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राजनीतिक दल अरबों के चंदे का घोटाला यों ही करते रहेंगे

बजट में रोकथाम की कोशिश गायब… अपनी कमाई की जानकारी देने को लेकर देश की आम जनता और राजनीतिक दलों के लिए दोहरे मापदंड क्यों है? जैसी कि उम्मीद थी, मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की परेशानियां झेलने के दौरान जनता द्वारा राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे तथा उनकी कमाई को पारदर्शी बनाने हेतु उठाई गई मांग की दिशा में सरकार अपने इस बजट में कुछ कड़े प्रावधान लायेगी, परन्तु ऐसा कुछ न कर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देशवासियों को निराश ही किया है। हालांकि दिखावे के तौर पर कुछ ऐसा जरूर किया गया है जिससे ऐसा भ्रम फैले कि सरकार इस मामले को लेकर गंभीर है।

बजट में रोकथाम की कोशिश गायब… अपनी कमाई की जानकारी देने को लेकर देश की आम जनता और राजनीतिक दलों के लिए दोहरे मापदंड क्यों है? जैसी कि उम्मीद थी, मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की परेशानियां झेलने के दौरान जनता द्वारा राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे तथा उनकी कमाई को पारदर्शी बनाने हेतु उठाई गई मांग की दिशा में सरकार अपने इस बजट में कुछ कड़े प्रावधान लायेगी, परन्तु ऐसा कुछ न कर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देशवासियों को निराश ही किया है। हालांकि दिखावे के तौर पर कुछ ऐसा जरूर किया गया है जिससे ऐसा भ्रम फैले कि सरकार इस मामले को लेकर गंभीर है।

वित्त मन्त्री ने सरकार की ईमानदार जैसी छवि दिखाने की कोशिश जरूर की है लेकिन राजनीतिक दलों को विदेशों से मिलने वाले चंदे की कोई रकम निश्चित नहीं की गई है। इसका मतलब यह हुआ कि अब राजनीतिक दलों द्वारा आमजन से अधिकतम 2000 रु. तक की रकम नगद ली जा सकेगी और बाकी सारी फंडिंग एन.आर.आइ. के माध्यम से विदेशों से ही आएगी, जिसका हिसाब-किताब दिखाने की कानूनी बाध्यता नहीं होगी।

वित्त मंत्री जेटली के अनुसार सरकार ने चुनाव आयोग के सुझावों को मानते हुए ऐसा प्रावधान किया है कि राजनीतिक दल किसी व्यक्ति से नकद चंदे के रूप में अधिकतर 2000 रुपए ही ले पायेंगे। अब पार्टियों को किसी से भी दो हजार रुपए से ज्यादा लेने पर उसका स्रोत बताना पड़ेगा। इसके बावजूद सरकार ने राजनीतिक दलों के लिए अब एक ऐसा चोर रास्ता खोल दिया है जिसके जरिए ये दल चंदे के खेल में फिर से काला धन खपा सकते हैं। इसके अनुसार अब पार्टियों को चंदा देने वाला कोई भी शख्स चेक के जरिये बॉन्ड खरीद सकता है और यह रकम किसी राजनीतिक दल के पंजीकृत खाते में चले जाएगी और ये बॉन्ड उक्त राजनीतिक दल के लिए किसने लिया, यह सार्वजनिक नहीं हो सकेगा।

चुनाव सुधारों पर काम करने वाली संस्था– Association for Democratic Reforms (ADR) ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में बताया कि देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के 69 प्रतिशत पैसे का कोई हिसाब-किताब नहीं है। दरअसल, अब तक लोक प्रतिनिधित्व कानून–(Representation of the People Act), 1951 की धारा 29-C के अंतर्गत राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से अधिक के चंदे की ही जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है। इसी का लाभ राजनीतिक दल अब तक उठाते रहे थे। जैसे 2004 से 2015 के बीच राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों की कुल आय 11 हजार 367 करोड़ 34 लाख रुपये थी, लेकिन इन्होंने 20 हजार रुपये से अधिक के चंदे के रूप में केवल 1,835 करोड़ रुपये मिला हुआ दिखाया। बाकी हजारों करोड़ की रकम कहाँ से आई, किसने दी, कब-कब और कैसे मिली यह सब तथ्य पार्टियां छिपा गई थीं, लेकिन अब सभी राजनीतिक दलों को न सिर्फ दो हजार रुपए से ज्यादा के चंदे की जानकारी देनी पड़ेगी, बल्कि दो हजार रुपए से ज्यादा का चंदा चेक या दूसरे डिजिटल माध्यम से ही लेना होगा।

यह बात सभी जानते हैं कि जनता राजनीतिक नेताओं को देश की हरेक व्यवस्था ठीक-ठीक चलाने, जनता के लिए कल्याणकारी नीतियां और कार्यक्रम बनाने, उन्हें लागू करवाने जैसे कार्य करने के लिए चुनती है लेकिन जब यही लोग अपने दलों की आमदनी का हिसाब-किताब छिपायें तो इनको कठघरे में खडा किया जाना आवश्यक हो जाता है। अगर देश के एक आम आदमी के लिए अपनी कमाई का स्रोत बताना कानूनी बाध्यता है तो देश के हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल को अपनी कमाई का स्रोत छिपाने की आजादी न्यायसंगत कैसे हो सकती है।

यदि सरकार आम जनता के लिए बीस रुपए की चीज भी कैशलेस तरीके से खरीदने की व्यवस्था बनाने की जरूरत महसूस करती है और इसके लिए जनता को प्रेरित भी कर रही है तो राजनीतिक दलों द्वारा छोटा सा चंदा भी चेक या डिजिटल तरीके से लेने का नियम क्यों नहीं बनाया गया? यदि अब भी चुनाव प्रक्रिया में पार्टियों के लिए मौजूद सभी चोर दरवाजे बंद करने की अपेक्षा चेक के जरिये बॉन्ड खरीद कर उसे राजनीतिक दलों को देना जारी रहा तो देश में राजनीतिक दल अरबों के चंदे का घोटाला और टिकटों की खरीद-फरोख्त यों ही करते रहेंगे।

इस बजट ने एक सवाल यह जरूर खड़ा किया है कि देश में एक ओर आम आदमी के लिए अपनी कमाई की जानकारी देने की अनिवार्यता और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को इससे छूट क्यों है? इसे लेकर देश की आम जनता और राजनीतिक दलों के लिए दोहरे मापदंड क्यों हैं?

श्यामसिंह रावत

वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंड

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