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आखिर कब सुलझेगी अयोध्‍या की गुत्‍थी ?

[caption id="attachment_2339" align="alignleft" width="85"]राघवेन्‍द्र सिंहराघवेन्‍द्र[/caption]: सत्‍ता लोलुप नेताओं को इंतजार है दूसरे भूचाल का! : पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी : 6 दिसम्बर, 1992 एक ऐसा दुर्भाग्यशाली दिन, जिस दिन धार्मिक विद्वेष का ऐसा गुबार उठा कि संख्या बल के समक्ष अयोध्या के विवादित धार्मिक स्थल को समाप्त होना पड़ा। विवादित ढॉचा ध्वस्त हो गया, परन्तु अभी भी यक्ष प्रश्न है ऐसी स्थिति आयी कैसे। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को आधार मानने वाला, सर्व धर्म समभाव की सुखद कल्पना लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से गौरव की अनुभूति करने वाला, ‘अहिंसा परमो धर्मा’ का मूल वैचारिक सहिष्णु कहलाने वाला हिन्दू समाज अचानक आक्रामक कैसे हो गया। गंगा-जमुनी संस्कृति का निर्मल जल रक्तरंजित किन परिस्थितियों में हुआ। आपसी एकता के माध्यम से गुलामी की जंजीर तोड़ने वाले एक दूसरे से क्यों भय खाने लगे, विचारणीय है?

राघवेन्‍द्र सिंह

राघवेन्‍द्र सिंह

राघवेन्‍द्र

: सत्‍ता लोलुप नेताओं को इंतजार है दूसरे भूचाल का! : पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी : 6 दिसम्बर, 1992 एक ऐसा दुर्भाग्यशाली दिन, जिस दिन धार्मिक विद्वेष का ऐसा गुबार उठा कि संख्या बल के समक्ष अयोध्या के विवादित धार्मिक स्थल को समाप्त होना पड़ा। विवादित ढॉचा ध्वस्त हो गया, परन्तु अभी भी यक्ष प्रश्न है ऐसी स्थिति आयी कैसे। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को आधार मानने वाला, सर्व धर्म समभाव की सुखद कल्पना लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से गौरव की अनुभूति करने वाला, ‘अहिंसा परमो धर्मा’ का मूल वैचारिक सहिष्णु कहलाने वाला हिन्दू समाज अचानक आक्रामक कैसे हो गया। गंगा-जमुनी संस्कृति का निर्मल जल रक्तरंजित किन परिस्थितियों में हुआ। आपसी एकता के माध्यम से गुलामी की जंजीर तोड़ने वाले एक दूसरे से क्यों भय खाने लगे, विचारणीय है?

यदि हम अपने इतिहास पर गौर करे तो पायेगें कि 1847 से 1857 के बीच नवाब वाजिद अली शाह ने अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के झगड़े को समाप्त करने के लिए प्रयास किए। उन्‍होंने कई सदस्यीय समिति का गठन किया, जिसमें एक हिन्दू एक मुसलमान तथा एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सदस्य निष्पक्ष की भूमिका में था। जिस समिति ने उक्त स्थल के बारें में बताया ‘मीर बकी ने किसी भवन की तोड़कर इसे बनवाया था, क्योंकि इस पर साफ तौर पर लिखा है- यह फरिश्तों के अवतरण का स्थल है। इसमें भवन का मलवा भी लगा है।’

1857 के समय अमीर अली तथा बहादुर शाह जफर ने फरमान जारी किया, जिसके अनुसार ‘हिन्दुओं के खुदा रामचन्द्र जी की पैदाइश की जगह जो बाबारी मस्जिद बनी है, वह हिन्दुओं को बाखुशी सौंप दी जाए, क्योंकि हिन्दु मुसलमान ना इन्तफाकी की सबसे बड़ी जड़ यही है।’ सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ 36 पर कर्नल मार्टिन ने लिखा है- ‘अयोध्या की बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं को (मुसलमानों द्वारा) वापस देने की खबर से हममें (अंग्रेजो में) घबराहट फैल गयी और यह लगने लगा कि हिन्दुस्तान से अंग्रेज खत्म हो जायेंगे।’

1857 की क्रान्ति असफल होने के बाद अंग्रेजो ने 18 मार्च, 1858 में कुबेर टीला में इमली के पेड़ पर अमीर अली तथा बाबा राम चरण दास को हजारों हिन्दुओं तथा मुसलमानो के समाने फांसी दे दी। इस सन्दर्भ में मार्टिन लिखते हैं- ‘जिसके बाद फैजाबाद में बलवाइयों की कमर टूट गयी और तमाम फैजाबाद जिले में हमारा रौब गालिब हो गया। इस प्रकार राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद समाप्त होते होते रह गया।’ कुछ राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठनों ने भी सितम्बर 1992 में विवादित स्थल को 10 किमी. दूर ले जाने का प्रस्ताव रखा, परन्तु धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी सरकार तक इनकी आवाज नहीं पहुंची।

मुस्लिम समाज के साहित्यकारों ने भी उक्त विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान माना। अबुल फलज 1598 ई. में अकबर नामा/अइना-ए-अकबरी में उस स्थान को राम का निवास स्थान बताया। 1856 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक हदीका-ए-शहदा के पृष्ठ 4-7 के अनुसार, ‘मथुरा-बनारस-अवध की मस्जिदें, मंदिरों को तोड़कर बनायी गयी थी।’ 1878 ई. में हाजी मो. हसन ने अपनी पुस्तक जिया-ए-अख्तर के पृष्ठ 38-39 में राजा रामचन्द्र के महल सराय और सीता की रसोई को तुड़वाना वर्णित किया है।

1885 ई. में मौलवी अब्दुल करीम की पुस्तक गुलगस्ते हालात-ए-अयोध्या अवध के अनुसार- ‘जन्म स्थान और सीता रसोई भवनों को तोड़कर उस स्थान पर बाबर बादशाह ने एक मस्जिद बनवायी।’ 1909 के अल्लामा मो. जनमुलगानी खॉ रामपुरी की पुस्तक तारीखे-ए-अवध के अनुसार भी बाबर ने जन्म स्थान को मिस्मार करके मस्जिद बनवायी। 1785 ई. में आस्ट्रेलिया के जेसुइट पादरी जोसेफ टीफेनथेलर, जो 1766 से 1771 तक अवध में रहे और जिनकी पुस्तक के पृष्ठ 252-254 का अनुवाद श्री शेर सिंह आईएएस ने किया, उसमें भी एक किले, जिसे राम कोट कहते थे, को गिराकर गुम्‍बदों वाली मस्जिद बनवाने का जिक्र है।

इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डिया-सर्जन जनरल एडवर्ड वेलफेयर (1858) के अनुसार भी हिन्दुओं के कम से कम तीन पवित्र स्थलों पर मस्जिद बनवाने को जिक्र है, जिसमें राम जन्म भूमि शामिल है। 1880 ई. की फैजाबाद समझौता रिपोर्ट में भी बाबर द्वारा 1528 में राम जन्म भूमि पर जिसे तोड़ मस्जिद का निर्माण बताया गया। 1881 की फैजाबाद के इम्पीरियल गजट में भी मुसलमानों द्वारा तीन मस्जिदें बनवाये जाने का जिक्र है। जो जन्म स्थान, त्रेता ठाकुर तथा स्वर्ग द्वार है। इसी प्रकार फाइजाबाद (फैजाबाद) गजेटियर ग्रन्थ गप्‍ट एचआर नेविल के अनुसार (1928 ई.) भी 1525 में बाबर का 7 दिन अयोध्या में रूक कर प्रचीन मंदिरों के ध्वस्तीकरण एवं मस्जिद के निर्माण का जिक्र है। जो पृष्ठ 155 पर अंकित है। 1902 के बाराबंकी जिला गजेटियर के एक रिपोर्ट में एचआर नेविल ने भी जन्म स्थान का जिक्र एवं विवाद की बात स्वीकार की।

इसी प्रकार मुस्लिम शायरों तथा विद्वानों ने विवादित स्थल पर राम मंदिर की बात स्वीकारी है। अबुल फजल मुगल काल के एक लेखक थे। जिन्‍होंने आइना-ए-अकबरी में अवध (अयोध्या) को महापुरूष राम की निवास स्थान बताया। ‘औरंगजेब आलमगीर’ में स्पष्ट (पृष्ठ संख्या 623-630) रूप से विस्तार को दिया गया है- ‘काफिरों (हिन्दुओं) ने इस स्थान (राम जन्म भूमि) की मुक्ति के लिए 30 बार आक्रमण किये। 1664 ई. में ऐसे ही किये गये आक्रमण में दस हजार हिन्दू हताहत हुए।’

सहीफा-ए-नसैर बहादुर शाही (1700-1800), यह पुस्तक औरंगजेब की पौत्री तथा बहादुर शाह जफर की पुत्री बंगारू अमातुज्ज-जोहर द्वारा लिखी है। जिसके अनुसार (पृष्ठ 4-7)- ‘मथुरा, बनारस और अवध (अयोध्या) में काफिरों (हिन्‍दुओं) के इबादतगाह हैं, जिन्हें वे गुनहगार व काफिर कन्हैया की पैदाइशखाना, सीता की रसोई व हनुमान की यादगार मानते हैं। इसके बारे में हिन्दू मानते है कि यह रामचन्द्र ने लंका पर फतह हासिल करने के बाद बनवाया था। इस्लाम की ताकत के आगे यह सब नेस्तनाबूद कर दिया गया और इन सब मुकामों पर मस्जिद तामीर कर दी गयी। बादशाहों को चाहिए कि वे मजिस्दों को जुमे की नवाज से महरूम न रखे, बल्कि यह लाजमी कर दिया जाय कि वहां बुता की इबातद न हो, शंख की आवाज मुसलमानों के कानों में न पहुंचे।’

बाबरी मस्जिद का विवरण पुस्तक के नवे अध्याय, जिसका शीर्षक ‘वाजिद अली और उनका अहद’ में लिखा है- ‘पहले वक्‍तों के सुल्तानों ने इस्लाम की बेहतरी के लिए और कुफ्र को दबाने के लिए काम किये। इस तरह फैजाबाद और अवध (अयोध्या) को भी कुफ्र से छुटकारा दिलाया गया। अवध में एक बहुत बड़ी इबादतगाह थी और राम के वालिद की राजधानी थी, जहां एक बड़ा सा मन्दिर बना हुआ था। वहां एक मजिस्द तामीर करा दी गयी। जन्म स्थान का मंदिर राम की पैदाइशगाह थी, जिसके बराबर में सीता की रसोई थी। सीता राम की बीबी का नाम था। उसी जगह पर बाबर बादशाह ने मूसा आसिकान की निगहबानी में एक सर बुलन्द मस्जिद तामीर करायी। वह मस्जिद आज भी सीता पाक (सीता की रसोई) के नाम से जानी जाती है।’

न्यायिक व्यवस्था के अनुसार भी सन् 1885 में फैजाबाद जिले के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने एक नागरिक अपील संख्या 27 में कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद का निर्माण हिन्दुओं के एक पवित्र स्थल पर भवन तोड़कर किया गया है, चूंकि यह घटना 356 वर्ष पूर्व की है, इसलिए अब इसमें कुछ करना कठिन है।’

अयोध्या के उक्त विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर पिछले 60 वर्षों से चल रही सुनवाई लखनऊ उच्च न्यायालय में 26 जुलाई को पूरी हो गयी। जिसका कि फैसला मध्य सितम्बर में आने की पूरी सम्भावना है। इस सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एसयू खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की विशेष पीठ ने 27 जुलाई, 2010 को दोनो पक्षों  के अधिवक्ताओं को सिविल संहिता प्रक्रिया की धारा-89 के तहत बुलाकर समाधान के विषय पर बातचीत की, परन्तु दुर्भाग्यवश सार्थक हल नहीं निकला। उक्त पीठ ने दोनो पक्षों से विवाद के हल के सन्दर्भ में प्रयास जारी रखने का निर्देश देते हुए कहा, ‘यदि उस विषय पर कोई सार्थक सम्भावना दिखती है तो विशेष कार्याधिकारी को सूचित करें। यदि उच्च न्यायालय का उक्त प्रयास सफल होता है तो बहुत शुभ, नहीं तो हिन्दू तथा मुसलमान दोनो वर्गों को चाहिए मध्य सितम्बर में उक्त विवाद के सन्दर्भ में न्यायलय द्वारा यदि कोई निर्णय आता है तो उसका सम्मान करें।’

इस बात को कोई नकार नहीं सकता लगभग ढाई हजार वर्षों से विदेशी आक्रांता भारत को लूटते और तोड़ते-फोड़ते रहे, उनमें से बाबर भी एक था। जिसने भारत वर्ष में आतंक पैदा किया एवं उसे लूटा तथा तोड़ा। उक्त विवाद के समाधान हेतु देश के अनेक प्रधानमंत्रियों ने प्रयत्न भी किये, लेकिन उनमें सत्य स्वीकार करने की क्षमता न होने के कारण समाधान पर न पहुंच सके। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने तो व्यवस्थित वार्ताओं के द्वारा वास्तव में समाधान का प्रयास करना चाहा, परन्तु कुछ मजहबी हठधर्मियों के असहयोग के चलते नतीजे पर नहीं पहुंच सके।

1936 के बाद से उक्त स्थल पर नमाज अदा नही की गयी, जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। शरियत के अनुसार भी उक्त स्थल मस्जिद नहीं है, लेकिन तथाकथित सेकुलरवादियों ने हमेशा उक्त स्थल पर मंदिर होने के साक्ष्य हिन्दुओं से ही मांगे। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है आने वाली पीढ़ी को हमारा धर्मनिरपेक्ष वर्ग क्या देना चाहता है। झूठा इतिहास या भ्रम की स्थिति, झूठ में प्रत्यारोपित राष्ट्र या बिखरी संस्कृति।

न्यायालय के आदेश से हुयी खुदायी में प्राप्त साक्ष्य भी उन सत्ता लोलुप शासक वर्ग का मुंह खुलवाने के लिए पर्याप्‍त नहीं है या उन्‍हें भय है कि अल्पसंख्यक वर्ग के मतो का, जो उनकी सत्ता छीन सकती है। समाधान को लटकाता एवं विकल्प की तलाश में भटकता उक्त वर्ग ही मुख्य जिम्मेदार है उस 6 दिसम्बर, 1992 की दुर्भाग्यशाली घटना का,  जिसने कभी भी जिम्मेदारी से निर्णायक बात कहने का साहस नही किया या उन्‍हें इन्तजार है दूसरे भूचाल का जब लाशों के ढेर पर बैठ वे सत्ता का बंदरबॉट कर सके।

लेखक राघवेन्‍द्र सिंह पत्रकार हैं.

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