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नेता और साधु जैसा हाल न हो जाए पत्रकारों का!

[caption id="attachment_2341" align="alignleft" width="79"]धर्मेन्‍द्र केशरीधर्मेन्‍द्र[/caption]: आम लोगों का भरोसा कम हो रहा है मीडिया से : दुकान में खबरें लगाकर बैठे हों और ग्राहकों को परोस रहे हों : पेड न्‍यूज कल्‍चर को स्‍वीकार किया जा रहा है : ‘ऐश्वर्या राय को चांद दिखा या नहीं ये ब्रेकिंग न्यूज है, पर हजारों कश्मीरी महिलाओं के पति आज तक घर लौट कर नहीं आए, इस पर कोई खबर नहीं बनती।’ ये डायलॉग राहुल ढोलकिया की ताजातरीन फिल्म ‘लम्हा’ का है। महज ये संवाद मीडिया से जुड़ी कई गंभीर बातों को सामने लाने के लिए काफी है। मसला कश्मीर का तो है ही, बड़ा मसला है मीडिया का, जिसे देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है। सिर्फ लम्हा ही नहीं, तमाम फिल्में मीडिया के सच को ‘उजागर’ करने का दावा करने लगी हैं। चाहे वो रामगोपाल वर्मा हों या मधुर भंडारकर या फिर कोई और, आखिर क्यों अब मीडिया को ही निशाने पर लिया जा रहा है? ये बहुत बड़ा सवाल है।

धर्मेन्‍द्र केशरी

धर्मेन्‍द्र केशरी

धर्मेन्‍द्र

: आम लोगों का भरोसा कम हो रहा है मीडिया से : दुकान में खबरें लगाकर बैठे हों और ग्राहकों को परोस रहे हों : पेड न्‍यूज कल्‍चर को स्‍वीकार किया जा रहा है : ‘ऐश्वर्या राय को चांद दिखा या नहीं ये ब्रेकिंग न्यूज है, पर हजारों कश्मीरी महिलाओं के पति आज तक घर लौट कर नहीं आए, इस पर कोई खबर नहीं बनती।’ ये डायलॉग राहुल ढोलकिया की ताजातरीन फिल्म ‘लम्हा’ का है। महज ये संवाद मीडिया से जुड़ी कई गंभीर बातों को सामने लाने के लिए काफी है। मसला कश्मीर का तो है ही, बड़ा मसला है मीडिया का, जिसे देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है। सिर्फ लम्हा ही नहीं, तमाम फिल्में मीडिया के सच को ‘उजागर’ करने का दावा करने लगी हैं। चाहे वो रामगोपाल वर्मा हों या मधुर भंडारकर या फिर कोई और, आखिर क्यों अब मीडिया को ही निशाने पर लिया जा रहा है? ये बहुत बड़ा सवाल है।

संविधान के मुताबिक हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी है। कोई भी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है। फिल्में भी अभिव्यक्ति का माध्यम हैं और फिल्मकार अपने तरीके से लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। पर क्या कभी ये गौर किया गया है कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये खुन्नस निकालने का तरीका हो सकता है, पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि अनुषा रिजवी जैसी पत्रकार भी मीडिया पर व्यंग्य करती हुई फिल्म (पीपली लाइव) बना रही हैं। ऐसा क्यों है कि मीडिया को आईना दिखाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि पूंजीवादी बेड़ियों में मीडिया कुछ इस कदर जकड़ा जा चुका है कि वो अपने मूल्यों से भी पीछे हटता जा रहा है!

मीडिया पर हर किसी का भरोसा है। इसे आमजन की आकाक्षांओं का प्रहरी कहा जाता है। यही वजह है कि आज मीडिया पर ही सबसे ज्यादा यकीन किया जाता है। लोगों को ये ढांढस बंधता है कि सरकार और नौकरशाह को सही राह पर लाने के लिए मीडिया जनता की आवाज बुलंद करता है और करता रहेगा। जब कोई आप पर विश्वास करता है तो उसके यकीन को कायम रखने के लिए सारे जतन किए जाते हैं। यहां भी कुछ ऐसा ही है। मीडिया को भी अपना भरोसा कायम रखने की जरूरत है, पर दुर्भाग्य से कहीं चूक जरूर हो रही है। आलम ये है कि अब लोग मीडिया को भी गरियाने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

नेता-अभिनेता के आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर आमजन अगर मीडिया के बारे में ऐसी राय रखने लगे तो ये पत्रकारिता के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा होगा। फिलहाल फिल्मों का उदाहरण दिया जा रहा है। कहते हैं साहित्य या सिनेमा समाज का आईना होता है। पहले की इक्का-दुक्का फिल्मों में ही कहानी की मांग पर किसी भ्रष्ट पत्रकार का किरदार गढ़ दिया जाता था, पर अब, अब तो मीडिया को केंद्र में रखकर कहानी ही लिखी जा रही है और उन कहानियों में मीडिया का ‘असली’ चेहरा पेश किया जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों है? केवल ये कहकर- फिल्में हैं, काल्पना पर बनती हैं, जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है। पूरी दुनिया में, खासकर भारत में मीडिया का प्रभाव इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यहां की दीन-दुखी जनता को मीडिया से ही खासी उम्मीदें रहती हैं। ऐसे में जब मीडिया को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है तो आम आदमी किस पर यकीन करे?

पत्रकारों के बिकने और पेड न्यूज पर न जाने कितनी गोष्ठियां और मीटिंग आयोजित हो जाती हैं, पर क्या कोई पूरी ईमानदारी से पेड न्यूज के कल्चर को स्वीकार कर रहा है। गिरेबां में झांककर देखें तो पेड न्यूज की मुखालिफत करने वाले सिर्फ मीडिया की मर्यादा को बचाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हैं, पर उनकी आत्मा जानती है कि पेड न्यूज का चलन उनके पास से ही होकर गुजरता है और वो कुछ नहीं कर पाते हैं। दरअसल, बाजार मीडिया पर बुरी तरह हावी होता जा रहा है, इसलिए कई बार ‘बड़ी खबरें’ टीवी पर प्रोमो दिखाने के बाद भी उतार ली गई हैं। वजह रसूख के दबाव की हो या माया की, पर बदनाम तो पत्रकारिता ही हुई है। आखिर मीडिया मैनेज जैसे शब्द कहां से निकले हैं। क्या किसी की इतनी औकात है, जो लंच-डिनर कराके और चार पैग दारू पिलाकर या गिफ्ट देकर मीडिया को मैनेज कर सके, पर ये बातें अब आम होने लगी हैं और इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। कुछ घुनों की वजह से गेहूं के अस्तित्व को भी कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है। उन घुनों को गेहूं से निकालना बेहद जरूरी है।

बाजार के बढ़ते प्रभाव से हम आम जनता से दुकानदार की तरह पेश आने लगे हैं। जैसे दुकान में खबरें लगाकर बैठे हों और ग्राहकों को परोस रहे हों उनकी मनपसंद खबरें। बदलते वक्त में कुछ बदलाव जरूरी है, पर इसका मतलब ये नहीं कि हम अपना रास्ता ही बदल लें। पत्रकारिता का सीधा संबंध समाज से है और समाज को साथ लेकर ही सार्थकता सिद्ध की जा सकती है। एक सम्मानित और जिम्मेदार कार्य को ‘प्रोफेशन’ में तब्दील किया जा चुका है। ‘प्रतिष्ठान’ पत्रकारिता के आड़े आने लगा है। इसके पीछे कई दलीलें दी जा सकती हैं, कि ये वक्त की मांग है, जमाना बदल चुका है, मीडिया का स्वरूप बदल चुका है वगैरह वगैरह।

यकीनन वक्त बदल गया है, मीडिया का चेहरा बदल रहा है, पर जितने भी वरिष्ठ और बड़े पत्रकार हैं, उन्हें उनकी खबरों ने, उनकी रिपोर्टों ने बड़ा बनाया है, लोग सम्मान की नजर से देखते हैं। इसलिए इस बात का खास ख्याल रखे जाने की जरूरत है कि समय कितना भी बदल जाए आम आदमी से सरोकार रखने वाला और उनके दुख दर्द का साझीदार ही पत्रकार है।

एक वक्त था, जब साधुओं को तवज्जो दी जाती थी। उन्हें इज्जत और श्रद्धा के भाव से देखा जाता था। कुछ ऐसा ही हाल नेताओं का था, जिन पर लोग भरोसा करते थे, पर इन लोगों ने अपनी ऐसी मिट्टी पलीद कराई कि पूछिए ही मत। आम जनता तक पैठ बनाने वाले इस तबके को अब सम्मान की दृष्टि से तो नहीं ही देखा जाता है। गालियां मिलती हैं सो अलग, वजह साफ है कि आम आदमी को इन्होंने इस्तेमाल करना चाहा और अपना स्वार्थ सिद्ध किया। बदकिस्मती से मीडिया भी इसी राह पर है। मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले लोग (जनता) अब संदेह भी करने लगे हैं। अभी भी वक्त है, मीडिया के साख, सम्मान और मर्यादा को बचाया जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और लोग मीडिया पर भी भरोसा करना छोड़ दें।

लेखक धर्मेन्‍द्र केशरी दिल्‍ली से प्रकाशित एक अखबार के पत्रकार हैं.

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