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[caption id="attachment_2317" align="alignleft" width="99"]समरेन्‍द्रसमरेन्‍द्र [/caption]: रेटिंग के चक्कर में न्यूज चैनल मन-मस्तिष्क कर रहे हैं दूषित : पटक पटक कर मार डाला… भाई-बहन का रिश्ता हुआ शर्मसार… ममता हुई कलंकित… इस तरह की सुर्खियां आजकल हर न्यूज चैनल की पहली हेडलाइन होती है। टीवी खोलते ही इस तरह की खबरें देखकर कई बार बुरी तरह से इरीटेशन होता है. मुझे लगता है कि ऐसा केवल मेरे साथ नहीं बल्कि कइयों के साथ होता है. पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण इसकी वैल्यू को समझता हूं. कई बार ऐसे मौके आए जब इस तरह की खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए मीटिंग में माथापच्ची करनी पड़ती थी. दरअसल यह बात इसलिए भी कर रहा हूं कि मुझे अपने एक संपादक की बात याद आ गई.

समरेन्‍द्र

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: रेटिंग के चक्कर में न्यूज चैनल मन-मस्तिष्क कर रहे हैं दूषित : पटक पटक कर मार डाला… भाई-बहन का रिश्ता हुआ शर्मसार… ममता हुई कलंकित… इस तरह की सुर्खियां आजकल हर न्यूज चैनल की पहली हेडलाइन होती है। टीवी खोलते ही इस तरह की खबरें देखकर कई बार बुरी तरह से इरीटेशन होता है. मुझे लगता है कि ऐसा केवल मेरे साथ नहीं बल्कि कइयों के साथ होता है. पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण इसकी वैल्यू को समझता हूं. कई बार ऐसे मौके आए जब इस तरह की खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए मीटिंग में माथापच्ची करनी पड़ती थी. दरअसल यह बात इसलिए भी कर रहा हूं कि मुझे अपने एक संपादक की बात याद आ गई.

आत्महत्या की एक खबर पर वो सिर्फ इसलिए जोरदार भड़क गए थे कि मेरे सहयोगी रिपोर्टर ने हेडलाइन से लेकर खबर में भी दो-तीन जगह ‘सल्फास खाकर युवक ने खुदकुशी की’, लिख दी थी. पहले तो इतनी छोटी सी भूल के लिए इतने जोरदार गुस्से के लिए हम लोगों ने उन्हें काफी कोसा था. उनका कहना था कि जहर खाकर आत्महत्या लिखना काफी है, क्यों हम लोगों को आत्महत्या वाली दवाइयों का नाम प्रचारित कर रहे हैं. अब उनकी बात को याद करके लगता है कि हम खबरों को सनसनीखेज बनाने के चक्कर में क्या क्या गलती करते हैं.

मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति या समुदाय का कोई भी कदम विचारधारा की परिणिति होती है. विचारधारा समाज और इसमें होने वाली घटनाओं को महत्व देने से बनती है. हम अक्सर देखते हैं कि किसी हादसे या घटना के पक्ष-विपक्ष में होने वाली प्रतिक्रया को जनभावना के रूप में प्रचारित किया जाता है. लेकिन वास्तव में ये जनभावनाएं नहीं होती. इसमें कुछ ऐसी विचारधारा होती है, जो कहीं कहीं से बायस्ड होती है. जिसका परिणाम हर उस व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, जो इससे प्रभावित हुआ है. बार-बार इस तरह की घटनाओं के सुनने या देखने से यह भी लगता है कि लोगों ने इस ढ़ंग से अपनी तकलीफ या समस्या को कम करने की कोशिश की थी, भले ही वे सफल हुए या नहीं,  इससे उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता. आपने देखा होगा कि मीडिया में किसी घटना के जरूरत से ज्यादा प्रचारित होने पर आसपास या कहीं और उसकी पुनरावृत्ति होती है.

कुल मिलाकर मेरा कहना है कि टीआरपी के चक्कर में हम लोगों के मन मस्तिष्‍क को किस तरह दूषित कर रहे हैं,  इसका भी ध्यान रखना चाहिए. केवल साप्ताहिक रेटिंग के लिए हम अपने दायित्वों और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों न भूलें तो हम एक अच्छा वातावरण बना सकते हैं. नेशनल चैनल में तो फिर भी स्थिति थोड़ी ठीक है, लेकिन रीजनल चैनलों ने पूरी सीमाएं ही लांघ दी हैं. वहां बैठे वरिष्ठ संपादक और अनुभवी लो यह भी भूल जाते हैं कि उनके चैनल को घर परिवार में छोटे से लेकर बड़े बुजुर्ग भी देखते हैं. टिकर और ब्रेकिंग खबरें तो ऐसी चलती हैं, जैसे अपराध नहीं हुए तो चैनल बंद हो जाएगा.

मेरा यह भी नहीं कहना है कि चैनल को गुडी-गुडी होना चाहिए, लेकिन लोगों के पास ढेरों समस्याएं है, उनका निराकरण कर गैरजिम्‍म्‍ेदार लोगों को बेनकाब किया जा सकता है. समाज में ज्यादा से ज्यादा अच्छाई लाने और बुराइयों को खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए. न कि गलत कामों को इस तरह पेश किया जाए कि लोग उसकी तरफ आकर्षित हों. हम ऐसे लोगों को सामने लाने से सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं, क्योंकि वे लोग प्रभावशाली होते हैं. मेरा कहना है कि प्रभावशाली और दबंग लोगों की असलियत सामने लाकर भी टीआरपी बढ़ायी जा सकती है.

लेखक समरेंद्र रायपुर के निवासी हैं.

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