विचारधारा पर मंथन की जरूरत… उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलना सपा, बसपा, कांग्रेस व रालोद के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इन पार्टियों के लिए आम चुनाव के बाद यह दूसरा बड़ा झटका है। इस जनादेश ने धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली इन पार्टियों की विचारधारा और संगठन दोनों पर समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है। इन चुनाव में सबसे बड़ी परीक्षा समाजवादी पार्टी के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की थी। तो यह माना जाए कि विकास, संगठन और विचारधारा को लेकर पार्टी के मुखिया अपने पिता मुलायम सिंह यादव से बगावत करने वाले अखिलेश यादव को कांग्रेस से गठबंधन करना भारी पड़ गया। ऐसे अखिलेश यादव को गंभीरता के साथ परिवार विवाद के पूरे प्रकरण, संगठन और विचारधारा पर मंथन करने की जरूरत है।
समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाले अखिलेश यादव को यह समझना होगा कि क्या उनके नेतृत्व में भी समाजवादी पार्टी लोहिया जी की नीतियों पर खरा नहीं उतर पाई। उन्होंने जो निर्णय लिए, क्या वे उनकी नीतियों पर खरे उतरे? जब अखिलेश यादव मुख्मयंत्री बने तो विरोधी प्रदेश में साढ़े चार मुख्यमंत्री होने की बात की जा रही थी। उस समय तक अखिलेश यादव का चेहरा पुराने धर्रे पर चल रही समाजवादी के मुख्यमंत्री का था। नेताजी के अमर सिंह को पार्टी में लेने के बाद जब शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो उन्होंने अपने तेवर दिखाने शुरू किये। हालांकि नेताजी के दबाव में उन्हें कई काम गलत करने पड़े पर उन्होंने उनकी छवि साफ-सुथरे नेता की रही। डीपी यादव के बाद अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी जैसे बाहुबलियों को पार्टी में न लेने देने से उनकी छवि में और निखार आया।
शिवपाल यादव द्वारा अखिलेश यादव के करीबी नेताओं का निष्कासन, टिकट बंटवारे में अरविंद सिंह गोप, पवन पांडे समेत उनके कई चहेतों नेताओं के टिकट कटने के बाद जिस तरह से समाजवादी पार्टी के युवा नेता उनके पक्ष में खड़े हुए। जिस तरह से उन्होंने अपने पिता व चाचा का विरोध करते हुए विचारधारा का हवाला देते हुए पार्टी की बागडोर संभाली। अमर सिंह को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाया। नेताजी की कार्यप्रणाली से हटकर परिवार से अलग पिछड़े वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल को बनाया। यह वह समय था कि जब अखिलेश यादव समाजवादी हीरो के रूप में उभरे । मीडिया, युवा, महिलाएं, बुजुर्ग, हर वर्ग की जुबान पर अखिलेश यादव का ही नाम था। समाजवादियों के मन में एक उम्मीद जगी कि अब समाजवादी विचारधारा को धार देकर अखिलेश यादव समाजवाद को बुलंदी पर ले जाएंगे। समाजवाद की समझ रखने वाले पत्रकार, लेखक और नेता सभी यह सोच रहे थे कि अखिलेश यादव एक हीरो के रूप में अकेले अपने दम पर चुनावी समर में निकलेंगे।
कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर समाजवादियों को एक झटका जरूर लगा था। समाजवादियों का कहना था कि जिस पार्टी के खिलाफ वे लोग जिंदगी भर लड़ते रहे उसके साथ गठबंधन कर कैसे आगे बढ़ेंगे? खुद नेताजी ने आगे बढ़कर इस गठबंधन का विरोध किया। 100 सीटें कांग्रेस को देने पर सपा की 100 सीटें तो अपने आप कम हो ही गई थी। यह गठबंधन मुस्लिम वोटबैंक के लिए किया गया था। इस गठबंधन से नकारात्मक संदेश यह गया कि जब उन्होंने प्रदेश में काम किये हैं तो किसी पार्टी के सहयोग की जरूरत क्यों ? लोहिया जी की नीतियों पर चलने वालों को सत्ता का मोह क्यों ?
मुस्लिमों को सपा के तवज्जो देने के साथ ही बसपा मुखिया मायावती ने भी 100 टिकट दिये थे।
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिमों को लेकर सपा, बसपा व कांग्रेस पर निशाना साधने में सफल रहे। इन पार्टियों के मुस्लिम मोह को लेकर हिन्दू वोट के ध्रुवीकरण करने में सफल रहे। धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम परस्ती कतई नहीं है। यह बात समझाने में सफल रहे। यही वजह रही कि बसपा का वोटबैंक दलित व सपा का वोटबैंक यादव भी बड़े स्तर पर भाजपा को गया। यह चुनाव उत्तर प्रदेश में आम चुनाव की तर्ज पर लड़ा गया। समाजवाद पर राजनीति करने वाले नेताओं को समझना होगा कि जनता पार्टी में शामिल होने वाले संघियों ने 1980 में पार्टी बनाने के बाद पार्टी को इतना कैसे मजबूत कर लिया कि पूर्ण प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाने के बाद न केवल देश के आधे से ज्यादा प्रदेशों में सरकार बना ली बल्कि देश से सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश को भी प्रचंड बहुमत के साथ फतह कर लिया। जरूरत इस बात की भी है कि समाजवादी विचारधारा को कैसे-कैसे और किन लोगों ने कमजोर किया?
चरण सिंह राजपूत
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