एक ओर नक्सली आम लोगों को मारने के लिए ट्रेन की पटरियां उड़ाने के घृणित कर्म में जुटे हुए हैं तो दूसरी ओर नक्सलियों का बुद्धिजीवी प्रभाग दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में बैठे हुए उसे जायज ठहराने और उसे क्रांतिबीज की संज्ञा देने में जुटे हुए हैं। यह भयानक त्रासद है कि वे नक्सली बुद्धिजीवी भी बीजापुर, खड़गपुर और दंतेवाड़ा या बस्तर जाने का जोखिम उठाना पसंद नहीं करते। नक्सली पैरोकारों को दिल्ली और कोलकाता की वातानुकूलित कमरों में ही परिचर्चा आयोजित करने में मजा आता है, बीजापुर और दंतेवाड़ा में खुले में कोई कार्यक्रम आयोजित करने का न तो नैतिक साहस रखते हैं और न ही कलेजा, जिनकी वे वकालत दिल्ली में बैठे-बैठे कर रहे हैं, नक्सली उनकी बात को कितना महत्व देते हैं, इसकी परीक्षा ले लेने की भी सुध नहीं है, उन्हें।
नक्सली बुद्धिजीवी खासकर अरूधंति रॉय की नक्सलियों के पक्ष में नित जारी किये जाने वाले फतवा टाइप तर्कों को सुनकर दिमाग सुन्न हो जाता है। रॉय का यह कहना कि नक्सली आम आदमी की हत्या नहीं कर रहे बल्कि जो आम आदमी व आदिवासी नक्सली हमले में मारे जा रहे हैं वे ‘लाल क्रांति’ के साधन हैं, जिसका साध्य देश की सत्ता पर कब्जा करना है। वे तर्क दे रहे हैं कि 1917 की बोल्शेविक क्रांति, 1949 की माओवादी क्रांति में आम आदमी को अपनी जान देकर क्रांति की कीमत चुकानी पड़ी थी। लेकिन नक्सली बुद्धिजीवी 1888 की गौरवपूर्ण क्रांति की मिसाल देना क्यों भूल जाते हैं? जिसमें बिना किसी खून खराबे के सत्ता और सामाजिक परिवर्तन हो गया था। आखिर माओ के देश चीन में नक्सल और माओवाद क्यों नहीं पनपा? चीन से ज्यादा किसी अन्य देश में भी अधिनायकवाद और दवाबतंत्र है? तो नक्सली बुद्धिजीवियों को 1960 के दशक की चीन की सांस्कृतिक क्रांति के बारे में भली भांति शोध कर लेना चाहिए। और नहीं तो जारशाही के बाद लेलिनवाद में कितने लोगों की जानें गईं और फिर स्टालिनवाद में कितने लोगों की जानें गयीं, इसकी संख्या का पता विश्व को चल पाया है? यदि नक्सली बुद्धिजीवियों को इसका पता चल जाए तो वे दुनिया को बताने का कष्ट करेंगे?
अरूंधति रॉय और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों को यह बात क्यों समझ में नहीं आती कि यह भारत का लोकतंत्र ही है, जहां नक्सली मौत का तांडव मचाकर भी जिंदा हैं और अपने पक्ष में तर्क भी पेश कर पा रहे हैं और मिसेज रॉय भी इसी लोकतंत्र में उन हत्यारों की पैरवी कर पा रही हैं। आज जिस लाल क्रांति के समर्थन में वह परिचर्चा आयोजित करके नक्सलियों द्वारा की जा रही हत्या को जायज और न्यायपूर्ण ठहरा रही हैं, इसी भारत में लाल क्रांति बिग्रेड की सत्ता में आने पर, वह सबसे पहले नजरबंद की जाएंगी, उनके भाषण पर पाबंदी लगायी जाएगी। ये नक्सली बुद्धिजीवी तब लोकतंत्र लाने की मांग करने लायक भी नहीं रह जाएंगे। आप व्यवस्था की खामियों को दूर करने के लिए सरकार पर दबाव बनाएं लेकिन नक्सलवाद को सत्ता सौंपने की वकालत किस आधार पर कर सकते हैं।
अरूंधति रॉय अपने भाषण में हमेशा आदिवासियों के कंधे पर बंदूक रखकर नक्सलियों की करतूतों को जायज ठहराती हैं। उनका एक ही शब्द है जो बार-बार अनुगंूजित होता है। नक्सली सशस्त्र संघर्ष करते रहेंगे, यह न्यायप्रिय है। यानी प्रशासन और पुलिस को मारना श्रीमती रॉय की नजरों में न्याय की लड़ाई है। उनके भाषण के हरेक शब्द में विवाद और प्रतिवाद हो सकता है। वे जिन तथ्यों के आधार पर आदिवासियों के नक्सली बनने की बॉलीवुडी स्क्रिप्ट पेश करती हैं, उसमें उनसे ही हजारों सवाल पूछे जा सकते हैं। पहला सवाल यह है कि आप बहुत दिनों से आदिवासियों के कल्याण के लिए कार्य कर रही हैं? क्या आपने आज तक पांच हजार ऐसे आदिवासियों को तैयार किया जो इंजीनियर, डाक्टर, वकील और शिक्षक बन सके हों? क्या आपने इस मिशन पर कभी कार्य किया कि सभी आदिवासियों को शिक्षित कर दें ताकि वे अपने हिस्से का सरकारी आरक्षण का तो उपयोग कर सकें? आजादी के 62 साल बाद भी एसटी और एससी आरक्षण को पूरी तरह नहीं भरा जा सका है। अभी भी 35 से 40 प्रतिशत तक विभिन्न उच्च पदों की सीटें खाली रह जाती हैं। क्या कर रहे हैं आदिवासी कल्याण के नाम पर सरकार से पैसा लेकर एनजीओ चलाने वाले?
अरूंधति राय ने कभी ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया कि जो लोग आदिवासियों के नाम पर सरकार से फंड लेकर उसे हड़पते हैं उनका ही भंडाफोड़ हो। नक्सली बुद्धिजीवी यदि जमीन के असमान वितरण को ही नक्सली आंदोलन की जड़ बताते हैं तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि पश्चिम बंगाल में यह महामारी क्यों फैली है, वहां तो 1980 में ही भूमि सुधार कानून लागू हो गया था। बिहार, झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में भूमि सुधार कानून लागू करने की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन और परिचर्चाएं आयोजित किए जा रहे हैं, लेकिन उस परिचर्चा में कोई भी बुद्धिजीवी यह बोलने या बताने को तैयार नहीं है कि यदि इसे ही आधार माना जाए तो पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद नामक चींटी भी नहीं होनी चाहिए। आखिर क्यों फैल रहा है पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद? इसका जवाब कौन नक्सली बुद्धिजीवी देगा?
क्रांति की वकालत और क्रांति की हकीकत का पता उन पैरोकारों को शायद नहीं है, जो दिल्ली की चुस्त-दुरूस्त कानून व्यवस्था के किले में बैठे हुए क्रांति का बिगुल बजाने या उसका शंखनाद करने के अभियान में जुटे हुए हैं। यदि उन्हें परिचर्चा-बैठक ही करने हैं तो बीजपुर से लेकर बस्तर के जंगलों में करें। उनकी बातें ज्यादा गर्मजोशी से सुनी जाएगी? इससे एक फायदा यह भी होगा कि जिन शहरियों को बुलाकर आप नक्सलवाद की वकालत कर रहे हैं उनमें एक 99 प्रतिशत आपके मत को कूड़े के हवाले कर देता है लेकिन बीजापुर और दंतेवाड़ा में आपको 99 प्रतिशत श्रोता नक्सली आंदोलन का सिपाही मिलेगा। वे आपसे सरकारी नीतियों और उससे लाभ उठाने के तरीकों को भी सीख सकेंगे।
यदि क्रांति की ही करनी है तो व्यवस्था सुधार के क्षेत्र कीजिए। जनता को जगाइए। झारखंड का उदाहरण आपके समक्ष है, जहां पिछले दस वर्षों में नौ सरकारें बन गयीं वह भी आदिवासियों की हित की रक्षा के लिए। क्या हाल है उस राज्य का। नेता लूटेरे बने हुए हैं और जनता उसे ही चुनकर हर बार नई सरकार बनाने और अपने भाग्य की इबारत लिखने के लिए भेज रही है। यदि आदिवासी इतने ही चौकन्ने और सजग होते तो झारखंड में स्थाई सरकार होती जिससे आदिवासी कल्याण के क्षेत्र में नई नीतियां बनाने के लिए मजबूर किया जा सकता था। यहां तो हाल बिल्कुल उल्टा है। अरूंधति राय जैसे बुद्धिजीवियों को नक्सलवाद की वकालत करने से पहले उनको मिले सरकारी अधिकारों को हासिल करने के लिए तैयार करना चाहिए। यदि आदिवासियों की शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया जाए और उन्हें शिक्षित करके इंजीनियर, डाक्टर, वकील और शिक्षक ही बना दिया जाए तो आने वाली पीढ़ी नक्सलवाद को लात मारकर खदेड़ देगी। धैर्य रखिए हिंसा का मार्ग ज्यादा दिनों तक नहीं चलता। ट्रेन यात्रियों और बस यात्रियों की जान लेकर ज्यादा दिनों तक नक्सली आम आदमी के हिमायती होने का ढोंग नहीं कर सकेंगे।
लेखक शशिकान्त सुशांत दैनिक भास्कर और प्रभात खबर दैनिक पत्र में उपसंपादक रहे हैं.

