि में लांछित होने का भय, यदि उत्पन्न हो जाये, तो सदैव विचारशील, परामर्शशील, आचारणनिष्ठ, निर्मल बुद्धि वाले किसी धर्मनिष्ठ व्यक्ति से परामर्श लेना चाहिए। जिसने लोक-व्यवहार और धर्माचरण को अपने जीवन में उतार लिया, वही व्यक्ति मोह और भय से मुक्त होकर उचित परामर्श दे सकता है। श्रेष्ठ जीवन के ये श्रेष्ठ सिद्धान्त हैं, जिन्‍हें भारतीय संस्‍कृति और दक्षिणपंथियों द्वारा बताए जाते रहे हैं।  यहां कोई धर्म और धर्माचरण को संकुचित अर्थ में न समझे, वह भारतीय संदर्भों में धर्म का अर्थ जानकर इसे समझने का प्रयत्‍न करे।

वास्‍तव में यदि भारत की प्राचीन संस्‍कृति दूसरों की नजरों में दक्षिणपंथी ज्ञान है तो क्‍यों नहीं इस पर समस्‍त भारतवासियों को गर्व होना चाहिए ? यदि दक्षिणपंथी कहते हैं कि विभिन्‍न पंथ मत दर्शन अपने भेद नहीं वैशि‍ष्‍ट हमारा, एक एक को ह्दय लगाकर विराट शक्‍ति प्रगटाएं, मां भारती की करें प्रतिष्‍ठा विश्‍व पताका लहराएं तो इसमें गलत क्‍या है ?  अमेरिका की तरह विश्‍व शक्‍ति बनने का स्‍वप्‍न क्‍यों नहीं प्रत्‍येक भारतवासी को देखना चाहिए ?   या इजराइल की तरह चारों ओर से शत्रुओं से घिरे होने के बाद भी शक्‍त‍ि का प्रकाशपुंज हमें क्‍यों नहीं बनने का प्रयत्‍न करना चाहिए ? यहां यह कहने का कतई मतलब नहीं निकाला जाए कि भारत अभी कमजोर है, हमारा देश एक संप्रभु एवं सुसम्‍पन्‍न राष्‍ट्र है यह और शक्‍ति सम्‍पन्‍न बने यह कामना तो प्रत्‍येक देशभक्‍त भारतवासी को हमेशा करते रहना चाहिए।

यह मोहतरमा लिख रही हैं कि दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां आस्था, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति, संस्कार, सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों का अति सरलीकरण करके जनता के सामने रखती हैं, जैसे एक देश एक भाषा.वो जनता से पूछती हैं की अपना देश एक है तो भाषा एक होनी चाहिए की नहीं और जनता सरल और सीधा जवाब देती है हाँ एक देश है तो एक भाषा हो ..सवाल भी सरल और जवाब भी सरल …वाह कितना आसान और सरल तरीका है देश में एक भाषा के फार्मूले का ये अति सरलीकरण ही इनका असली भावनात्मक खेल है .. भारत में हर चार कोस पर पानी और वाणी बदलती है तो क्या ऐसे में सब भाषाओँ का गला घोट दिया जाए ? अलग अलग भाषाओँ के बोलने वालों को डंडे के जोर पर एक ही भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जाए ? और उनको डंडे के ज़ोर पर मजबूर किया गया तो देश का क्या होगा? क्या एक भाषा के लिए हम एक देश को तोड़ने का खतरा मोल ले सकते हैं ?

इस पूरे पेराग्राफ में जो यह भाषा को लेकर दक्षिणपंथियों पर प्रश्‍न दाग रही हैं, कम से कम इन्हें यह तो पता ही होना चाहिए कि देश का हर इंसान यह बात जानता है कि भारत में पग-पग पर वाणी बदल जाती है, अब हिन्‍दी के ही तमाम रूप हैं लेकिन क्‍या गढ़वाली बोलने वाला दिल्‍ली में आकर भी उसी में बात करता है, नहीं,  वह हिन्‍दी में खासकर खड़ी बोली में जो समुचे देश में एक समान समझी जाती और बोली जाती है में अपनी बात रखता है। दक्षिणपंथी कभी किसी भाषा के विरोधी नहीं रहे। वे इस बात के पक्षधर जरूर हैं कि जब दुनिया के तमाम देशों की अपनी एक राष्‍ट्रीय मानक भाषा है जैसे फ्रांस की फ्रैंच, जर्मनी की जर्मन, पाकिस्‍तान की उर्दू, अमेरिका और इंग्‍लैण्‍ड जैसे कई देशों की इंग्‍लिश तो भारत की भी एक मानक भाषा सर्वस्‍वीकृत होनी चाहिए, जिसमें वह अपने आपको दूसरे देशों के सामने अभिव्‍यक्‍त कर सके। फिर वह कोई भी हो सकती है, उधार की अंग्रेजी को छोड़कर, यदि भारत का अधिकांश जनमानस चाहता है तो वह मराठी, गुजराती, असीमिया, तेलगु, तमिल, मलयालम, कन्‍नड़, हिन्‍दी या अन्‍य कोई भी भाषा हो सकती है। 

मोहतरमा को अपने इस लेख के जरिए यह भी बताना चाहिए था कि फलां-फलां दक्षिणपंथी द्वारा भाषा के स्‍तर पर देश तोड़ने की बात कही गई है। अरे दक्षिणपंथी तो यह भी कहते हैं कि संस्‍कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है, यदि हिन्‍दी या अन्‍य किसी भाषा को राष्‍ट्र की भाषा स्‍वीकारने में व्‍यापक जनमानस को संकोच है तो क्‍यों न संस्‍कृत को पुन: प्रतिष्‍ठ‍ित किया जाए। इसमें क्‍या बुराई है ?

मोहतरमा यह क्‍यों भूल जाती हैं कि भारत लोकतंत्रात्‍मक देश है और लोकतंत्र में जन ही सबसे बड़ी शक्‍ति हैं। यह जन किसी राजनीतिक पार्टी के भुलावे में नहीं आता, उसे जो उचित लगता है वह वही निर्णय लेता है और अपनी सरकार स्‍वयं के विवेक से चुनता है। हमारे और आपके कहने से नहीं । दक्षिण पंथी राजनैतिक पार्टियां आस्था, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति, संस्कार, सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों का अति सरलीकरण करके वास्‍तव में यदि कुछ करती हैं तो जनमानस का जागरण ही करती हैं। यह पार्टियां अपने राष्‍ट्र पर गर्व करना सिखाती हैं, अपने अतीत पर गौरव करना सिखाती हैं। अपने पूर्वजों पर अभीमान करना सिखाती हैं। अपने इतिहास को सच के आईने पर कसने की शिक्षा देती हैं। इतिहास से सबक लेकर यथार्थ में जीने की शिक्षा सिखाती हैं। यदि कुछ नहीं सिखाती तो वह वामपंथियों की तरह यह है कि भारत कभी एक देश नहीं रहा, यह तो कई राष्‍ट्रों का समुच्‍चय है। यदि नहीं सिखाती तो यह कि बंदूक से हर बात का हल नहीं निकाला जाता। राष्‍ट्रवादी पार्टियां देश में नक्‍सली बनना तो नहीं सिखाती । कला के माध्‍यम से नाटक और नौटंकी करते हुए अपने ही देश के विरोध में कला का प्रदर्शन करना बिल्‍कुल नहीं सिखाती हैं। ऐसी तमाम बातें हैं जो देश और समाज के विरोध में जाती हैं जिनसे विद्धंश होता है, सृजन नहीं वह सभी बातें दक्षिणपंथ कभी नहीं सिखाता है। दक्षिणपंथ की यही शिक्षा है कि हम करे राष्‍ट्र आराधन, तन, मन, धन, जीवन से।

मोहतरमा, अपने लेख के अंत में जो अपील करती दिखाई दे रही हैं कि दक्षिण पंथी कट्टरवादियों के झांसे  में ना आयें, उनकी की गई इस अपील पर यहां यही कहा जा सकता है कि इनका पूरा लेख स्‍पष्‍ट कर रहा है कि यह वामपंथि‍यों से अत्‍यधिक प्रभावित हैं जो कि वर्ग संघर्ष पर विश्‍वास करते हैं । भारत के दक्षिणपंथियों का सीधेतौर पर स्‍पष्‍ट मानना है कि राष्‍ट्र सर्वोपरि‍ है, उसके लिए अनेक जीवन समर्पित किए जा सकते हैं। राष्‍ट्र है तो हम हैं, आधुनिक जगत में देश नहीं तो कुछ नहीं। 

अंत में यहां यही कहा जा सकता है कि इन मोहतरमा के लेख को पढ़कर कोई भी एक मत नहीं बनाए दक्षिणपंथियों के विचारों को भी पढ़े और ऋषि‍ यास्‍क की तरह स्‍वयं से मंथन करें, तर्क की कसौटी पर हर बात को, घटनाओं को और जो लिखा गया है उसे जाचें, परखे और फिर निर्णय लें कि दक्षिणपंथ का मार्ग उसके लिए श्रेयस्‍कर है अथवा अन्‍य कोई ओर ? इनके अलावा भी कहने के लिए तमाम बातें हैं जो आगे क्रमश: खड़े किए गए प्रश्‍नों के उत्‍तर में कही जाती रहेंगी।

इति शुभम्

Mayank Chaturvedi
[email protected]

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