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भाभी, अब वो कभी फोन नहीं उठाएंगे

2004 जुलाई में अशोक जी से हमारी पहली मुलाकात रामोजी फिल्म सिटी से लौटते समय बस हुई… सर नमस्कार… के साथ शुरू हुआ मुलाकातों का दौर दिल्ली तक जारी रहा… अशोक जी के विदा होने के कुछ दिन पहले भी मुलाकात हुई थी… तब ये आभास कतई नहीं था कि ये हमारी अंतिम मुलाकात है… खुश मिजाज अशोक जी कभी किसी की शिकायत नहीं करते थे… धीर, वीर और शांत स्वभाव के धनी थे. वे ईटीवी राजस्थान को जमाने वालों में से थे. ईटीवी से जब लोग दिल्ली में किसी अच्छे चैनल में नौकरी करने के लिए आते थे तो अशोक जी को बहुत खुशी होती थी और कहते थे कि हम तो हैदराबाद में सेटल हैं… आप लोग जाओ दिल्ली में तरक्की करो… यही हमारी तरक्की होगी… हमे अच्छा लगेगा… कभी उन्होंने किसी की शिकायत नहीं की… हमेशा सब को मान दिया… चाहे छोटा रहा हो या फिर बड़ा… यही वजह रही कि कभी किसी से उनका दुराव नहीं हुआ… मैं उनसे पहले दिल्ली आ गया था… और जब दिल्ली से हैदराबाद गया… तो अनायास ही मुंह से निकला… अशोक सर आप भी दिल्ली आने की योजना नहीं बना रहे हैं… तो उन्होंने वही, पुराना जवाब दिया था कि हम यहीं पर रहेंगे… आप लोग तरक्की करिए…

2004 जुलाई में अशोक जी से हमारी पहली मुलाकात रामोजी फिल्म सिटी से लौटते समय बस हुई… सर नमस्कार… के साथ शुरू हुआ मुलाकातों का दौर दिल्ली तक जारी रहा… अशोक जी के विदा होने के कुछ दिन पहले भी मुलाकात हुई थी… तब ये आभास कतई नहीं था कि ये हमारी अंतिम मुलाकात है… खुश मिजाज अशोक जी कभी किसी की शिकायत नहीं करते थे… धीर, वीर और शांत स्वभाव के धनी थे. वे ईटीवी राजस्थान को जमाने वालों में से थे. ईटीवी से जब लोग दिल्ली में किसी अच्छे चैनल में नौकरी करने के लिए आते थे तो अशोक जी को बहुत खुशी होती थी और कहते थे कि हम तो हैदराबाद में सेटल हैं… आप लोग जाओ दिल्ली में तरक्की करो… यही हमारी तरक्की होगी… हमे अच्छा लगेगा… कभी उन्होंने किसी की शिकायत नहीं की… हमेशा सब को मान दिया… चाहे छोटा रहा हो या फिर बड़ा… यही वजह रही कि कभी किसी से उनका दुराव नहीं हुआ… मैं उनसे पहले दिल्ली आ गया था… और जब दिल्ली से हैदराबाद गया… तो अनायास ही मुंह से निकला… अशोक सर आप भी दिल्ली आने की योजना नहीं बना रहे हैं… तो उन्होंने वही, पुराना जवाब दिया था कि हम यहीं पर रहेंगे… आप लोग तरक्की करिए…

इसके दो साल बाद अचानक एक दिन पता चला कि अशोक जी दिल्ली आ गए हैं और त्रिवेणी ग्रुप के चैनल वॉयस ऑफ इंडिया से जुड़ गए हैं… इस सूचना के बाद हम और सत्य प्रकाश जो इस समय इंडिया टीवी में हैं, अशोक जी से मिलने उनके घर गए… उस समय जो बात हुई, उससे साफ लग रहा था कि अशोक जी दिल्ली आने से काफी खुश हैं… इसके लगभग तीन महीने बाद मैं भी वॉयस ऑफ इंडिया से जुड़ गया… तबसे अशोक जी से लगातार बात होने लगी… दिल्ली के चैनलों में होने वाली चहल पहल ईटीवी से बिल्कुल अलग है… यहां पर हमेशा अफरातफरी रहती है… लेकिन इसमें भी अशोक जी ने अपने आप को बखूबी ढाल लिया था और बिना किसी शोर के वो अपना काम करते थे… दिल्ली आने पर एक जो विशेष चीज हुई, उनकी एकंरिंग बंद हो गई… लेकिन वॉयस ओवर में उनकी बुलंद आवाज यहां भी गूंजती रही… वॉयस ऑफ इंडिया के कई प्रोमो उनकी आवाज में थे… ऐसी क्वालिटी थी अशोक जी के आवाज में… अशोक जी खबरों की नब्ज बखूबी पहचानते थे और उसे जर्नलिस्ट की हैसियत से ही एंगिल देते थे. भड़काने और अफवाह फैलाने वाली खबरों को हाइप देने के पक्ष में नहीं थे… अशोक की अंग्रेजी और हिंदी पर समान पकड़ थी… वीओआई में आराम से दिन कट रहे थे…

इसी बीच वहां परेशानी का सिलसिला शुरू हुआ… सब लोग बेचैन होते… लेकिन अशोक जी लगातार अपना काम करते रहे… जो शिफ्ट लगती, उसमें आते और अपनी जिम्मेदारी बखूवी निभाकर घर चले जाते थे… जब उनसे बिगड़ रहे हालात पर बात होती तो वो थोड़ी शंका जरूर जताते थे लेकिन अपने अंदर चल रही हलचलों से अवगत नहीं होने देते थे. वो हमेशा दूसरे लोगों को हौसला देते थे कि घबराओ नहीं आने वाले दिनों में सब ठीक हो जाएगा… इसके बाद मैं जब वीओआई से विदा हुआ तो अशोक जी ने काफी हौसला बढ़ाया और कहा कि दूसरी जगह जा रहे हो, जमकर मेहनत करना और आगे बढ़ना… हम तो अभी यहीं रहेंगे… आगे देखते हैं क्या होता है… इसके बाद जब भी वीओआई गया, तब उनसे चाय की दुकान पर मुलाकात होती थी और विस्तार से उनसे नौकरी और अन्य मुद्दों पर बात होती थी लेकिन उन्होंने कभी भी जाहिर नहीं होने दिया कि उनके अंदर क्या चल रहा है…

इसके बाद वीओआई में हलचल भरा दौर शुरू हुआ… वह दौर आया और निकल गया… फिर से वीओआई शुरू हुआ… जानकारी मिली की अशोक जी ने ज्वाइन कर लिया है… खुशी हुई… लेकिन 25 दिसंबर की मनहूस सुबह ऐसी खबर लेकर आई जिसकी उम्मीद अशोक जी के जाननेवाले किसी भी व्यक्ति ने नहीं की होगी… पता चला कि अशोक जी हमारे बीच में नहीं हैं.. ये खबर सुनकर तो एक समय ऐसा लगा कि मानों समय ठहर गया है… कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो गया है… हमसे कहा गया कि अशोक जी के घर का नंबर चाहिए… अस्पताल में शायद नंबर का कोई काम रहा होगा… इसके बाद मैं अशोक जी के घर की ओर निकला और उनके घर के सामने जाते ही मेरे कदम ठिठक से गए क्योंकि उनकी पत्नी किसी को फोन लगा रही थीं… मुझे लग रहा था कि शायद वो अशोक जी को ही फोन कर रही होंगी क्योंकि उनके घर लौटने का समय बीतता जा रहा था मैं मन ही मन रो रहा था… लेकिन जानने के बाद भी ये नहीं कह सका… कि भाभी जिसे आप फोन लगा रही हैं… वो अब कभी फोन नहीं उठाएंगे…।

लेखक शैलेंद्र कुमार सिंह टीवी जर्नलिस्ट हैं और इन दिनों महुआ न्यूज, दिल्ली में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  09310993774 के जरिए किया जा सकता है.

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