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परिवर्तन और बाजार के बीच पिस रही है पत्रकारिता

पत्रकारिता: अंधी दौड़ में दम तोड़ रही है पत्रकारिता की आत्‍मा : ज्‍यादातर मीडिया हाउस निगेटिव खबरों को ही ज्‍यादा तरजीह देते हैं : १९४७ के पहले का वो दशक, जब कलम की धार तलवार से भी तेज हुआ करती थी. एक खबर अंग्रेज शासकों को अंदर तक हिला कर रख देती थी.  परन्तु वही कलम की धार आज मौजूदा परिस्थितियों में जंग खा चुकी है. अगर ये कहे की उस वक़्त के खबरनवीसो की कलम आग उगलती थी तो गलत नहीं होगा. ये पत्रकारिता में कलम की धार ही थी, जिससे तमाम लोगों को नाकों चना चबाने पर मजबूर होना पड़ा. अब शायद पत्रकारिता का मानदंड पूरी तरह बदल गया है. अब खबरों की खबर कोई नहीं लेता. अब तो बाजार और कंप्‍टीशन इस कदर पत्रकारिता पर हावी हो चुका है कि पत्रकारिता की असली आत्‍मा मरती जा रही है.

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पत्रकारिता: अंधी दौड़ में दम तोड़ रही है पत्रकारिता की आत्‍मा : ज्‍यादातर मीडिया हाउस निगेटिव खबरों को ही ज्‍यादा तरजीह देते हैं : १९४७ के पहले का वो दशक, जब कलम की धार तलवार से भी तेज हुआ करती थी. एक खबर अंग्रेज शासकों को अंदर तक हिला कर रख देती थी.  परन्तु वही कलम की धार आज मौजूदा परिस्थितियों में जंग खा चुकी है. अगर ये कहे की उस वक़्त के खबरनवीसो की कलम आग उगलती थी तो गलत नहीं होगा. ये पत्रकारिता में कलम की धार ही थी, जिससे तमाम लोगों को नाकों चना चबाने पर मजबूर होना पड़ा. अब शायद पत्रकारिता का मानदंड पूरी तरह बदल गया है. अब खबरों की खबर कोई नहीं लेता. अब तो बाजार और कंप्‍टीशन इस कदर पत्रकारिता पर हावी हो चुका है कि पत्रकारिता की असली आत्‍मा मरती जा रही है.

पत्रकार भी शायद भूल चुका है कि पहले वो देश का एक आम नागरिक है तब एक पत्रकार. उसका काम सिर्फ खबरें लाना और लिखना ही नहीं बल्कि उस खबर के तह में भी जाना और यह समझना कि इससे समाज पर क्‍या प्रभाव पड़ता है, इसे देखना भी होता है, और ऐसी खबरें लिखना जिसका ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को फायदा पहुंच सके. परन्‍तु आज कोई पत्रकार खबर की तह तक जाने का प्रयास नहीं करता. ज्‍यादातर मीडिया हाउस निगेटिव खबरों को ही ज्‍यादा तरजीह देते हैं, ताकि उनका सर्कुलेशन और टीआरपी हाई रहे. टीआरपी और सर्कुलेशन की अंधी दौड़ ने पत्रकरिता के मूल्यों को धो डाला है.

खबरों को दिखाते समय उन्हें ये याद नही रहता कि हम भी उसी जमात से जुड़े हैं. जिनके बीच से ये खबर आई है, कई बार से आम जन से जुड़ी खबरों को विभिन्‍न कारणों से दबा दिया जाता है. कभी कभी ऐसी खबरों का भी गला घोंट दिया जाता है जिससे समाज को लम्बे समय तक कुछ फायदा हो सकता है. आज के पत्रकारों को अपने कर्तव्‍यों से परे खबर बनाने का हुनर अच्‍छी तरह आता है. अब खबरें निकाली नहीं जाती बल्कि बाजार के आधार पर इसका प्रोडॅक्‍शन किया जाता है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं प्रोफेशन बन चुकी है. हालांकि परिवर्तन संसार का नियम है. लेकिनऐसा परिवर्तन किस काम का कि आत्‍मा ही मर जाये.

किसी भी परिवर्तन में उसकी मूल सिद्धांतों एवं वास्तिविकताओं का समाहित होना उतना ही आवश्‍यक है, जितनी किसी के जिंदा रहने के लिए सांस. आप जब भी टीवी चैनल पर अपने रिमोट को घुमाते हैं या तो सनसनी फैलाती खबरें दिखती हैं या फिर ग्‍लैमरस खबरें. दिन भर ऐसे ही खबरों का बोलबाला रहता है. आम लोगों से जुड़ी खबरें अखबार के पन्नों और टीवी स्‍क्रीन से

गायब होती जा रही है. इस दौरान कई ऐसी महत्‍वपूर्ण खबरें दब जाती हैं, जो समाज और सरकार पर गहरा असर छोड़ सकती हैं. कुछ दिन पहले ही राहुल महाजन, डिंपी गांगुली और वो को लेकर ऐसी हलचल मची कि उस दिन देश में कहां क्‍या घटित हुआ, चैनलों के स्‍क्रीन से गायब रहा. जबकि इस दौरान देश के कई भाग बाढ़ से प्रभावित रहे. लोगों को तमाम तरह की दिक्‍कत हो रही होंगी, परन्‍तु ऐसी खबर उस दिन किसी चैनल पर ईमानदारी से नहीं दिखी. अब अपने मूल्‍यों को गिरवी रखकर खबरें दिखाना किस हद तक सही है, यह फैसला पत्रकार बिरादरी खुद करे.

लेखक मुन्‍ना स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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