
ओम थानवी
नोबेल पुरस्कार पाने वाले स्वीडी कथाकार पेर लागरक्विस्त की उपन्यास-त्रयी के नायाब अनुवाद (बाद में ‘महायात्रा’ नाम से एक साथ प्रकाशित) के अंश उन्होंने हमें दिए। युगोस्लाविया यात्रा का लंबा संस्मरण खास तौर पर लिखा। एक दफा मैंने उनसे जिक्र किया कि स्त्री-समाज की समस्याओं पर अच्छी सामग्री नहीं मिल पाती। मेरा खयाल है, इस हवाले से शायद उन्हीं ने बाद में इला डालमिया को हमारे लिए नियमित स्तंम्भ लिखने को प्रेरित किया होगा।
ऐसे लेखक भी थे जिन्हें मैं पत्र पर पत्र लिखता, पर उनसे जवाब तक नहीं मिलता था। जबकि रघुवीर सहाय, गिरधर राठी, नंदकिशोर आचार्य, ऋतुराज, प्रयाग शुक्ल, रमेशचंद्र शाह, बनवारी, राजकिशोर आदि अनेक लेखकों से खूब सहयोग मिला। पर अज्ञेय का स्नेह अपूर्व और अपरिमेय था।
धीरे-धीरे उनसे काफी खुल गया। मेरी झिझक जाती रही। वे हंसी-मजाक करने लगे। मेरी भाषा की अशुद्धियों पर भी इशारे से ध्यान दिलाते थे। मसलन, राजस्थानी के असर में मैं पता चला को ‘पत्ता पड़ा’ बोलता था। वे मौका देखकर अशुद्ध उच्चारण ठीक मेरे अंदाज में दुहराते और मुझे, देर-सबेर, भूल समझ आ जाती।
उनसे संपर्क बढ़ता गया। राजस्थान पत्रिका में मेरे एक सहयोगी महेश शर्मा ने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। उनके संस्मरण प्रौढ़ शिक्षण समिति ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। यात्रा संस्मरण के लोकार्पण के लिए यायावर अज्ञेय से अच्छा नाम नहीं सूझा। सुधेंदु पटेल के साथ- जो तब समिति से जुड़े थे- दिल्ली आकर हमने वात्स्यायनजी से गुजारिश की। उन्होंने हमें कालाजाम खिलाए और मान गए।
एक रोज पहले फोन कर मैंने उनसे पूछा कि किस उड़ान से जयपुर पहुंचेंगे? बोले- प्रौढ़ शिक्षा का काम करने वाली संस्था पर विमान का बोझ क्यों? बस का भाड़ा मैं वहन कर सकता हूं और कल सुबह राजस्थान रोडवेज की दस बजे की बस से आऊंगा। ठहरने का बंदोबस्त करने की जरूरत भी नहीं है, दयाकृष्णजी ने विश्वविद्यालय में कमरा करा दिया है। यानी हमारे जिम्मे कोई काम नहीं छूटा था, सिवाय आयोजन के कार्ड बांटने के। कार्यक्रम हुआ। इतना सफल कि किसी लोकार्पण में इतनी भीड़ मैंने उसके पहले या बाद में जयपुर में नहीं देखी।
जयपुर वे कई बार आए। जैसे बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर भी। एक दफा इला जी साथ थीं। वे रघुवीर सहाय के बेटे वसंत को भी साथ लाए। इला जी ने कहा, ये आपके साथ जयपुर घूमेंगे। मेरे पास तब मोटरसाइकिल होती थी। उसी पर घूम आए।
लेकिन अगली दफा मुश्किल पेश आई। वात्स्यायनजी ने कहा, सुबह बड़े तड़के की उड़ान है। आप छोड़ आएंगे? तपाक से बोला, क्यों नहीं! बाद में सोचता रहा, निकट के किसी मित्र के पास कार नहीं है! वात्स्यायनजी के पास सामान भी है! हिम्मत कर दफ्तर में बात की। गाड़ी का बंदोबस्त हो गया। सुबह चार बजे देखता हूं, अखबारों के बंडलों से भरी एक जीप-नुमा ‘ट्रेकर’ गाड़ी सामने खड़ी है। बस, आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट खाली थी। कोई चारा न देख वात्स्यायनजी को आगे बिठाया, पीछे अखबारों और सामान के बीच खुद लदकर किसी तरह हवाई अड्डे पहुंचा आया!
जयपुर एक बार वे रायकृष्ण दास व्याख्यानमाला के आयोजन के लिए आए। व्याख्यान नरेश मेहता, आनंद कृष्ण और भूमित्र देव ने दिए। जयपुर के प्रसिद्ध चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय से उन्होंने उद्घाटन का आग्रह किया। उनसे उनका पुराना परिचय था। फिर भी चाहते थे निमंत्रण घर जाकर दें। मैं साथ गया। दोनों जाने कितने बरसों बाद मिले होंगे। वात्स्यायनजी ने मिलते ही कहा- आपने पहचाना? विजयवर्गीयजी ने बड़े छायावादी अंदाज में जवाब दिया- कोई सूरज की रोशनी न देख सके तो उसी का दोष होगा। सारी दुनिया आपको जानती है। मैं जानते हुए न पहचानूं, क्या यह संभव है?
वहां आधुनिक कविता पर बात चल पड़ी। एक मोड़ पर अज्ञेय ने कहा, आज की कविता में कविता कम है, वह प्रकारांतर से ‘‘लंगड़ा गद्य’’ ही है!
1987 में वात्स्यायनजी की मृत्यु हुई तब ‘इतवारी’ का एक विशेष अंक मैंने उनकी स्मृति को समर्पित किया। रघुवीर सहाय, गिरिराज किशोर, पंकज आदि कई लेखकों के साथ रामगोपाल विजयवर्गीय ने भी उसमें एक मार्मिक संस्मरण लिखा। एक प्रसंग उन्होंने ‘अज्ञेय’ के प्रसिद्ध ‘मौन’ पर मुझे व्यक्तिश: सुनाया। कहीं कोई कला प्रदर्शनी साथ-साथ देखते हुए अज्ञेय और रायकृष्ण दास में घंटों कोई बात नहीं हुई। बेचैन होकर विजयवर्गीयजी ने इसका सबब पूछ लिया। अज्ञेय तब भी चुप रहे, पर रायकृष्ण दास जी ने जवाब दिया- हमारी बातचीत तो लगातार होती रही थी, आप ही नहीं सुन पाए! यानी, आपसी समझ रखने वालों को शब्दों की फिजूलखर्ची की जरूरत कहां पड़ती है!
अज्ञेय के साथ जो यात्राएं कीं, उनमें माउंट आबू और उदयपुर-नाथद्वारा की याद ताजा है। फरवरी 1982 की बात है। माउंट आबू में वत्सल निधि का शिविर प्रौढ़ शिक्षण समिति के संदर्भ केंद्र के जरिए आयोजित हुआ। दुर्गा भागवत से लेकर विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रामस्वरूप चतुर्वेदी आदि अनेक लेखक-आलोचक वात्स्यायनजी के बुलावे पर राजस्थान आए। गोष्ठियों की कार्यवाही तो सब जगह एक-सी चलती है। जो अलग से याद है, वह उनका बोलना नहीं, दत्तचित्त सुनना!
वे ढलान पर बनी कुटिया में ठहरे। आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने उनसे दिल्ली में मिलने का समय मांगा था। वात्स्यायनजी को राजस्थान का भूगोल बेहतर मालूम था। उन्होंने पत्र लिखा कि मैं माउंट आबू जा रहा हूं, जो आपके सिरोही जिले में ही पड़ता है। आप वहां आ जाएं तो यात्रा का कष्ट बचेगा। बोहराजी आए और एक शाम एलियट पर अपनी किताब का वह हिस्सा वात्स्यायनजी को सुनाने लगे। शब्द-दर-शब्द।
शालीन और विद्वान बोहराजी से तब तक मेरा परिचय नहीं था। वात्स्यायनजी होठों पर दोनों हाथ की तर्जनी रखे गौर से सुन रहे थे। न घड़ी की तरफ देखा, न मेरी तरफ। इला जी उस वक्त हवाई चप्पल खरीदने गई हुई थीं। वहां होतीं तो शायद कुछ बोलतीं। दशा देखकर मुझे कोफ्त हुई। पूरा अध्याय सुनाकर बोहराजी ने वात्स्यायनजी की ओर देखा। अज्ञेय पर एलियट के प्रभाव और समभाव की उन्होंने लंबी और बारीक व्याख्या की थी। वात्स्यायनजी ने मुस्करा कर गर्दन एक तरफ लचकाते हुए इतना ही कहा- ‘देयर इज नथिंग अनफेयर इन इट!’ और आदर के साथ उन्हें विदा दी। बोहराजी के जाने के बाद मैंने छेड़ की, आपकी हालत उन्होंने पस्त कर दी! वे सहज थे- (इनका) बरसों का परिश्रम है। सुनाना चाहते थे; सो सुना!
इस दर्जे का धैर्यवान और सहृदय श्रोता मैंने दूसरा नहीं देखा।
मजे की बात यह है कि बोहराजी के परिश्रम की वात्स्यायनजी ने कद्र की। पर वह किताब छपी ही नहीं। पच्चीस साल बाद कभी यह प्रसंग मुझे अचानक खयाल आया। वाणी प्रकाशन ने उसे अब प्रकाशित किया है।
लेखक ओम थानवी वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक हैं.

