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यूपी में बदनाम सड़कों पर खामोशी का पहरा

21 वीं सदी के शुरुआती वर्ष 2002 में विक्रम भट्ट निर्देशित हिन्दी फीचर फिल्म ‘राज’ के एक गीत, ‘यह शहर है अमन का, यहां की फिजा है निराली, यहां पर सब शांति-शांति है,यहां पर सब शांति-शांति है’ ने खूब शोहरत बटोरी थी। यह गीत आजकल उत्तर प्रदेश पर काफी फिट बैठ रहा है। यूपी में सत्ता परिवर्तन होते ही एक गजब तरह की खामोशी ने पूरे राज्य को अपने आगोश में ले लिया है। इसका कारण है योगी सरकार का अपराधियों पर कसता शिकंजा, जिसके कारण यूपी में योगी सरकार का इकबाल बुलंद है। पूरे प्रदेश में जिस तेजी के साथ माहौल बदल रहा है, उसने प्रदेश की अमन प्रिय जनता काफी सुकून महसूस कर रही है। शहर की सड़के और चौराहे इस बात के गवाह हैं। बात-बात पर मारपीट पर उतारू दबंग किस्म के लोग अब कहीं नहीं दिखाई देते हैं। बड़े-बड़े मॉल और पार्कों में अब शोहदे लफंगई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

21 वीं सदी के शुरुआती वर्ष 2002 में विक्रम भट्ट निर्देशित हिन्दी फीचर फिल्म ‘राज’ के एक गीत, ‘यह शहर है अमन का, यहां की फिजा है निराली, यहां पर सब शांति-शांति है,यहां पर सब शांति-शांति है’ ने खूब शोहरत बटोरी थी। यह गीत आजकल उत्तर प्रदेश पर काफी फिट बैठ रहा है। यूपी में सत्ता परिवर्तन होते ही एक गजब तरह की खामोशी ने पूरे राज्य को अपने आगोश में ले लिया है। इसका कारण है योगी सरकार का अपराधियों पर कसता शिकंजा, जिसके कारण यूपी में योगी सरकार का इकबाल बुलंद है। पूरे प्रदेश में जिस तेजी के साथ माहौल बदल रहा है, उसने प्रदेश की अमन प्रिय जनता काफी सुकून महसूस कर रही है। शहर की सड़के और चौराहे इस बात के गवाह हैं। बात-बात पर मारपीट पर उतारू दबंग किस्म के लोग अब कहीं नहीं दिखाई देते हैं। बड़े-बड़े मॉल और पार्कों में अब शोहदे लफंगई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब छोटी-छोटी बात पर लोग अपना आपा खो बैठते थे, मरने-मारने तक की नौबत पहुंच जाती थी। न खाकी वर्दी का डर रह गया था, न कानून की चिंता। महिलाओं के साथ छेड़छाड की घटनाएं समाज को अभिशप्त करती जा रही थीं। जिसकी बेटी या बहन के साथ छेड़छाड़ होती थी, वह अपना मुंह नहीं खोल सकता था। अगर खोलता तो जान के लाले पड़ जाते। उलटा उसी को किसी केस में फंसा दिया जाता। कदम-कदम पर  सड़क पर दहशत का माहौल देखने को मिलता था। यह सब सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की आड़ में चल रहा था, जिनका समाजवाद से दूर-दूर का नाता नहीं है,वह भी सपा राज में सपाई चोला ओढ़कर ‘कारनामें’ कर रहे थे। अवैध कब्जेदार, नकल और खनन माफिया, अवैध निर्माण,अवैध नर्सिग होम, खाद्य पदार्थो में मिलावट, कालाबाजारी से लेकर कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा था। सरकारी पैसों की बंदरबांट, थानों की नीलामी, ठेकेदारों की मनमानी सब कुछ चल रहा था।

ऐसा नहीं है कि योगी राज में अब सब कुछ खत्म हो गया हो या फिर बदल गया हो, लेकिन कम से कम कोई यह तो नहीं कह सकता है कि यूपी में कानून व्यवस्था की धज्जियां सरकारी संरक्षण में उड़ाई जा रही हैं। अपराधिक वारदातें आज भी  घटित हो रही  हैं, लेकिन इसके अनुपात में कमी आई है। अब समाज विरोधी तत्व यह नहीं सोच सकते हैं कि उन्हें कहीं से संरक्षण मिल जायेगा,इसलिये अपराधी पकड़े भी जा रहे हैं ओर जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंच रहे हैं। जिसके चलते ऐसा लगता है कि यूपी की बदनाम सड़कों पर खामोशी का पहरा बैठ गया हो। यह जरूर है कि सड़क पर अब पहले जैसा तांडव देखने को नहीं मिलता है,मगर चारदिवारी के भीतर होने वाले अपराधों पर अभी नियंत्रण नहीं हो पाया है। इसके लिये जितना पुलिस जिम्मेदार है उतनी ही जिम्मेदारी न्यायपालिका की भी है। इससे भी ऊपर है सामाजिक तांनेबांने का छिन्न-भिन्न हो जाना। अब रिश्ते बेईमानी और स्वार्थ पर टिके नजर आते है।

बहरहाल, समाज में आ रहे बदलाव को अगर सियासी चश्मा उतार कर देखा जाये तो काफी कुछ साफ नजर आने लगता है। अपराधिक प्रवृति के लोंगो में सरकार और पुलिस का भय पनपने की वजह से ऐसा हुआ है। गुंडे-माफियाओं को पता है कि अगर वह कानून को अपने हाथ लेंगे तो उनको कोई बचाने वाला नहीं मिलेगां यह दृश्य जगह-जगह देखने को भी मिल रहा है। लखनऊ में विधान भवन के समाने से अगर ट्रैफिक पुलिस का सब इंस्पेक्टर एक मंत्री की लाल-नीली बत्ती लगी पुलिस स्क्वॉड की गाड़ी को गलत पार्किंग के कारण क्रेन से उठाकर ले जा सकती है और यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से बीजेपी विधायक सुशील सिंह की हत्या आरोपियों को छुड़ाने की कोशिश को पुलिस नाकाम करके बीएसपी नेता की हत्या के आरोपियों को जेल भेज देती है तो इसका मतलब यही हुआ कि योगी सरकार की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। उनका ‘चाबुक’ अपने पराये में अंतर नहीं कर रहा है।

सीएम योगी ने कानून व्यवस्था चुस्त-दुरूस्त करने के लिये पुलिस को खुली छूट दे रखी है,जिसकी वजह से ही अपराध का ग्राफ घटा है। पुलिस अब बेजा दबाब बीजेपी नेताओं और विधायकों का भी नहीं मान रही है। हॉ, इस बीच कई और तरह की समस्याओं ने जरूर जन्म लिया है,जिस कारण पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने में दिक्कत आ रही है। योगी के सत्ता संभालते ही आंदोलनों की बयार बहने लगी है। शराब बंदी के खिलाफ आंदोंलन, प्राइवेट स्कूल मालिकों की मनमानी के खिलाफ आंदोलन, कट्टर हिन्दूवादी नेताओं की हठधर्मी के किस्से, अयोध्या में भगवान राम लला के मंदिर के निर्माण की मांग जोर पकड़ने जैसी समस्याएं जरूर योगी सरकार के लिये सिरदर्द बनी हुई हैं।

लब्बोलुआब यह है कि योगी राज में उत्तर प्रदेश उम्मीदों का प्रदेश बन गया है। ऐसा लग रहा है पूर्ववर्ती सरकारों को लेकर प्रदेश की जनता में या तो विश्वास की कमी रही होगी अथवा जनता का मिजाज समझ पाने में यह सरकारें नाकाम  रही होगी। योगी को सत्ता संभाले चंद दिन बीतें हैं,इन चंद दिनों में सरकार ने काफी अहम फैसले भी लिये हैं, जिसके चलते प्रदेश में अपराध के ग्राफ में कमी आई है। नौकरशाहों, अधिकारियों और कर्मचारियों के काम का तौर- तरीका बदल गया है। चाहें अवैध बूचड़खाने हो या फिर अवैध निर्माण अथवा खनन, भू और नकल माफिया योगी सरकार का हंटर सभी के खिलाफ तेजी के साथ चल रहा है।

योगी राज आते ही यूपी में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई भी तेज हो गई है। चाहें तीन तलाक का मामला हो या फिर शराब जैसी बुराइयों के कारण बिगड़ता सामाजिक तानाबांना। महिलाओं से छेड़छाड़ का मसला हो अथवा उनको आगे बढ़ने देने का मौका मिलने की बातं। जनता को कम पेसे में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, शिक्षा को व्यवसायीकरण से बचाना, सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार से लेकर सड़क के गडढ्ो,अतिक्रमण, सरकारी सम्पति पर कब्जा करने वाले सभी पर योगी की नजरें जमी हैं।    

अजय कुमार
लखनऊ
मो-9335566111

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