
गोपाल
यदि कोई कुटिल से कुटिल तरीका हो सकता था, जिसमें नीच से नीच अन्याय की कोशिशों पर न्याय का बढ़िया मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश की गयी हो। यदि कोई तरीका अधिक से अधिक निष्ठुर, दर्पयुक्त और दयाशून्य हो सकता था तो यही वह तरीका है जिससे भारत वर्ष की अनेक देशी शासन, देशी राजाओं से छीन-छीनकर ब्रिटिश सत्ता के चगुंल में जमा कर दिया गया। 1757 के बाद बंगाल का मुगल सूबा और आगरे का किला फोर्ट बिलियम के अधीन कर दिया गया। तत्पश्चात कंपनी ने 1799 में टीपू सुल्तान के पतन के बाद मद्रास में अपना क्षेत्रीय विस्तार किया। मराठा शक्ति के कारण मुंबई प्रेसीडेन्सी का प्रभाव तीसरे मराठा युद्ध 1818 के पश्चात ही किया जा सका। 1842 में सिंध पर विजय हासिल करके इसे बंबई में मिला दिया। 1856 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के उपर झूठे अरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर के अवध को भी हड़प लिया गया। भारत के जो भाग लम्बे समय तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहे, वे उनकी लूट के कारण दरिद्रता की ओर बढ़ते चले गये।
अंग्रेजों ने किस तरह अपने फायदे के लिए भारत की ग्रामीण व्यवस्था में उलटफेर तथा भारतीय उद्योग धन्धें का सर्वनाश किया। इसे सिवानी किंकर तथा सुन्दर लाल के लेखन से हमें समझने में मदद मिल सकती है। सिवानी किंकर के अनुसार- ग्रामीण अर्थ व्यवस्था से पहले परिवर्तन राजनीतिक अर्थव्यवस्था में हुआ। यह परिवर्तन बंगाल में हुआ जिससे यहां सबसे पहले अंग्रेजी सत्ता स्थापित हुई। यह परिवर्तन भूमि के संबंध में राजस्व की लालसा से प्रेरित था। अंग्रेजों के आने से पूर्व भूमि समुदाय के अधीन थी।
दीवानी के खत्म होने के बाद अंग्रेजों ने कर निर्धारण को संशोधित कर राजस्व संग्रह की नई व्यवस्था आरम्भ कर दी। 1764-65 के मुगलों के राजस्व संग्रहण के आखिरी साल में बंगाल से वसूल किया हुआ शेष राजस्व 8 लाख 18 हजार पौंड था, जो कि कंपनी के पहले साल 1765-1766 में 14 लाख 70 हजार पौंड हो गया। यह कार्य कुशलता पर्याप्त नहीं समझी गई। इसीलिए लार्ड कार्नवालिस ने भू राजस्व के नियमित संहग्रण के विरूद्ध भूमि का जमीदारों के साथ स्थाई बंदोबस्त किया। अंग्रेजी जमींदारी व्यवस्था ने भारत में प्रचलित भूमि पर सामुदायिक हक को व्यक्तिगत हक के द्वारा स्थानांतरित कर दिया।
इस व्यवस्था ने यह भी आरोपित कर दिया की चाहे फसल की वर्ष में कोई उपज हो या न हो किसानों को राजस्व अदा करना ही पड़ेगा, वर्ना उसे जमीन से बेदखल कर दिया जायेगा। इस नई भूमि व्यवस्था ने वास्तविक भूमि पर खेती करने वाले लोगों के भूमि संबंधी सभी अधिकार खत्म कर दिये। इस तरह नये जमीदार वर्ग का उदय हुआ जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ, लेकिन दूसरी तरफ मेहनतकश किसान तबाही की कगार पर पहुंच गए। इस नई भूमि व्यवस्था ने मद्रास प्रान्त के किसानों के लिए रैयतबाडी व्यवस्था प्रारंभ की, बाद में यह व्यवस्था मध्य भारत के भागों, सिंध तथा आसाम में भी विशेष तौर पार लागू की गई।
भारत के मध्य पश्चिमी तथा उत्तर पश्चिमी भागों में स्थाई जमीदारी व्यवस्था स्थापित की गई। फसल के बजाय भूमि पर राजस्व लगाने की व्यवस्था ने कृषकों एवं भूपतियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न प्रकार के गैर कृषक खामियों का उदय हुआ और जमीन की बेदखली की प्रक्रिया भी आरंभ हुई। इन सबके चलते ग्रामीण किसान काफी जर्जरता का शिकार होने लगे। भूमि संबंधी नये कानून के प्रचलन के परिणाम स्वरूप ग्रामीण प्रभुत्व का परंपरागत ढांचा चरमरा गया। अब जमीदारों ने ग्रामीण मामलों के निपटारे में मुखिया का स्थान प्राप्त कर लिया। जिन्होंने परंपरागत सिंचाई व्यवस्था को पूरी तरह अनदेखा कर दिया, जिससे सिंचाई व्यवस्था चरमरा गई। रेल उद्योग के अव्यवस्थित विकास के कारण नदियों तथा पुराने सिंचाई नालों को बहुत नुकसान पहुंचा। इस तरह बेढंगें रेल मार्गों से न केवल सिंचाई में बाधाएं आयीं बल्कि पानी के जमाव ने कई विनाशकारी बीमारियां को भी फैलाया।
अंग्रेजी राज में भारत के पारंपरिक उद्योग धन्धों के सर्वनाश के बारे में इतिहासकार सुन्दर लाल लिखते हैं कि अंग्रेजों के भारत आने से हजारों साल पहले भारत के बने हुए कपड़े और दूसरा माल जहाजों में लदकर चीन, जापान, लंका, ईरान, अरब, कम्बोडिया, मिस्र, अफ्रीका, इटली, मेक्सिको आदि संसार के सभी देशों में बिकता था। अंग्रेजों के आने के सैकड़ों साल बाद तक भी उद्योग धन्धों की निगाह से भारत संसार का सबसे अधिक उन्नत देश माना जाता था। 17वीं शताब्दी के अन्त में बहुत बड़ी तादात में हिन्दुस्तान की सस्ती और नफीस मलमल और छीटें इंग्लिस्तान में जाती थी। और इतने पंसद की जाती थी कि इंग्लिस्तान में ऊनी और रेशमी कपड़ा बनाने वालों को उनसे बड़ा खतरा हो गया था। तब अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में रहता था। लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेजों के लूट से यह संतुलन बदल गया।
अंदाजा लगाया गया है कि प्लासी से वाटर लू तक यानी सन 1757 से 1815 तक करीब 1000 मिलियम पौंड यानी 15 अरब रुपया शुद्ध लूट का भारत से इंग्लिस्तान पहुंचा। यानी 58 वर्ष तक 25 करोड़ रुपया सलाना कंपनी के मुलाजिम भारतवासियों से लूटकर अपने देश ले जाते रहे। केवल लार्ड क्लाइव 10 लाख पौंड के चौथाई हिस्से के मूल्य के बराबर निजी सम्पत्ति तथा 27 हजार पौंड वार्षिक आय वाले एक निजी जमीदारी के साथ इंग्लैंड पहुंचा।
भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा किये जाने वाले व्यापार के तौर तरीकों के बारे में रिचर्ड नामक एक अंग्रेज ने सूरत की अंग्रेजों के रोजनामचे में दर्ज कुछ घटनाऐं उद्धित की है। वह लिखता है कि- ‘जुलाहों को उनकी इच्छा और हित दोनों के विरूद्ध कंपनी से काम का ठेका लेने और उसे ठेके के अनुसार काम कर देने के लिये मजबूर कर दिया जाता था। कभी-2 जुलाहे इस तरह जबरन काम करने की अपेक्षा भारी जुर्माना दे देना अधिक पसंद करते थे। कंपनी ने अपने आर्थिक लाभ को सुनिश्चित करने के लिए अपने अधिकार क्षेत्रों में भारतीय कारीगरों पर खूब जुल्म ढाये और हर तरह से उन्हें लूटा जाता रहा। कपास, रूई, धागे, हमारे, रंग हमारे, कारीगर-बुनकर हमारे, खड्डियां हमारी व लाभ ईस्ट इंडिया कंपनी का। आज भी हम देखते हैं कि चने हमारे, बेसन हमारा, चक्कियां हमारी, घी-तेल नमक हमारा, हलवाई हमारे, परात-कढ़ाही हमारी, चूल्हा भट्टी-ईंधन आग सब हमारी पर लाभ किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का। कपड़ा और भुजिया नमकीन सिर्फ उदाहरण हैं, हर क्षेत्र में तब भी यही हुआ था और आज भी यही हो रहा है।
जारी…
लेखक गोपाल राय तीसरा स्वाधीनता आन्दोलन के राष्ट्रीय संगठक है.

