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दूसरा बिहार बनने की राह पर मध्‍य प्रदेश

शिवराज चौहान : कैसा स्‍वर्णिम प्रदेश बना रहे हैं शिवराज :  डरे हुए मुख्यमंत्री से यह उम्मीद बेमानी होगी कि वो प्रदेश की जनता को भय और भूख से निजात दिला सकेंगे : सुनकर आश्चर्य होता है। हो भी क्यों ना, इसलिए कि बात मुख्यमंत्री की है। एक ऐसे मुख्यमंत्री की जिसे मध्यप्रदेश के लोग तुर्क नेता के नाम से जानते हैं। जी हां, बात हो रही है शिवराज सिंह चौहान की। जो भाजपा की स्टार प्रचारक उमा भारती की गुरूआई राजनीति की चमक को धूमिल कर, अपने दम पर मध्यप्रदेश में दुबारा भाजपा की ताजपोशी की। प्रदेश की जनता ने जिस व्यक्ति को सदन में बहुमत की ताकत दी हो, वह व्यक्ति मुख्यमंत्री होकर भी अपने प्रदेश के भूमाफिया से डरे, बात हजम नहीं होती। लेकिन यही सच है। इस सच को शिवराज सिंह चौहान स्वयं बयां कर चुके हैं। यह अलग बात है कि नेताओ की तरह राजनीतिक नौटंकी कर मुकर गये। लेकिन उनके मुकरने से क्या होता है। राजनीति में तो जो एक बार मुख से निकल गया वही ब्रम्ह वाक्‍य होता है। इस समय शिवराज सिंह चौहान डरे हुए हैं। सहमें हुए है। सदमें में हैं। दहशतजदा हैं।

शिवराज चौहान

शिवराज चौहान : कैसा स्‍वर्णिम प्रदेश बना रहे हैं शिवराज :  डरे हुए मुख्यमंत्री से यह उम्मीद बेमानी होगी कि वो प्रदेश की जनता को भय और भूख से निजात दिला सकेंगे : सुनकर आश्चर्य होता है। हो भी क्यों ना, इसलिए कि बात मुख्यमंत्री की है। एक ऐसे मुख्यमंत्री की जिसे मध्यप्रदेश के लोग तुर्क नेता के नाम से जानते हैं। जी हां, बात हो रही है शिवराज सिंह चौहान की। जो भाजपा की स्टार प्रचारक उमा भारती की गुरूआई राजनीति की चमक को धूमिल कर, अपने दम पर मध्यप्रदेश में दुबारा भाजपा की ताजपोशी की। प्रदेश की जनता ने जिस व्यक्ति को सदन में बहुमत की ताकत दी हो, वह व्यक्ति मुख्यमंत्री होकर भी अपने प्रदेश के भूमाफिया से डरे, बात हजम नहीं होती। लेकिन यही सच है। इस सच को शिवराज सिंह चौहान स्वयं बयां कर चुके हैं। यह अलग बात है कि नेताओ की तरह राजनीतिक नौटंकी कर मुकर गये। लेकिन उनके मुकरने से क्या होता है। राजनीति में तो जो एक बार मुख से निकल गया वही ब्रम्ह वाक्‍य होता है। इस समय शिवराज सिंह चौहान डरे हुए हैं। सहमें हुए है। सदमें में हैं। दहशतजदा हैं।

सवाल यह है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री जब भूमाफिया की वजह से अंदर तक डरा गया है, तो फिर झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों का क्या हाल होगा, भाजपा के राम को भी पता नहीं? डरता तो हर आम व्यक्ति है। लेकिन प्रदेश के मुखिया का डरना हैरानी वाली बात है। शिवराज सिंह डर गये, यानी प्रदेश की भाजपा डर गई। समझ में नही आता कि मुख्यमंत्री किस तरह के शिव हैं। उनके राज में भूमाफियाओं का बोल बाला है। और भूमाफियाओं से बचने के लिए शिवराज कभी भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा का सहारा लेते हैं और कभी प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार का।

क्या शिव इतने सक्षम नहीं है कि वो माफियाओं को सलाखों के पीछे डाल सकें! सवाल यह है कि भूमाफिया को दुलारते समय उन्हें इस बात का भान नहीं था क्या, कि एक दिन यही भूमाफिया उनके लिए भस्मासुर बन जायेगा? अब जब भस्मासुर उनके पीछे पड़ ही गया है तो क्या प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा या फिर अनंत कुमार उन्हें भस्म होने से बचा लेगें? शिवराज जी यह कलयुग की राजनीति है। यहां हर चाल एक बार उलटी ही पड़ती है।

27 नवंबर 2005 को भाजपा कार्यालय के सामने उमा भारती चीख-चीख कर कह रही थी प्रदेश में पैसों के दम पर मुख्यमंत्री बदला जा रहा है। उस वक्त भाजपा कार्यालय के अंदर आप की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी हो रही थी। चार साल बाद वही बात अब आप कह रहे हैं कि उन्हें हटाने के लिए भूमाफिया चंदा एकत्र कर रहे हैं। भाजपा का मंच तो वही है जो कल था, केवल समय बदला है। चेहरा बदला है। दोस्त बदले हैं। दुश्मन बदले हैं। राजनीति वही है। केवल उसकी धार बदली है।

पिछले दिनों मै अपने घर इलाहाबाद गया हुआ था। वहां मेरे पत्रकार मित्रों ने हंसते हुए पूछा, ‘क्या बात है भाई, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भूमाफिया से डरते हैं। बहुत डरपोक है? खाते पीते नहीं क्या? उनमें दम नहीं है भूमाफिया से लड़ने की! हमारे प्रदेश की मुख्यमंत्री को देखो, उनसे तो भूमाफिया क्या केन्द्र सरकार तक डरती है। मुलायम सिंह यादव तक कुछ नहीं कर पाये। उन्‍होंने तो अच्छे अच्छे राजाओं की और गुंडों की गुंडई निकाल कर रख दी। काननू तक से नहीं डरती। भई समझ में नहीं आता कि किस तरह के शिवराज हैं। सुनते हैं कि शिव तो भूतों से भी नहीं डरते हैं। भूत ही उनके साथ रहते हैं। एक शिव भाजपा के हैं जो भूमाफिया से डरने लगे हैं।’ चौंकाने वाली बात है कि मुख्यमंत्री भूमाफिया से डरते हैं और स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने की बात करते हैं। काहे का स्वर्णिम मध्यप्रदेश। जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री भूमाफिया से डरते फिर रहे हों। वो भला प्रदेश के अन्य अपराधियों से कैसे निपटेंगे। विपक्ष के सवालों का जवाब कैसे देगें। नक्सलियों से कैसे लड़ेंगे। भ्रष्टाचारियों से कैसे निपटेंगे। तस्करों पर नकेल कैसे लगायेंगे। कानून का राज कैसे स्थापित करेंगे।

सच तो यह है कि जिस प्रदेश के आईएएस अधिकारियों के घरों में बिस्तर से करोड़ो रूपये निकलते हों, उस राज्य में तो भ्रष्टाचार से लड़ने की बात बेमानी है। शिवराज सिंह चौहान स्वयं भ्रष्टाचार के मामले में फंसे हुए है। लोकायुक्त के घेरे में हैं। वो डंपर घोटाले में फंसे हुए है। उनके मंत्रिगण भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। भाजपा के विधायक धड़ल्ले से रिश्वत लेते हैं। शिवपुरी जिले के करैरा विधानसभा के भाजपा विधायक रमेश खटीक इंजीनियरिंग कॉलेज खुलवाने के लिए रिश्वत लेते सीडी में कैद किये गये हैं। इसम मामले पर भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा कह रहे हैं कि यह झूठ है, भाजपा विधायक को बदनाम करने की साजिश है। सीडी की जांच कराई जायेगी। जांच के बाद ही कुछ  कहा जा सकता है। जबकि सीडी में विधायक खटीक को नोट गिनते दिख रहे हैं।

इधर, रीवां जिले के सेमरिया विधान सभा के भाजपा विधायक अभय मिश्रा पर सपा नेता महाराजा पुष्पराज सिंह ने आरोप लगाया है कि किले से उनकी माता स्व. राय प्रवीण की रिवाल्वर  बनने गई थी, जो बाद में गुम हो गई। गुम हो जाने की रिपोर्ट सिटी कोतवाली थाने में दर्ज कराई गई थी और जिस नंबर की रिवाल्वर अभय मिश्रा ने रीवां संभाग के संगठन मंत्री संजीव कांकर को दी है, वो महारानी स्व.राय प्रवीण की है। मामले की जांच पुलिस कर रही है। यानी अब भाजपा नेता कोई काम करने से नहीं हिचक रहे हैं।

भूमाफिया, शराब माफिया और खनिज माफियओं के तो पौं बारह हैं। इसके साथ प्रदेश के भ्रष्ट अफसरों की निकल पड़ी है, वे चांदी काट रहे हैं। अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। शिवराज का मध्यप्रदेश दूसरा बिहार बनने की दिशा में अग्रसर है। पिछले 16 माह में प्रदेश में दो दर्जन से अधिक साम्प्रदायिक दंगे और 245 दिन में 1889 रेप हुए। महिलाओं की आबरू खतरे में है। तीन माह में 432 हत्यायें। चोरी की वारदात पचास हजार से ऊपर और सड़क हादसे एक लाख से अधिक। विंध्य क्षेत्र को अब तक डकैतों से मुक्त नहीं कर पाये। प्रदेश में नक्सली मूवमेंट बढ़ता जा रहा है। जनता प्रदेश के भाजपा विधायक से लेकर मंत्रियों से बेहद नाराज। प्रदेश में नगर निगम के एक अदना से सब इंजीनियर के घर से करोड़ों रूपए निकल रहे हैं। बड़ों की बात क्या करें! काम होता नहीं फिर भी करोड़ों रूपए फुर्र हो जाते हैं। बालाघाट और पन्ना जले में 15.21 करोड़ रूपए की राहत राशि का अनियमित भुगतान कर दिया गया। विजयाराजे जननी कल्याण योजना से सरकार को पांच करोड़ से अधिक की क्षति हुई है। वहीं विभिन्न विभागों में अनियमितता के चलते 153 करोड़ का घोटाला सामने आया है।

इससे इनकार नहीं है कि प्रदेश में घोटाले और भ्रष्टाचार चरम पर है। तभी तो भाजपा के विधायक विश्वास सारंग को विधाना सभा में अपनी ही सरकार के खिलाफ बोलना पड़ा। उन्होंने कहा कि 108 एम्बुलेंस सेवा की खरीदी में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है। शासन के कोष से करोड़ों रूपए की वित्तीय अनियमितताएं हुई है। सारंग ने दस करोड़ से अधिक की राशि के हस्तांतरण शासन की जानकारी के बगैर करने का अरोप लगाया। इस पर संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने उन्हें रोका भी। लेकिन क्या करें भाजपा विधायक सारंग आखिर उन्हें भी तो अपने विधान सभा के लोगों को जवाब देना है। अस्पतालों में दवाएं नहीं मिल रही है। महिलायें प्रसव के लिए भटक रही है। अस्पताल के बाहर ही प्रसव हो जाता है।

सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे ही स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनता है? भाजपा के हाईकमान की नजर में शिवराज सिंह बेहतर मुख्यमंत्री हो सकते हैं। लेकिन सच तो यही है कि खुद डरे हुए मुख्यमंत्री से यह उम्मीद बेमानी होगी कि वो प्रदेश की जनता को भय और भूख से निजात दिला सकेंगे। शिवराज सिंह चौहान इस समय अपना आपा खो दिये है। तभी तो उज्जैन में नगर निगम के महापौर के चुनाव के समय रोड शो में कहते हैं,‘ मैं आप लोगों के लिए अपनी जान दे दूंगा।’ सवाल यह उठता है कि आखिर जनता के लिए मुख्यमंत्री अपनी जान देने के लिए क्यों उतारू है।

क्या उन्हें भूमाफिया के अलावा अपनी कुर्सी के छिन जाने का डर सता रहा है। कुर्सी छिन भी जायेगी तो राजनीति तो नहीं चली जायेगी। राजनीति के माध्यम से जनसेवा कर सकते है? बहरहाल, शिव अकेले भूमाफिया से नहीं उमा भवानी (भारती) से भी डरे हुए हैं। उनके आने की खबर ने न केवल सत्ता बल्कि संगठन की जमीन को भी हिला दिया है। वैसे भी मध्यप्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्रियों का इतिहास रहा है कि वो कभी भी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके हैं। वो चाहे वीरेन्द्र कुमार सखलेचा हों या फिर सुन्दरलाल पटवा, उमा भारती अथवा बाबूलाल गौर।  भय और दहशत के सियासी मंदिर में बैठकर तो घंटी भी नहीं हिलाई जा सकती। और शिवराज यही कर रहे हैं। अच्छा होता कि जिस तरह स्वास्थ्य मंत्री नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देकर अपनी सियासत के माथे पर लगे कालिख को धोने का प्रयास किया, उसी तरह शिवराज भी करते। फिर न भय सताता और न ही जान देने की बात आती।

लेखक रमेश कुमार रिपु वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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