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मीडिया मंथन

मीडियाकर्मियों के शोषण के खिलाफ कौन बोलेगा?

पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले की कवरेज को लेकर एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध क्या लगा दिया कि देश में बवाल मच गया। मीडिया में हो रहे शोषण को लेकर कोई क्यों नहीं बोलता? अधिकारी अपने कनिष्ठों को अपने घर का नौकर समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिन समूहों ने दिया भी है वह भी सही तरीके से नहीं दिया। मजीठिया मांगने पर विभिन्न समाचार पत्रों से सैकड़ों मीडियाकर्मियों को नौकरी से निकाल दिया गया। सड़कों पर भटक रहे ये मीडियाकर्मी धरना-प्रदर्शन से लेकर कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई समाजसेवक कोई नेता और कोई भी पत्रकार इनके पक्ष में बोलने को तैयार नहीं। इस मामले कहां सोये हुए हैं, समाज के ठेकेदार ?

पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले की कवरेज को लेकर एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध क्या लगा दिया कि देश में बवाल मच गया। मीडिया में हो रहे शोषण को लेकर कोई क्यों नहीं बोलता? अधिकारी अपने कनिष्ठों को अपने घर का नौकर समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिन समूहों ने दिया भी है वह भी सही तरीके से नहीं दिया। मजीठिया मांगने पर विभिन्न समाचार पत्रों से सैकड़ों मीडियाकर्मियों को नौकरी से निकाल दिया गया। सड़कों पर भटक रहे ये मीडियाकर्मी धरना-प्रदर्शन से लेकर कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई समाजसेवक कोई नेता और कोई भी पत्रकार इनके पक्ष में बोलने को तैयार नहीं। इस मामले कहां सोये हुए हैं, समाज के ठेकेदार ?

मीडिया समूहों का यह हाल है कि जो जितना बड़ा दलाल उतना ही बड़ा पत्रकार। जो स्वाभिमानी, खुद्दार, ईमानदार पत्रकार हैं, उन्हें संपादक या मालिक या तो नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं या फिर निकाल देते हैं। शोषण किसी भी तरह का हो, सबसे अधिक मीडिया में हो रहा है। यही वजह है कि देश व समाज के लिए काम करने वाले पत्रकारों ने या तो वेबसाइटें खोल ली हैं या फिर इंटरनेट संस्करण। दूसरों की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाला मीडिया अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहा है, जो देश के बड़े पत्रकार होने का दावा करते हैं उनका काम मात्र सरकारों या प्रभावशाली लोगों से अपने मालिकों के लिए सेटिंग करना रह गया है।

यदि ऐसा नहीं है तो दैनिक जागरण में मजीठिया वेज बोर्ड की मांग करने पर 250 के करीब मीडियाकर्मी नौकरी से निकाले गए हैं। राष्ट्रीय सहारा में 10 माह का बकाया वेतन तथा मजीठिया मजीठिया वेजबोर्ड की मांग करने पर आंदोलन की अगुआई करने वाले 22 लोग नौकरी से निकाले गए हैं। इनके अलावा विभिन्न हिन्दी व अंग्रेजी समाचार पत्रों से मजीठिया वेजबोर्ड मांगने पर सैकड़ों लोग नौकरी से निकाल दिए गए हैं। 10-12 हजार रुपए प्रति माह तक में कितने मीडियाकर्मी अपनी आजीविका चला रहे हैं, जो न्यूनतम वेतनमान से भी कम है। मीडियाकर्मियों की इस दयनीय हालत पर कोई क्यों नहीं बोलता ?

जो पत्रकार एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने पर बवाल मचा रहे हैं, मजीठिया वेजबोर्ड पर क्यों नहीं बोलते? जबकि इस वेजबोर्ड से इन लोगों को भी फायदा होगा। निश्चित रूप से देश में मीडिया की स्वतंत्रता होनी चाहिए पर व्यवसायीकरण के रूप में नहीं। देश व समाज हित में काम करने वाले मीडिया के लिए देश के हर नागरिक को खड़ा हो जाना चाहिए पर जो लोग इस मीडिया में काम कर रहे हैं उनके शोषण के खिलाफ भी।

चरण सिंह राजपूत
वरिष्ठ पत्रकार
[email protected]

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