वैसे तो इस कथा की शुरुआत ‘एकदा भारतवर्षे उत्तरप्रदेश राज्यं मायावती नामस्य मुख्यमंत्री आसीन……..से होना चाहिए, मगर मेरा संस्कृत ज्ञान उतना ही है जितना ‘परमाणु जिम्मेदारी बिल’ पर संसद के माननीयों का, इसलिए फिलहाल हिंदी में ही पढ़िए. सनातन काल से माला पहनाने का चलन रहा है. देवताओं को पूजा में माला पहनाई जाती है. माला का एक रूप वरमाला का भी होता है. विवाह में वर-वधू परिणय बंधन में बंधते वक़्त परस्पर एक-दूसरे को पुष्पमाल पहनाते हैं.माला का एक रूप विरोध में भी होता है, किसी के प्रति नाराज़गी या आक्रोश दर्शाने के लिए यदा-कदा जूतों की माला पहनाई जाती रही है. अतिथि के स्वागत में भी माला पहनाने का रिवाज़ हिंदुस्तान में है.
सादगी के लिए गांधीजी ने सूत की माला का रिवाज़ शुरू किया था, अब भी कांग्रेस के लोग कभी कभार सूत की माला धारण करते हैं. अब वक़्त बदला है सो माला का रूप-स्वरुप भी बदल गया है. माला का पर्यायवाची शब्द हार भी है, नेता और हार का चोली-दामन का साथ होता है. नेता हार(माला) तो पहनना पसंद करते हैं मगर किसी अन्य से हार (पराजय) उन्हें कतई पसंद नहीं होती. अब नोटों की माला का रिवाज़ शुरू हो गया है. यह तो स्पष्ट नहीं है कि इसकी शुरुआत किस निश्चित अवसर पर हुई, मगर जहाँ तक याद पड़ता है, शुरू में इसे दूल्हों को शादी में पहनाया जाता था, अब नेताओं को नोटों की माला ललचाती है.
शुरुआत में उत्तरप्रदेश का जिक्र किया गया है, वहां की मुख्यमंत्री मालावती….माफ़ कीजिए मायावती हैं. अब नाम में ही माया है तो माया से उनका मोह तो होगा ही. वैसे बचपन में एक कथा पढ़ी थी कि नाम में कुछ नहीं होता, गुलाबचंद को कई बार कठोर व्यवहार करते देखा गया है तो घरों में काम करने वाली कई कई आयाओं के नाम राजरानी भी होते हैं, शांति नाम की कई महिलायें बहुत झगडालू हो सकती हैं तो कई राम नामधारियों को रावण के लक्षणों से ओतप्रोत पाया गया है. बात चल रही थी मायावती की, वे आम जनता तो हैं नहीं कि नाम को सार्थक करना न जानें. उनके पास पूरे सूबे की सत्ता है, उसका दोहन करना भी उन्हें भली प्रकार आता है. वे उस दलित वर्ग की रहनुमा बनना चाहती हैं जिसका आदि-अनादि काल से शोषण होता आया है. वे इस तबके को समाज की मूलधारा में लाना चाहती हैं. इसकी शुरुआत उन्होंने खुद से की है, यही बात विरोधियों को खटक रही है, विरोधी यह बात भूल जाते हैं कि विकास की शुरुआत स्वयं से करने को ही आधुनिक राजनीति कहते हैं. मालाओं के जरिये मायावती कितना बड़ा काम कर रही हैं यह कोई नहीं देख रहा, माला पहनकर वे गांधी को अपने गले में धारण करती हैं. यह रिज़र्व बैंक की गलती है कि वह हजार से बड़े नोट नहीं छाप रहा, वर्ना माला काफी छोटी हो जाती और विरोधियों को आसानी से दिखाई भी नहीं देती. अभी पहनी गई दोनों मालाएं हजार और पांच सौ के नोटों की थीं इसलिए काफी बड़ी थीं. नेता लोग टीवी चैनलों के जरिये जबरन अर्थशास्त्री बनकर माला के कुल नोटों की संख्या, उसकी मोटाई, लम्बाई आदि के गुणा-भाग में लगे हैं. कोई कह रहा है माला २२ करोड़ की है, तो कोई ५ करोड़ की. माया की पार्टी के लोग इसे २१ लाख और १८ लाख की बता रहे हैं, कोई तो ५१ करोड़ की माला बता रहे हैं, मायावती के कट्टर विरोधी मुलायमसिंह को इस बात का दुःख है किकई लोगों के उठाने पर भी माला उठ नहीं रही थी. बात हो रही है दलितों के विकास की, तो मायावती को किसी की चिंता क्योंकर हो. उनकी पार्टी ने ऐलान कर दिया है कि अब भविष्य में ‘बहनजी’ केवल नोटों की माला ही पहनेंगी. आज के समय में जब कांग्रेस ने स्वयं गांधी के आदर्शों को तज दिया है, यदि मायावती माला के जरिये गांधी के प्रति प्रेम और श्रद्धा दिखाती हैं तो किसी का पेट क्यों दुखता है?
साईकिल बनी बवाले जान…
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ‘हाथ के पंजे’ को देखकर पुलकित होती होंगी, ‘कमल’ को देखकर नितिन गडकरी भी जरूर फूल जाते होंगे, मगर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायमसिंह यादव की साँसें ‘साईकिल’ को देखकर अटक जाती है.यह सभी प्रतीक चिन्ह इन दलों के चुनाव चिन्ह भी हैं. दरअसल मुलायम गत दिवस जब अपने गृह ग्राम सैफई गए तो हवाई जहाज के लैंड करते वक़्त एक साईकिल सवार हवाई पट्टी पर सामने आ गया, हालांकि पायलट ने किसी संभावित दुर्घटना को टाल दिया लेकिन हादसे की कल्पना ने मुलायम के चेहरे का रंग ही उड़ा दिया. अब तक तो अमरसिंह ही उनकी नाक में दम किये थे अब उनकी अपनी साईकिल ही जान की दुश्मन बनने लगी है. गनीमत यह रही कि उस साईकिल सवार की जगह ‘हाथी’ पर बैठा कोई महावत नहीं था.
हेलो माइक टेस्टिंग…..
नेताओं को अपनी आवाज़ जनता तक पहुँचाने के कई माध्यम हैं, लेकिन जनता से सीधे संवाद में उन्हें कई खतरे भी होते हैं. सुरक्षा मामलों से इतर सबसे बड़ा खतरा जन-समस्याओं की शिकायतों का होता है. संवाद के दौरान आवाज़ को दूर-दूर तक पहुँचाने का काम लाउड स्पीकर करता है, नगर जब इससे भी आवाज़ जनता तक नहीं पहुंचे तो परेशानी लाजिमी है. ऐसा ही कुछ हुआ कांशीराम के जन्मदिन पर आयोजित रैली में. इसमें मुख्य वक्ता उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को होना था, और वे ही थीं भी. वे माइक सँभालने के तीन मिनट बाद तक इस बात से परेशान रहीं कि भीड़ के अंतिम व्यक्ति तक उनकी आवाज़ पहुँच भी रही है, या नहीं. आखिर उनके मैनजरों ने उन्हें संतुष्ट किया कि वे जहाँ तक अपनी बात पहुँचाना चाहती हैं वहां तक तो पहुँच ही रही है. अब मायावती जैसी बड़ी नेता को यह समझाना बेमानी है कि ढो कर लाई गई भीड़ नेताओं को सुनना चाहती भी है या नहीं यह समझें.
साफ्टवेयर विकसित करें चिदंबरम साहब
सब टीवी के बहुचर्चित हास्य कार्यक्रम ‘ऑफिस-ऑफिस’ में मुसद्दीलाल को सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली का खासा अनुभव हो गया था. अब केंद्र सरकार को भी यह अनुभव हो गया लगता है. गृह मंत्रालय ने अपने कर्मचारियों को कहा है कि, वे भले ही दफ्तर देरी से आयें मगर हफ्ते में ४० घंटे काम ज़रूर करें बात वही है हर दिन ८ घंटे की नौकरी. मगर चिदंबरम साहब यह भूल गए कि जब कर्मचारी दफ्तर के तय समय में ही अपनी सीटों से गायब रहते हों तो अतिरिक्त समय में वे क्या काम करेंगे? दफ्तर में कर्मचारी की मौजूदगी तय करना ही काफी नहीं है, उसके द्वारा ड्यूटी टाइम में किये गए कामकाज के आकलन का कोई साफ्टवेयर विकसित करना भी ज़रूरी है.

